यह सब लोग वहाँ अन्दर थे जब वह वहाँ पहुँची, सिर से पैर तक नंगी, यह सब लोग सुरा-पान कर रहे थे, और उस पर थूकने लगे थे. नदी से निकलकर नई आई अभी-अभी, वह कुछ न समझ सकी. वह राह भूल गई एक मत्स्य-कन्या थी. व्यंग-ही-व्यंग से सराबोर हो रही थी उसकी दमकती देह. अश्लीलता-ही-अश्लीलता से लांछित हो रहे थे उसके कंचन-कुच. आँसुओं से नावाकिफ, वह न रोई. कपड़ों से नावाकिफ़, न पहने थे उसने कपड़े, उन्होंने उसके जिस्म को गोद-गोद दिया सिगरेट के बचे टुकड़ों और कॉर्क के जले टुकड़ों से, और मारे हँसी के लोट-पोट हो गए वह कलवरिया के फ़र्श पर वह न बोली क्योंकि बोलने से वह नावाकिफ़ थी. स्वप्निल प्रेम के रंग से अनुरंजित थीं उसकी आँखें, पुखराजों से मेल खाती थीं उसकी बाहें. मूँगिया प्रकाश में उसके ओठ निश्शब्द चल रहे थे, और अन्त में वह द्वार से निकल कर वहाँ से चली गई. नदी में धँसते ही, सिर से पैर तक पोर-पोर से स्वच्छ और शुद्ध हो गई, फिर एक बार वह दमक उठी वृष्टि में धुले सफ़ेद पत्थर के समान; और बिना सिंहावलोकन किए, फिर एक बार वह तैरी-तिरी, तैरी-तिरी न-कुछ-की ओर, तैरी-तिरी अपने अवसान की ओर.अगर आप भी कविता/कहानी लिखते हैं, और चाहते हैं हम उसे छापें, तो अपनी कविता/कहानी टाइप करिए, और फटाफट भेज दीजिए lallantopmail@gmail.com पर. हमें पसंद आई, तो छापेंगे. और हां, और कविताएं पढ़ने के लिए नीचे बने ‘एक कविता रोज़’ टैग पर क्लिक करिए.
एक कविता रोज: मत्स्य-कन्या और पियक्कड़ों की पौराणिक कथा
पाब्लो नेरूदा के जन्मदिन पर पढ़िए उनकी एक कविता.
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फोटो - thelallantop
आज पाब्लो नेरूदा का जन्मदिन है. नेरूदा वो कवि हैं जिन्हें महान उपन्यासकार मार्केज़ ने खुद ’20वीं सदी का सबसे महान कवि’ बताया था. चिली देश से आने वाले पाब्लो नेरूदा 10 साल की उम्र में कवि कहलाने लगे थे. और 20 साल की उम्र तक स्टार बन चुके थे. पूरी जिंदगी ये चिली की कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े रहे. एक समय ऐसा आया कि कम्युनिस्टों का जीना मुश्किल हो गया. नेरूदा कई दिन छिपे रहे. जब वापस आए तो तो 70 हजार लोगों की सभा में कविताएं पढ़ीं. कुछ सालों बाद जब चिली में तानाशाह पिनोशे आया, उसी समय नेरूदा को बीमारी के चलते अस्पताल में भर्ती किया गया. हालांकि रिपोर्ट्स के मुताबिक़ नेरूदा कैंसर से मरे. पर कई लोग मानते हैं कि पिनोशे सरकार ने इनका मर्डर करवाया. पढ़िए दुनिया के सबसे बड़े जनकवियों में से एक पाब्लो नेरूदा की कविता ‘मत्स्य-कन्या और पियक्कड़ों की पौराणिक कथा’. अनुवाद है केदारनाथ अग्रवाल का.
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