
अल्पेश ठाकोर ने शराब पर कड़े कानून लाने के लिए आंदोलन किया था. (फोटो:Facebook)
कानून कोई सरकार ही बना सकती है, इसलिए गुजरात सरकार ने इसे बनाया. लेकिन इसके पीछे जिस एक शख्स का हाथ था, उसका नाम है अल्पेश ठाकोर. वो अल्पेश ठाकोर, जिसने शराबबंदी कानून को लेकर पूरे गुजरात में आंदोलन किया. अल्पेश के शराब के खिलाफ चलाए गए आंदोलन को बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही पार्टियों ने समर्थन दिया था. गुजरात कांग्रेस के अध्यक्ष भरत सिंह सोलंकी ने कहा था कि हम शराबबंदी के मुद्दे पर अल्पेश का समर्थन कर रहे हैं. और कौन ऐसा नहीं होगा, जो इस मुद्दे पर उनका समर्थन करेगा. भरत सिंह ने कहा था कि अभी अल्पेश ने कोई राजनैतिक मांग नहीं की है और अगर वो ऐसा करते हैं तो फिर देखा जाएगा. वहीं गुजरात बीजेपी के उपाध्यक्ष आईके जडेजा ने कहा था कि जब तक अल्पेश की मांग सामाजिक सरोकारों से जुड़ी है, हम उनका समर्थन करते रहेंगे. शराबबंदी आंदोलन के दौरान अल्पेश ठाकोर ने कहा था-
"पूरे भारत में सबसे ज्यादा अगर शराब कहीं भी पी जाती है, तो वो गुजरात है, जहां शराब पर पाबंदी है. आपको बता दूं कि यहां हर हफ्ते 200 करोड़ रुपये से ज्यादा सरकारी नुमाइंदों, अफसरों और राजनेताओं को दिया जाता है. हर साल 40-50 हजार करोड़ रुपये की शराब गुजरात में पी जाती है."इसके बाद अल्पेश ने 'जनता रेड टीम' बनाई और गैरकानूनी देसी शराब बनाने वालों के यहां छापेमारी शुरू कर दी. इस दौरान अल्पेश ने कहा था-
18 से 35 साल के लगभग 30 हजार लोग हर साल शराब की वजह से मर जाते हैं. उत्तरी और मध्य गुजरात में समस्या बड़ी है. अल्पेश ने मांग की थी कि जब बिहार में शराबबंदी कानून तोड़ने वालों के लिए 10 साल की सजा है, तो ऐसा ही गुजरात में भी होना चाहिए.अल्पेश ठाकोर ओबीसी समुदाय से ताल्लुक रखते हैं. गुजरात में 22 से 24 फीसदी ठाकोर हैं. अल्पेश खुद युवा हैं और हमेशा ओबीसी समुदाय के हक और हुकूक की बात करते रहते हैं. रहने वाले अहमदाबाद के एंडला गांव के हैं, जो हार्दिक पटेल के गांव के पास में ही है. अल्पेश समाजसेवा के साथ ही खेती और रियल एस्टेट का कारोबार करते हैं. 23 अक्टूबर को उन्होंने कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की मौजूदगी में कांग्रेस का दामन थाम लिया. यह उनकी कांग्रेस में घर वापसी है. इससे पहले भी अल्पेश 2009 से 2012 तक कांग्रेस में रह चुके हैं.
सरकार ने अल्पेश की बात मान ली और शराब के कानून और कड़े कर दिए. लेकिन अल्पेश की ये कहानी पूरी नहीं है.

अल्पेश (काले घेरे में) कांग्रेस के टिकट पर जिला पंचायत का चुनाव लड़ चुके हैं.
2012 में लड़ा था जिला पंचायत चुनाव
अल्पेश ठाकोर के पिता खोड़ाजी ठाकोर कांग्रेस के अहमदाबाद के ग्रामीण जिलाध्यक्ष रहे हैं. इसके पहले खोड़ाजी शंकर सिंह वाघेला के साथ बीजेपी से जुड़े थे. जब वाघेला ने बीजेपी छोड़कर कांग्रेस का दामन थाम लिया तो खोड़ाजी भी कांग्रेसी हो गए. हालांकि 2017 में ही शंकर सिंह वाघेला ने कांग्रेस भी छोड़ दी, लेकिन खोड़ाजी बने रहे. उनके बेटे अल्पेश ने 2012 के जिला पंचायत चुनाव में मांडल सीट से बतौर कांग्रेस प्रत्याशी चुनाव लड़ा था. लेकिन वो हार गए थे. हालांकि इसके बाद अल्पेश ने अपना सियासी कद इतना बढ़ा लिया कि पहले बीजेपी और फिर कांग्रेस दोनों ने उनपर डोरे डालने शुरू कर दिए. कांग्रेस को इसमें कामयाबी भी मिली और चुनाव के ठीक पहले अल्पेश कांग्रेस में शामिल हो गए.ओबीसी को किया था एकजुट

अल्पेश ने ओबीसी की 146 जातियों को एक साथ लाने का दावा किया था.
पंचायत चुनाव हारने के बाद अल्पेश ने कांग्रेस का साथ छोड़ दिया था. गुजरात में ओबीसी समुदाय में 146 जातियां हैं. अल्पेश ने इन सभी को एकजुट करने का बीड़ा उठाया और इसके लिए सामाजिक आंदोलन की ओर चले. राज्य में बिक रही अवैध शराब के खिलाफ मुहिम के लिए उन्होंने गुजरात क्षत्रिय-ठाकोर सेना का गठन किया. इस मुहिम से ही उन्हें ओबीसी का साथ मिला. फरवरी 2017 में अहमदाबाद में ओबीसी की एक रैली में उन्होंने ऐलान किया कि गुजरात का अगला मुख्यमंत्री बीजेपी से नहीं, हमारा होगा. उनके इस संगठन में 6.5 लाख लोग रजिस्टर्ड हैं.
बनाया था एकता मंच

ओबीसी की सभी जातियों को एक साथ करने के बाद वो एससी और एसटी को भी एक ही मंच पर लेकर आए.
जनवरी 2016 में अल्पेश ने एकता मंच बनाया था. इसके तहत उन्होंने ओबीसी, एससी और एसटी समुदाय के लोगों को अपने साथ जोड़ा है. अल्पेश ने ये मंच पाटीदार आंदोलन के खिलाफ बनाया है. 2016 में मीडिया को दिए बयान में उन्होंने कहा था कि पाटीदार आंदोलन की वजह से और जातियों में डर बैठ गया है कि उनके आरक्षण में किसी तरह की कटौती की जा सकती है. अल्पेश ने फरवरी 2016 में एकता मंच की रैली में कहा था कि वो न तो चुनाव लड़ेंगे और न ही किसी पार्टी को समर्थन देंगे. अल्पेश ने कहा था कि उनका मकसद है कि गुजरात चुनाव में अच्छे लोग जीतकर विधानसभा पहुंचें. लोग उनको वोट करें, जो गरीबों की चिंता करे और गरीबों के लिए काम करे.
किसानों की कर्जमाफी के लिए किया था आंदोलन

किसानों का लोन माफ करने के लिए अल्पेश के नेतृत्व में आंदोलन हुआ, जिसमें किसानों ने सड़क पर दूध बहाया था.
6 जुलाई 2017 को मीडिया में तस्वीरें आईं कि गुजरात की सड़क पर किसान दूध बहा रहे हैं. ये किसान कर्जमाफी की मांग कर रहे थे. इस आंदोलन के पीछे भी अल्पेश ठाकोर का ही हाथ था. उन्होंने किसानों को संगठित किया और कहा कि वो लोग अपना दूध शहरों तक न भेजें. अल्पेश के समर्थन में किसानों ने दूध सड़क पर बहा दिया. इस पर भी किसानों की बात नहीं मानी गई, तो अल्पेश ने आमरण अनशन करने की चेतावनी दी. इससे पहले अल्पेश ने गुजरात सरकार से बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर की मूर्ति की मांग को लेकर आंदोलन किया था. जब बीजेपी ने सरदार सरोवर बांध के पास सरदार वल्लभ भाई पटेल की 182 मीटर ऊंची मूर्ति लगाने का प्रस्ताव रखा था और उस पर अमल शुरू किया था, तो अल्पेश ने भी मांग रखी. अल्पेश ने कहा था कि वो सरदार पटेल की मूर्ति का विरोध नहीं कर रहे हैं, लेकिन जिस बाबा साहब अम्बेडकर ने देश को संविधान दिया है, उनकी भी उतनी ही ऊंची मूर्ति लगनी चाहिए. इसके अलावा अल्पेश ने निजी संस्थानों में भी आरक्षण देने की मांग की थी.
सोशल मीडिया पर सर्वे कर 25 लाख लोगों के समर्थन का दावा

23 अक्टूबर को राहुल की मौजूदगी में अल्पेश ने कांग्रेस जॉइन कर ली.
गुजरात क्षत्रिय-ठाकोर सेना और उसके बाद एकता मंच बनाने वाले अल्पेश ठाकुर की सियासत में एंट्री कैसे हुई. इसका जवाब खुद अल्पेश देते हैं. उन्होंने बताया-
मेरे सलाहकारों ने कहा कि मुझे राजनीति में आना चाहिए. इसे परखने के लिए हमने डोर-टू-डोर सर्वे करवाया. इसके नतीजे मेरे पक्ष में थे. लगभग 25 लाख लोगों ने मुझे राजनीति में आने और कांग्रेस पार्टी जॉइन करने के लिए कहा. इसके अलावा 1 लाख 40 हजार लोगों ने मुझे बीजेपी जॉइन करने के लिए कहा था. इसका रिजल्ट हमने सोशल मीडिया पर भी शेयर किया था.

अल्पेश ने कांग्रेस के मंच पर गुजरात चुनाव के लिए हुंकार भरी.
अलग-अलग मीडिया समूहों को दिए बयान में अल्पेश ने दावा किया है कि उनका बनाया हुआ एकता मंच का संगठन गुजरात की 182 सीटों में से 138 पर मजबूत स्थिति में है. इसके अलावा उनकी बनाई हुई गुजरात क्षत्रिय-ठाकोर सेना की पहुंच लगभग 9000 गांवों में है. अल्पेश खुद कहते हैं
दोनों को मिलाकर गुजरात में करीब 78 फीसदी वोटों पर हमारे संगठन का प्रभाव है. दोनों संगठनों में तकरीबन 35 से 40 लाख लोग सदस्य हैं.बहरहाल, शराबबंदी आंदोलन से गुजरात की राजनीति में अपनी पकड़ मजबूत करने वाले अल्पेश ने अपना कद स्वतंत्र रहकर बनाया था, लेकिन अब वो कांग्रेस के साथ हैं, इसलिए चुनाव में उनका इम्तहान भी बतौर कांग्रेसी ही होगा.
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