कॉमनवेल्थ गेम्स में 24 जुलाई को आखिरकार भारत के मेडल का खाता खुल गया. पैरा पावरलिफ्टर झंडू कुमार ने पुरुषों के हेवीवेट कैटेगरी में ब्रॉन्ज मेडल जीता. ग्रुप बी में शामिल झंडू ने पहले 181 किलो ग्राम का भार उठाया. इसके बाद, उन्होंने 190 किलोग्राम भी उठाया. हालांकि, वह 196 का अटेंप्ट नहीं कर पाए. उनसे फाउल हो गया. अगर यह फाउल न होता तो झंडू के हाथ गोल्ड होता.
सब्जी बेची, ई-रिक्शा चलाया, कहानी झंडू कुमार की, जिन्होंने कॉमनवेल्थ में जीता देश का पहला मेडल
झंडू की सालों की मेहनत और उनके त्याग का नतीजा रहा है कि वह पोडियम तक पहुंच पाए. उस पोडियम फिनिश के पीछे उनके सालों का इंतजार हैं. उनकी कहानी से आप समझेंगे कि हर खिलाड़ी जो मेडल जीतता है, वह उसके लिए इतना बड़ा लम्हा क्यों होता है.

झंडू की सालों की मेहनत और उनके त्याग का नतीज रहा है कि वह पोडियम तक पहुंच पाए. उस पोडियम फिनिश के पीछे उनके सालों का इंतजार हैं. उनकी कहानी से आप समझेंगे कि हर खिलाड़ी जो मेडल जीतता है, वह उसके लिए इतना बड़ा लम्हा क्यों होता है?
झंडू कुमार बेचते थे सब्जीझंडू का जन्म बिहार के नालंदा के हरनौत में हुआ था. वह बचपन से ही पोलियो से ग्रस्त थे. उनके पिता सब्जी बेचते थे. बड़े होते हुए कुमार भी पिता की मदद करने लगे. वह प्राइवेट वैन पर बैठकर बिहारशरीफ मंडी जाते थे. एक किमी अपनी ट्राइसाइकिल पर बैठते, सब्जियां खरीदकर लाते और फिर उसे बेचते. उस समय भी कुमार को वर्क आउट करने का शौक था. वह शाम में चार बजे दुकान बंद करके जिम जाते थे. यही उन्हें खुशी देता था. उन्होंने सालों तक इस बात को छुपा कर रखा. इसकी प्रेरणा उन्हें सलमान खान से मिली थी. दबंग फिल्म देखने के बाद उन्हें बॉडी बनाने का मन हुआ. वह जानते थे कि शरीर का निचला हिस्सा पैरालाइजड है. लेकिन, वह अपर बॉडी सलमान खान की तरह बना सकते हैं.
वर्कआउट करते हुए उन्हें मालूम हुआ कि वह पावरलिफ्टिंग में करियर बना सकते हैं. उनके पास उस समय फोन नहीं था. वह दूसरों के फोन में वीडियो देखते और ट्रेनिंग करते. ट्रेनिंग करना मुश्किल नहीं था. मुश्किल था न्यूट्रिशन का ध्यान रखना. उन्हें कभी-कभी ही कुछ ढंग का खाने को मिलता. उन्हें फिर साथ मिला गौतम सिंह का. बतौर कोच उन्होंने न सिर्फ ट्रेनिंग दी, बल्कि आर्थिक तौर पर भी मदद की. उस समय तक झंडू ने दोस्तों से उधार लेकर ई-रिक्शा लिया.
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अपने कोच की सलाह पर उन्होंने धीरे-धीरे प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेना शुरू किया. लेकिन, इसके लिए पैसों की जरूरत होती थी. साल 2023 में नेशनल चैंपियनशिप में हिस्सा लेने के लिए उन्होंने इसी ई-रिक्शा को बेच दिया. उन्हें लगा कि इस चैंपियनशिप में बिहार के लिए मेडल जीतने पर उन्हें पैसे मिलेंगे. लेकिन, वह हार गए. उन्हें नौकरी नहीं मिली, लेकिन नेशनल कोचेज की नजरों में वह आ गए. उन्हें नेशनल कैंप में चुन लिया गया और उनकी सारी परेशानियां खत्म हो गईं. अच्छी ट्रेनिंग और अच्छी डाइट. अपने पहले कॉमनवेल्थ गेम्स में वह बिहार के लिए मेडल जीतने वाले पहले पैरा वेटलिफ्टर बन गए. इस जीत ने उनके आत्मविश्वास को बढ़ाया है और वह इसे अब जारी रखना चाहते हैं.
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