ये एक ग़लत फ़ैसला था जो अलीम दार ने दिया था. बाद में मालूम चला कि ऐसे मौके बहुत ही कम आते हैं जब अलीम दार के दिए फ़ैसले ग़लत साबित हों. मैंने देखा है जब एलबीडब्लू डिसीज़न में गेंद की ट्रैजेक्ट्री से मालूम चलता है कि गेंद का 50% से ज़्यादा हिसा ऑफ स्टम्प के बाहर पड़ा था और इसी वजह से अलीम दार ने नॉट आउट दिया था. ये सब कुछ नंगी आंखों से देखा जाना नामुमकिन है. लेकिन अलीम दार इंसान नहीं मशीन है. 2003 वर्ल्ड कप के दौरान अफवाह सुनी थी कि सचिन ने अपनी आंखों में वो लेंस लगवाया हुआ है जिससे गेंद बड़ी होकर दिखती है. वो मात्र अफवाह थी मगर मैं अलीम दार की आंखों में एक ऐसे ही लेंस की मौजूदगी को सच मानता हूं.
अलीम के ग़लत फ़ैसलों के बारे में एक किस्सा है. किस्सा असल में ग़लत फ़ैसलों के बारे में नहीं बल्कि उनके उस हाथ के बारे में है जो गलती से ग़लत फैसले दे देता है. अलीम दार राइट हैन्डेड हैं. यानी वो अपने सभी काम दायें हाथ से करते हैं. लेकिन जब अम्पायरिंग के दौरान डिसीज़न देने का वक़्त आता है तो वो अपना बायां हाथ इस्तेमाल करते हैं. इसके बारे में जब उनसे पूछा गया तो वो बताते हैं कि वो इस्लाम धर्म में और धर्म की सिखाई हुई चीज़ों में काफी विश्वास रखते हैं. वो खुद एक धार्मिक व्यक्ति हैं और उनके धर्म में दायें हाथ की पहली उंगली का शहादत की उंगली कहलाती है. इस्लाम में जब नमाज़ अता की जाती है तब अल्लाह का नाम आने पर नमाज़ी अपने दायें हाथ की पहली उंगली उठाता है. इसलिए वो उंगली पाक, उंगली कहलाती है. और अलीम दार कतई नहीं चाहते कि उनकी उस उंगली से कोई भी ग़लत फ़ैसला दिया जाए. इसलिए वो इस बात का ख़ास ख्याल रखते हैं कि कोई भी डिसीज़न देते वक़्त वो दायें हाथ से न दें. और गलती से ही सही, उस पवित्र उंगली से कोई ग़लत फ़ैसला दे दिया जाए. लाहौर के सिविल लाइंस में इस्लामिया कॉलेज से पढ़ाई करने वाले अलीम सरवर दार अब 322 इंटरनेशनल मैचों में खड़े हो चुके हैं. और ये एक रिकॉर्ड है. उनसे ज़्यादा मैचों में कोई भी अम्पायर खड़ा नहीं हुआ है. अलीम दार पहली बार पाकिस्तान और श्री लंका के बीच जिन्ना स्टेडियम में 16 फरवरी 2000 को खड़े हुए थे. 2 साल बाद आईसीसी के इंटरनेशनल पैनल ऑफ़ अम्पायर में उनका नाम लिख दिया गया. इसके बाद उन्हें सबसे बड़ी सफ़लता मिली 2003 में जब उन्हें वर्ल्ड कप में अम्पायरिंग के लिए चुना गया. एक क्रिकेटर की तरह अम्पायरों के लिए भी वर्ल्ड कप मैच में खड़े होना मायने रखता है. इसके बाद 2004 में अप्रैल माह में उन्हें आईसीसी ने एलीट अम्पायर्स पैनल में रख लिया. 2005 और 2006 में उन्हें लगातार अम्पायर ऑफ़ द इयर के लिए नॉमिनेट किया गया. दोनों की मौकों पर उन्हें ऑस्ट्रेलिया से आने वाले अम्पायर साइमन टॉफ़ल ने पीछे किया. अपने करियर के मात्र 7 सालों में वो 100 मैचों में अम्पायरिंग कर चुके थे. ये भी एक रिकॉर्ड था. 2011 क्रिकेट वर्ल्ड कप. वो वर्ल्ड कप जिसकी ट्रॉफी धोनी और बाद में हर इंडियन क्रिकेट प्लेयर ने उठाई. उस वर्ल्ड कप में सिर्फ इंडियन टीम ही नहीं जीती थी. उसमें अलीम दार भी जीते थे. ये वो वर्ल्ड कप था जिसमें अंपायरिंग डिसीज़न रिव्यू सिस्टम लागू था. इसमें कोई भी प्लेयर अम्पायर के डिसीज़न को भी चैलेन्ज करते हुए उसका रिव्यू करवा सकता था. पूरे वर्ल्ड कप में 15 बार अलीम दार के फ़ैसलों को चैलेन्ज किया गया. और थर्ड अम्पायर के रिव्यू के बाद हर मौके पर ये मालूम चला कि जो अलीम दार ने कहा था वो सही था. और यही अलीम दार का सबसे मारक पॉइंट है. अलीम दार माने खरापन.












