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इस चड्डी को कई डांग कू कहा जाता है. हिंदी में कहते हैं 'ओपन पैंट.' (हम कह रहे हैं तो हिंदी ही है) इस स्पेशल पैंट में पीछे बड़ा सा छेद होता है. इसे आप 'होली चड्डी' ;) भी कह सकते हैं. और चाइनीज पीपल अपनी परम्परा से इतना बंधे हैं कि उनकी दुकानों पर बिना छेद वाली चड्डी मिलेगी ही नहीं. डायपर मिल सकता है. डायपर पहनाना उधर लग्जरी है. हालांकि वहां भी लोग अब प्रगतिशील हो गए हैं तो इस चड्डी से दूर भाग रहे हैं.
पूछो काहे
नंबर दो आ जाए तो आसान रहता है. मम्मी पापा लोग कहते हैं कि इससे लैट्रीन में बैठने की आदत सही लग जाती है बच्चों की. इसमें प्वाइंट तो कोई है नहीं गुरू. हमारे यहां भी बच्चे होते हैं और सर्र से सरकाकर निपटा लेते हैं.
रास्ता इधर से है
हमारे चीची बाबू गोविंदा को भी 'जिस देश में गंगा रहता है' में आइडिया यहीं से आया था. उल्टी पैंट पहनने का. ज़िप को पीछे की तरफ रखने का.

चीची
टोटल छीछालेदर
वो बच्चों को पहनाते तो अपनी सहूलियत के लिए हैं. लेकिन गली मोहल्ला सब गंधाया रहता है. जहां देखो वहीं पॉटी करने बैठा देते हैं. जहां गंदगी रहेगी वहां बीमारी रहेगी. जहां बीमारी रहेगी वहां डॉक्टर रहेगा. यानी जितना पैसा वो साबुत चड्डी में बचाते हैं उतना दवा में लगा देते हैं. फिलहाल कई डांग कू का इस्तेमाल इंटरनेशनल बहस का मुद्दा है. कुछ लोग कह रहे हैं कि ये पर्यावरण के लिए खराब है. कुछ कह रहे कि नहीं है. राम जाने सच क्या है. लेकिन हमको तो भई ये पिछवाड़ा खोले बच्चे तभी तक अच्छे लगते हैं जब तक छिच्छी कर नहीं लेते.ये भी पढ़ें:
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