उन्होंने 28 जनवरी को दुनिया के सात मुस्लिम बहुल देशों के नागरिकों के अमेरिका में घुसने पर 90 दिनों के लिए रोक लगा दी. यमन, ईरान, इराक, लीबिया, सूडान, सीरिया और सोमालिया के लोग अब अमेरिका नहीं जा सकते. दुनिया भर में, और अमेरिका में भी इस फैसले की खूब आलोचना हो रही है. ईरान ने आगे आकर यहां तक ऐलान कर दिया कि अब अमेरिकी नागरिकों के ईरान आने पर भी रोक रहेगी. हर तरफ हो रही थू-थू के बीच पूर्व पाकिस्तानी क्रिकेटर इमरान खान का एक बयान आया है.
पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) पार्टी के अध्यक्ष इमरान का मानना है कि ज़्यादातर पढ़े-लिखे लोग इसलिए अपना देश छोड़कर चले जाते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि पाकिस्तान में रहे तो अच्छी नौकरी तभी मिलेगी जब वो किसी ताकतवर शख्स को जानते हों.
इमरान खान. (फोटोः रॉयटर्स)
क्रिकेट की पिच से राजनीति के मैदान में आए इमरान ने कहा, "अब जब डॉनल्ड ट्रंप अमेरिका के राष्ट्रपति बन गए हैं, संभावना है कि उनका ट्रैवल बैन पाकिस्तानियों पर भी लागू होगा. मैं सोचता हूं कि उन्हें ऐसा कर ही देना चाहिए..." यहां रुक जाते तो बवाल हो जाता. लेकिन इमरान ने आगे जोड़ा, "...कम से कम तब हम अपने देश के मुद्दों पर ध्यान दे पाएंगे"
उन्होंने ये भी कहा, "जिस दिन हम ये तय कर लेंगे कि पाकिस्तान ही हमारा घर है, और हमें इसे बेहतर बनाना है, हमें IMF (अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोश) और अमेरिका के आगे भीख नहीं मांगनी होगी." पाकिस्तान की सरकार पर तंज़ कसते हुए इमरान ने ये कहा कि जिस दिन पाकिस्तान को वो सरकार मिल जाएगी, जो ये तय कर लेगी कि उसे मुल्क में ही जीना-मरना है, पाकिस्तान के हालात सुधर जाएंगे.इमरान ने अपनी बात एक खास मतलब से कही. वे अपने देश के हालात पर राय रख रहे थे. उनकी बात के जायज़-नाजायज़ होने पर बहस हो सकती है. लेकिन ट्रंप का ये फैसला न सिर्फ घटिया है बल्कि इससे ट्रंप की नीयत पर भी सवाल उठते हैं. बैन मुस्लिम आबादी वाले देशों पर लगाया गया है. ये कहकर कि यहां के नागरिक अमेरिका के लिए खतरा बन सकते हैं.
बावजूद इसके, मिस्र, सउदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के नागरिकों पर प्रतिबंध नहीं लगाया गया है. 11 सितंबर 2001 को वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए हमलों में जिन 19 आतंकवादियों का हाथ था, उनमें से 18 इन्हीं देशों से आते थे. इसके अलावा इनका मास्टर माइंड ओसामा बिन लादेन भी सउदी अरब से ही था. उसका मददगार अयमान अल ज़वाहिरी मिस्र का नागरिक था. ट्रंप के बैन में इस्लामिक देश तुर्की भी शामिल नही हैं. तब, जब तुर्की में लगातार आतंकी घटनाएं हुई हैं और राजनीति में भी उठापटक जारी है. रूस के राजदूत आंद्रे कारलोव की दिनदहाड़े हत्या तक तुर्की में हो गई. ट्रंप के अजीबोगरीब लॉजिक के हिसाब से चला जाए तो इन देशों के नागरिकों पर बैन लगना चाहिए था.

अपने आदेश पर दस्तखत करते ट्रंप. (फोटोः रॉयटर्स)
जितनी जानकारी सामने है, वो यही इशारा कर रही है कि ट्रंप ने बदमाशी की है. उन्होंने उन इस्लामी देशों को अपनी बैन वाली लिस्ट से बाहर रखा जिनमें उनका खुद का कारोबार है. न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक सउदी अरब में ट्रंप कॉर्पोरेशन का काफी निवेश है. मिस्र में भी इनकी दो कंपनियां हैं. संयुक्त अरब अमीरात में भी उनका एक गोल्फ रिज़ॉर्ट, एक स्पा और दूसरी प्रॉपर्टी हैं. ट्रंप दुनिया भर में कारोबार करते हैं. इसके अलावा उनका conflict of interest कितना है ये तब ज्ञात हो जाएगा जब ट्रंप अपनी टैक्स-संबंधित जानकारी सार्वजनिक करेंगे जो अभी नहीं की गई है.

ट्रंप के आदेश के खिलाफ ओरेगॉन में प्रदर्शन करते लोग. (फोटोः रॉयटर्स)
अमेरिका अपने राष्ट्रपति को 'लीडर ऑफ द फ्री वर्ल्ड' कहकर इतराते नहीं थकता. लेकिन ट्रंप ने जिस तरह की शुरुआत की है, उससे ये कतई नहीं कि लगता कि उनमें कहीं के भी लीडर के गुण हैं. अपनी एक सही/गलत पॉलिसी को लागू करने में भी वो अपने हितों को नज़रंदाज़ नहीं कर रहे. इसके अलावा वो दुनिया के 'फ्री' रहने के हिमायती भी नहीं हैं. चुनाव प्रत्याशी के तौर पर उनकी बयानबाज़ी एक बात थी. लेकिन बतौर दुनिया के सबसे ताकतवर मुल्क के रहनुमा, उनके बेहूदा फैसले दुनिया भर के लोगों की ज़िंदगियां बरबाद कर सकते हैं, और इसकी शुरुआत हो गई लगती है.
ये भी पढ़ेंः
'मिस्टर प्रेसिडेंट, आप शरणार्थियों को नहीं निकाल सकते': अमेरिकी कोर्ट















