'अकेला घर हुसैन का', 'कटौती' और 'जिबह-वेला' जैसे कविता-संग्रहों के कवि निलय उपाध्याय का आज जन्मदिन है. निलय का शुमार अब वरिष्ठ कवियों में है. कवि के साथ-साथ वह कथाकार, नाटककार, यायावर और संस्कृतिकर्मी के रूप में भी बदलावों के लिए बेचैन रहते हैं. निलय का कवि यहां पेश कविताओं में पूरी तरह बदला हुआ है. ये कविताएं ‘मुंबई की लोकल’ सीरीज के अंतर्गत हैं. गौरतलब है कि इन कविताओं का कवि कई वर्षों से आजीविका के लिए मुंबई में है. इन्हीं वर्षों में हमने हिंदी की संभावनाशील प्रतिभाओं को मुंबई में नष्ट होते देखा और देख रहे हैं. इस असर में निलय के कवि का बच जाना चौंकाता है. निलय बिहार से हैं और पूरा देश घूमते हुए चलते हैं. रुक जाना उनकी फितरत नहीं हैं. गंगोत्री से गंगासागर तक की यात्रा एक साइकिल से तय कर चुके हैं.
एक कविता रोज़: कवि ने बेच दी मुंबई की लोकल
आज एक कविता रोज़ में पढ़िए 'मुंबई की लोकल' पर निलय उपाध्याय की कविताएं.
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फोटो - thelallantop
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निलय को शुभकामनाओं के साथ आज एक कविता रोज़ में दी जा रहीं इन कविताओं को पढ़कर इस तथ्य को जांचा जा सकता है कि निलय उपाध्याय नब्बे के दशक में सीन में आए अपने समवयस्क कवियों से कुछ आगे निकल गए हैं. मुहावरे में कहें तो कह सकते हैं कि उनमें से बहुत तो अब तक ‘बैलगाड़ी’ पर ही सवार हैं, जबकि निलय ने ‘लोकल’ पकड़ ली है. वह इस कविता-यात्रा में खुद से भी आगे आए हैं— सरोकार, संवेदना, विषय और शिल्प चारों स्तरों पर... ***
मुंबई की लोकल : कुछ कविताएं
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मंत्र लोकल में चढने के अपने मंत्र हैं
उतरने और यात्रा करने के अलग मंत्र हैं यात्री रोज सिद्ध करते हैं
जो नहीं कर पाते खड़े रह जाते हैं इंतजार में
जैसे उनके लिए स्टेशन पर
रुकी ही न हो लोकल पहली के साथ स्वप्न छूटता है
दूसरी के साथ हिम्मत
तीसरी के साथ गति
और धीरे-धीरे छूट जाती है पकड़ से मुंबई मुंबई में रहने के अलग मंत्र हैं
उनकी सिद्धि लोकल में होती है यहां यातायात के नियम लागू नहीं होते
मनुष्यता के नियम लागू नहीं होते
लागू होता है नियम होड़ का
होड़ का नियम पहले दक्षता हासिल करता है
बाद में कला में बदलता है
और तब एक मंत्र बनता है
* बारिश हवा में उमस थी
और अपनी गति से जा रही थी लोकल
डिब्बों में भीड़ बहुत अधिक नहीं थी
तो कम भी नहीं थी कुछ लोग पढ़ रहे थे अखबार
कुछ सुन रहे थे गाने
कुछ लोग दरवाजे पर खड़े
मजा ले रहे थे बाहर की बयार का
एकाएक जाने क्या हुआ
बिजली कड़की
काला हो गया आसमान और मेघों ने घेर लिया लोकल को
बीच राह सरेआम न तो बंद हुईं खिड़कियां
न दरवाजे
न मची कहीं भगदड़
हवा में पीछे की ओर झुक कर
जैसे मेघों का
स्वागत करती है ज्वार और बाजरा की डिभियां
स्वागत किया लोगों ने बांहें लहराकर
मौसम की पहली बारिश का नम हो गई हवा
लोकल और मेघों के बीच
चलते-चलते चलती रही बतकही
जाने कहां-कहां की
समुद्र की, हवा की
ऊंचे आसमान की
दुनिया की जहान की और जब लोकल ने प्यार से
मेघों को झिड़क कर कहा
कितना बदल गया है तू,
भूल गया समय पर आना भी
चुप रह गए मेघ अब क्या बताएं
रात-दिन
एक ही पटरी पर चलने वाली इस लोकल को
कि क्यों देर हुई आने में
किसने रोका था उनका रास्ता
* जेबकतरा मालवानी की चाल में
एक महीने के प्रशिक्षण के बाद निकला था
जेबकतरा
आज पहला दिन था उसका
बोहनी का दिन
मुंबई की लोकल में
हर स्टेशन पर उतरना था
करना था फोन
आदेश था उस्ताद का दस दिनों तक सीखा था उसने
नाखून के भीतर ब्लेड घुसाना
दस दिनों तक सीखा
पानी से भरे बर्तन मे कमल के पत्ते पर
इस तरह मारना ब्लेड कि पानी की बूंद
ब्लेड पर न पड़े और आखिरी दस दिनों तक
अंग्रेजी के वी की आकृति में जेब पर ब्लेड चलाना
ताकि आसानी से और हाथ में गिरे पर्स मलाड में
फोन कर उस्ताद को किया प्रणाम
कामयाबी की दुआ ली और सवार हो गया
पहले देखो, समझो फिर आराम से लगाओ हाथ
उस्ताद की नसीहत याद करने में ही
आ गया गोरेगांव दूसरी ट्रेन के आने के पहले
जब लगाया फोन अपने उस्ताद को
रह गया भौंचक हाय राम, ये क्या हुआ
पैसा ही नहीं बचा था मोबाइल में एक भी
मलाड में उस्ताद से बात करने के बाद शेष थे
चौवन रुपए किसने काट लिए
आते-आते गोरेगांव...
* सुहागरात गाना गाकर
बांद्रा यार्ड के बिल में रहने वाले चूहे ने
सपने दिखा झोंपड़पट्टी की चुहिया को पटाया
विधिवत किया ब्याह और साथ चले
हाथों में हाथ डाल
बांद्रा यार्ड का देखकर विस्तार
दंग रह गई चुहिया
सामने खड़ी नई लोकल देख पूछा
तुमने मेरे लिए बनाया इतना बड़ा बिल बनाया नहीं रे,
आई है स्वीट्जरलैंड से
देख कैसी सजी है सुहाग की अपनी सेज
चुहिया ने जी भर देखा
और खुश हो
चूहे की गर्दन से लटक गई अभी शुरू भी नहीं हुआ
उनका प्रेमालाप
कि धम्म से गिरा डिब्बे में कुछ फिर गिरा,
फिर गिरा,
और गिरता रहा देर तक क्यों बरस रहे हैं
इतने बड़े और बेडौल पत्थर
क्या बिल नहीं चुकाया इसका कैसे बताए चूहा
कि एक की जगह कैसे सवार होंगे ग्यारह लोग
यह जांचने के लिए वजन
कई दिनों तक लादकर पत्थर और ईंट
रात के अंधेरे में ले जाएंगे
हर दिन कुछ जोड़ेंगे
कुछ घटाएंगे
तब बनेगी यह लोकल मुंबई की
और तू चुहिया इस चूहे की यह मुंबई है मेरी जान
यहां यथार्थ के पत्थर
शांति से सुहागरात भी नहीं मनाने देते
* लोकल के डिब्बे में शव ...और इस बार जब मिला लोकल के डिब्बे में शव
मच गया हाहाकार तीन महीनों में बारहवीं घटना थी
इस बार तोड़ दी थी लोगों ने चुप्पी
फुफकारने लगे थे अखबार
और लोकल से होते विधानसभा तक गूंज गई थी आवाज सक्रिय हुई पुलिस
तलाश में चला अभियान
शव का फोटो चिपकाया गया हर स्टेशन पर
और आखिर में बिहार जाकर पकड़ कर ले आई पुलिस उसे
जो सगा भाई था मृतक का शुरू हुई पूछताछ कूंथ कर कांथ कर
पीट कर पाट कर
प्यार से पुचकार कर
पूछे गए सवाल
धन के प्यार के
और हो सकते थे जितने भी कारण
आपसी तकरार के
पूछे गए बार-बार मगर हर बार आया
एक ही जवाब
यही कहते थे घटना के सारे गवाह
दोनो भाई करते थे नौकरी, सिक्योरिटी कंपनी में
ड्यूटी थी बारह घंटे की
कम था वेतन
छोटे को हुआ बुखार, लगा ठीक हो जाएगा यूं ही
नहीं हुआ तो बड़े ने दूकान से लाकर दी टिकिया
बेअसर हुई तो दिखाया बड़े डॉक्टर से
हुई खून की जांच, खर्च हो गई दोनों की तनख्वाह
और मर गया वह उसी रात शव को गांव ले जाने की बात दूर थी
नहीं मिले पैसे कि कर सके शवदाह
लाकर छोड़ गया
उसे मालूम था विधि-विधान के साथ करती है लोकल
अपने मृतकों का अंतिम-संस्कार उसे क्या पता था
यह लोकल इतना बवाल करेगी
* नीले रंग की बिंदी बड़े दिनों के बाद दिखा
अंधेरी मे खाली डिब्बा
चढ़ा तो मिल गई विंडो सीट
बैठा पसरकर,
नौकरी मिल जाती है मुंबई में
नहीं मिलती लोकल में विंडो सीट आज चेहरे से जी भर टकराएगी समुद्र की हवा
आंखों को मिलेगा सुख नजारों का अचानक नजर टिक गई
विंडो के ठीक नीचे
आराम से चिपकी थी नीले रंग की बिंदी किसकी बिंदी है यह
जरूर कोई औरत बैठी होगी इस सीट पर मुझसे पहले
इतनी कोमल कि ललाट को देने के लिए थोड़ा विश्राम
शायद चिपका दी हो यहां दीवार पर
और भूल गई हो जाते वक्त यह भी तो हो सकता है कि साथ बैठा हो उसका पति
उसके सामने उतार कर चिपकाई हो
और छोड़ी भी हो जानबूझकर जताने के लिए
अपना गुस्सा
तेरे साथ अब बिना बिंदी के रहना है हो सकता है बिंदी के कारण
लग रही हो बहुत खूबसूरत
और घूर रहे हों आस-पास बैठे और खड़े लोग
पछता रही हो कि क्यों आ गई
मर्दों वाले लोकल के डिब्बे में
और खीझ कर चिपका दी हो
लोकल की दीवार पर कि लो जी भर देखो चलती रही लोकल
उड़ान भरता रहा औरतों का सौंदर्य
उनकी खुशियां
उनके दुःख
उसका रंग
उसका रूप
जाने कितने ललाटों पर चिपकाया मैंने
आंखों के आगे नाचते रहे जाने कितने चेहरे
कि आ गया मेरा स्टेशन एक बार मन हुआ निकाल लूं इसे
और ले चलूं साथ
दूसरे पल ख्याल आया तो छोड़ दिया यूं ही क्या पता लोकल को देखकर
याद आया हो उसे अपना जीवन
और देकर बिंदी का उपहार
कायम किया हो बहनापा
कहा हो,
यह बिंदी तुम पर जंचती है
* हवा का झोंका स्टेशन पर
भीड़ से भरे कम्पार्टमेंट में
हवा के एक झोंके ने
अंदर आने के लिए
अपनी सारी ताकत झोंक दी
और हार कर लौट गया
वापस मेरे संग
चुपचाप खड़ा रहा
प्लेटफॉर्म पर
अगली लोकल के
इंतजार में
* जांबाज नाक में सांस
चढ़ने और उतरने के बीच
जरा-सी रुकती है दो शब्दों के बीच
अभिव्यक्ति की उठान के लिए
रुकती है भाषा पलकों के झपकने के बीच
आखों मे रुकते हैं मंजर
मुंबई की लोकल
रुकती ही नहीं जांबाज पैसेंजर
रुकते-रुकते उतर जाते हैं
चढ़ते रहते हैं चलने के बाद भी और इतने ही वक्त में
किसी भी स्टेशन पर उतरकर
शर्त लगाकर
बीस रुपए के नोट से वडा पाव
और पानी की बोतल खरीद वापस किया गया
एक रुपए का सिक्का दिखा देंगे कल की बात है
पता चला नहीं जाएगी एक चालीस की लास्ट
पहुंच गए, टेढ़ी की स्टेशन मास्टर की नाक
फोन पर जाने क्या लप-चप हुआ
और चल पड़ी और उस दिन जब
6.30 पर हुआ था बम-विस्फोट
6.45 तक पहुंचे पत्रकार
6.50 तक पहुंच गई पुलिस
और सात बजे आला अधिकारी भरे थे तनाव से
जैसे चूल्हे पर डभक रहा हो अदहन
पक रहा हो गुस्सा घायल पड़ा कराह रहा था
लोहे का एक डिब्बा रेल की पटरियों, गिट्टियों पर गिरा ताजा था खून
जगह-जगह लोथड़े पड़े थे मांस के
एक हाथ था
कट कर गिरा हुआ माटूंगा स्टेशन था
खबर थी पच्चीस लोगों के मरने की
और उससे कुछ अधिक लोगों के घायल होने की
मगर न तो एक भी घायल था वहां, न मृतक
जज्बा जांबाजी का
पहुंचा दिया था सबको अस्पताल पत्रकारों को जरूरी था
भेजना समाचार
पुलिस को करनी थी तहकीकात
मगर हिम्मत नहीं हुई पूछने की अस्पताल का नाम
कहीं से दौड़ता हुआ आया एक
कहा कि घायलों को जरूरत है खून की
और जब चल पड़ा जांबाजी का कारवां
तो पता चला पत्रकारों को
पुलिस के अधिकारियों को अस्पताल का नाम जाते-जाते उठा लिया था किसी ने
वह कटा हाथ भी
क्या पता उसे भी जोड़ दे कोई डॉक्टर
* कवि ने बेच दी मुंबई की लोकल अरे भाई सुनो? क्या हुआ? एक कवि ने बेच दी
मुंबई की लोकल कोई डिब्बा बेच रहा था कोई इंजन
कोई सिग्नल बेच रहा था कोई टिकट
सिपाही कानून और
टीटी फाइन बेच रहे थे डिब्बा, इंजन, सिग्नल, टिकट, सिपाही और टीटी समेत
एक कवि ने बेच दी मुंबई की लोकल कवि ने बेच दी और
खरीद भी ली
जहां जाओ बस यही चर्चा अखबारों ने अनुमान लगाया था
नाराज था वह कवि
टी.वी. पर कहते सुना था लोगों ने
मुंबई की लोकल मुठकरनी और खोई जवानी प्राप्त करे
जैसे उत्पाद बेचने की जगह नहीं है
प्यार बेचने की जगह है इतनी ठस्स भीड़ के बीच
दब कर
झुक कर
लटक कर
कहीं-कहीं
कहीं बैठा
कैसे-कैसे चलता
कैसे-कैसे खिलता है प्यार
आकर देखो
मुंबई की लोकल प्यार का सबसे आधुनिक प्रतिमान है कहां मिलेगा इतना बड़ा बाजार प्यार का
देखा कवि ने और बेच दी मुंबई की लोकल
सोचा इतना प्यार क्यों रहे किसी और के पास
खरीद ली
और रख दी पटरी पर जस की तस उसकी नजर अब मुंबई पर है
मगर यह घाटे का सौदा है...
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