दिल्ली में जिन 31.6 लाख लोगों को स्पेशल इंटेंस रिवीजन (SIR) का नोटिस मिला है, उनमें से सिर्फ 23 हजार लोगों का मामला अब तक सुलट पाया है. यानी सिर्फ 0.7 फीसदी वोटर फाइनल ड्राफ्ट में अपनी जगह पक्की कर पाए हैं. ये वो लोग हैं, जिनके फॉर्म में ‘मैपिंग’ और नाम तथा जन्मतिथि से जुड़ी गड़बड़ियां थीं.
दिल्ली में सिर्फ 0.7% लोग SIR की 'नोटिस परीक्षा' पास कर पाए
दिल्ली में SIR के दौरान मैपिंग और दूसरी गड़बड़ियों के चलते नोटिस पाने वाले करीब 31.6 लाख लोगों में अब तक सिर्फ 23 हजार लोग ही सुनवाई पूरी कर फाइनल वोटर लिस्ट में अपनी जगह पक्की कर पाए हैं.

ये आंकड़ा ऐसे समय में सामने आया, जब दिल्ली चुनाव आयोग ने कई राजनीतिक दिग्गजों को SIR का नोटिस भेजा है. इनमें मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता, पूर्व सीएम अरविंद केजरीवाल, पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी, विदेश मंत्री एस. जयशंकर और चुनाव आयुक्त एसएस संधू जैसे लोग भी शामिल हैं.
हालांकि, चुनाव आयोग ने साफ किया है कि SIR का नोटिस मिलने का मतलब ये नहीं है कि वोटर्स लिस्ट से नाम कटने वाला है. यह गहन (इंटेंस) सुधार की एक प्रक्रिया है, जिसमें वोटर्स लिस्ट में नाम जोड़ने और जानकारी दुरुस्त करने के मौके लोगों को मिलेंगे.
हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली की ड्राफ्ट वोटर्स लिस्ट 31 अगस्त 2026 को छपी थी. इसमें केंद्रशासित प्रदेश के करीब एक तिहाई वोटर्स के नाम हटा दिए गए थे. यानी 30 जून को दिल्ली में 1.45 करोड़ वोटर्स थे. लेकिन 31 अगस्त 2026 को जब ड्राफ्ट लिस्ट जारी की गई, तब यहां सिर्फ 97.5 लाख मतदाता रह गए. कुल 32.8 फीसदी लोगों के नाम ड्राफ्ट वोटर्स लिस्ट में नहीं थे. इनमें भी 31.6 लाख लोग ऐसे हैं, जिनके फॉर्म में ‘मैपिंग’ और ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ से जुड़ी गड़बड़ियां थीं.
‘मैपिंग’ और ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ क्या है? पहले ये जान लेते हैं.
मैपिंग (Mapping) का मतलब मौजूदा वोटर्स लिस्ट का पुरानी मतदाता सूची से मिलान करना है. दिल्ली में साल 2002 की वोटर्स लिस्ट से मौजूदा लिस्ट की मैपिंग की जा रही है. इसमें अगर किसी वोटर का नाम खुद पुरानी लिस्ट में है तो वह डायरेक्ट लिंकिंग (Direct Linking) के जरिए नई लिस्ट में आ जाएगा. अगर वोटर नया है और 2002 वाली लिस्ट में उसका नाम नहीं है तो उसके माता-पिता या फिर दादा-दादी से नाम जोड़ा जाएगा. इसको वंशज मैपिंग या (Progeny Mapping) कहा जा रहा है.
वहीं, लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी फॉर्म में ऐसी गड़बड़ियां हैं, जो मैपिंग के दौरान अधिकारी नोटिस करते हैं. वोटर के बारे में कई ऐसी जानकारियां दर्ज होती हैं जो तार्किक नजरिए से सही नहीं लगतीं. जैसे, बाप-बेटे की उम्र का अंतर 15 साल या 50 साल हो, जो आमतौर पर संभव नहीं है. दो भाई-बहनों के जन्म में 9 महीने से कम का अंतर हो, पुरानी सूची में पिता का नाम कुछ हो और नई सूची में कुछ और हो. अधिकारियों को जब ऐसा कुछ दिखता है तो वह संबंधित व्यक्ति को नोटिस भेजते हैं.
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अब तक सिर्फ 23 हजार लोग पासचुनाव आयोग के अधिकारियों ने सोमवार, 21 सितंबर को बताया कि दिल्ली में मैपिंग या अन्य गड़बड़ियों के चलते 31.6 लाख लोगों को नोटिस भेजा गया था. इनमें से अब तक सिर्फ करीब 23 हजार लोग SIR की सुनवाई प्रक्रिया पूरी कर पाए. यानी इन लोगों ने फाइनल वोटर्स लिस्ट में अपनी जगह पक्की कर ली है.
हालांकि, दिल्ली में ऐसे 33.1 लाख से ज्यादा मतदाताओं को चिह्नित किया गया है. इनमें 13 लाख 79 हजार 785 को ‘नो मैपिंग’ और 19 लाख 33 हजार 134 को ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ कैटेगरी में रखा गया है. दोनों मिलाकर कुल 33 लाख 12 हजार 919 मतदाता होते हैं. लेकिन अभी तक नोटिस सिर्फ 31 लाख 63 हजार 930 लोगों को भेजा गया है. बाकी लोगों को भी नोटिस जारी किया जाएगा.
अधिकारियों ने बताया कि जिन लोगों को नोटिस मिला है, वो संबंधित इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (ERO) या असिस्टेंट ERO (AERO) के पास अपना जवाब और जरूरी दस्तावेज जमा कर सकते हैं. इन मामलों में सुनवाई 29 अक्टूबर तक जारी रहेगी. अंतिम वोटर लिस्ट 4 नवंबर को जारी की जाएगी.
वीडियो: रेखा गुप्ता, एस जयशंकर समेत दिल्ली SIR में 33 लाख मतदाताओं के रिकॉर्ड पर सवाल












