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घर से बाहर घूमती लड़कियां इन 'मर्दों' से बर्दाश्त नहीं होतीं

महिलाओं ने काफी तरक्की कर ली है. अब वो सिर उठाकर अधिकार मांगने पर आमादा हैं. बस अब बहुत हुआ! अब इस देश को पीछे जाना चाहिए. यह महिलाओं के लिए अतीत में लौटने का वक्त है.

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स्त्रियों के खिलाफ़ असंख्य साजिशें तैयार की जा रही हैं. (COURTESY: PTI)

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  • जमुई में महिलाओं के खिलाफ बढ़ती हिंसा और अमानुषता के चलते सामाजिक चुनौतियों पर व्यापक चर्चा की गई है, जिसमें पितृसत्तात्मक संरचनाएं महिला अधिकारों के लिए बाधाएं उत्पन्न कर रही हैं।
  • महिलाओं के खिलाफ असंख्य साजिशें और पुराने पूर्वाग्रहों ने पितृसत्तात्मक समाज में असंतोष और नफरत को जन्म दिया है, जो उनके विरोध और अधिकार मांगने के प्रयासों को विफल करने का कारण बनता है।
  • समाज में महिला सशक्तिकरण के बावजूद पितृसत्तात्मक दबाव और नकारात्मकता के कारण महिलाओं को चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, जिसके कारण भविष्य में उनकी सुरक्षा और समानता सुनिश्चित करने की आवश्यकता है।

कहां से बात शुरू की जाए. जमुई से? गुरुग्राम से? या ग्वालियर से? या 2018 से जब सहारनपुर की एक लड़की ने स्कूल के रास्ते पर खड़े चार लड़कों के डर से अपनी पढ़ाई, अपना करियर, अपनी संभावनाओं को छोड़ दिया था? या दिसंबर 2012 की सर्दियों से? या 1978 के उस बहुचर्चित तलाक से? या और अतीत में चला जाए? बात धार्मिक किताबों में दर्ज महिलाओं से भी शुरू की जा सकती है? भरी सभा में जिसकी साड़ी उतारी जा रही है. गुफा मानवों की दुनिया में चला जाए क्या? या और अतीत, और अतीत में जाया जाए? या फिर वर्तमान में ही रुका जाए? क्यों न कुछ देर ठहरकर बात की जाए और भविष्य को लेकर सोचने की कोशिश की जाए? फिलहाल जमुई से ही बात शुरू करते हैं.

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यह एक गंभीर समय है. जैसे स्त्रियों के लिए कौन सा समय गंभीर नहीं रहा है. यह कतई मत समझिए कि जमुई या गुरुग्राम या ग्वालियर में जो हुआ, वही इस समाज का सबसे निकृष्टतम, सबसे हीनतम, सबसे अधम चेहरा है. पशुता लगातार अपग्रेड हो रही है. हर नया चेहरा पिछले से ज्यादा क्रूर, वीभत्स और हिंसक होता जा रहा है. जमुई की घटना को ही न्यूनतम मान लेना जल्दबाजी होगी. अमानुषता के और अधिक नृशंस चेहरों पर लगातार काम चल रहा है.

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स्त्रियों के खिलाफ़ असंख्य साजिशें सहसा तैयार हो जा रही हैं. बहुत सारी, बहुत गूढ़ और विचित्र बाधाएं सामने आने वाली हैं. कई साल से पूर्वाग्रह की विरासत को थामे पुरुषों से यह समाज अब बर्दाश्त नहीं हो रहा. बच्चे के स्कूल की प्रिंसिपल एक स्त्री है. उसे पढ़ाने वाली टीचर भी. टीका लगाने वाली डॉक्टर भी. ग्रेटर नोएडा का वो किराए का फ्लैट भी एक स्त्री के नाम पर है. हर महीने 15 तारीख़ को वो पैसों के लिए टोक देती है. जमुई की विधायक भी एक स्त्री है. ऐसा लग रहा है कि सदन में 33 फीसदी महिलाएं भी आ ही जाएंगी.

2026 की इंडिया टुडे की 'द शी' लिस्ट में वंदे भारत की लोको पायलट ऐश्वर्या एस. मेनन को शामिल किया गया था. अवनी चतुर्वेदी, भावना कंठ और मोहना सिंह की तिकड़ी के बारे में भी आपने सुना ही होगा. जून 2016 में तीनों को भारतीय वायुसेना की पहली महिला फाइटर पायलट के रूप में कमीशन मिला था. अवनी चतुर्वेदी रीवा, मध्य प्रदेश से हैं और भावना कंठ दरंभगा, बिहार से. ग्वालियर वाला मध्य प्रदेश और जमुई वाला बिहार.

रेल से लेकर हवाई जहाज तक, जहां देखो स्टीयरिंग स्त्रियों के हाथ में है. पुरुषों के लिए यह कठिन दौर है. इन मुश्किल दिनों का इलाज हेमपुष्पा से भी नहीं हो सकता. पूरे पितृसत्तात्मक समाज की नसों में स्त्रियों के खिलाफ गुस्सा घुल गया है. असंतोष क्रूर होते-होते अब नफ़रत का रूप ले चुका है. कभी सड़कों पर उतरकर नारे लगातीं तो कभी हाथ से पुलिस गाड़ी को रोक देती स्त्रियां इस कुंठित समाज का हीमोग्लोबिन लगातार घटा रही हैं. रक्तचाप बढ़ता जा रहा है इसलिए स्त्रियों को अब और अधिक तैयार रहना होगा.

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ये बाधाएं किसी कॉन्टेंट या सिनेमा से नहीं जन्मी हैं. ना ही इन्हें किसी ने इंजेक्ट किया है. इसकी ट्रेनिंग कहीं नहीं दी जाती. ये बाधाएं हमारी ग्रंथियों में हैं. हमेशा से. हमारी बातचीत में हैं. हमारी आंखों, हमारी देहभाषा, हमारी कल्पनाओं और हमारी आत्मा का हिस्सा बन चुकी हैं. आपको शायद अंदाजा भी नहीं है कि कितनी अदृश्य रुकावटें आपके लिए तैयार की जा रही हैं. कितनी नई बाधाओं को क्रिएट करने पर काम चल रहा है. आपको रोकने, आपको बाधित करने के तमाम प्रयत्न किए जा रहे हैं.

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छद्म समानता की चमचमाती सड़कों के नीचे मौजूद पितृसत्ता के बंकरों में ज़रूर कोई शोधशाला होगी, जहां सत्ता के, समाज की सत्ता के, पुरुषों की सत्ता के कुछ नुमाइंदे बैठे होंगे या अलग-अलग जगहों से इस समय गूगल मीट पर जुड़े होंगे और तय कर रहे होंगे कि ये देश काफी आगे बढ़ चुका है. महिलाओं ने काफी तरक्की कर ली है. अब वो सिर उठाकर अधिकार मांगने पर आमादा हैं. बस अब बहुत हुआ! अब इस देश को पीछे जाना चाहिए! यह महिलाओं के लिए अतीत में लौटने का वक्त है!

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