देश को खुले में शौच मुक्त वाले अभियान को लोग सीरियसली क्यों नहीं लेते? कुछ लोग कहते हैं कि इससे दिशा-मैदान जाते वक्त जो मॉर्निंग वॉक होती है वो छूट जाती है. कुछ लोग कहते हैं कि सामूहिक शौच निपटान के चलते जो एक सामजिक एकजुटता का उदाहरण सेट होता है और गप्पों का आदान प्रदान होता है वो चारदीवारी में पॉटी करने से सर्वथा छूट जाता है. लेकिन ये सब एक्सक्यूजेज़ हैं. क्यूंकि इन दोनों (मॉर्निंग वॉक, गप्पों के आदान प्रदान) ही के अन्य विकल्प उपलब्ध हैं. लेकिन एक चीज़ है जिसका कोई विकल्प नहीं. और वो है ये तथ्य कि - शौच कहीं भी आ सकती है! होने को ये यदा-कदा ही होता है, लेकिन विशेष परिस्थितियों में फ्रीक्वेंसी बढ़ जाती है और आप ज़्यादा बार प्रेशर में आने लगते हैं. जैसे डायरिया. ऐसा ही कुछ हुआ हमारी खबर के लीड करैक्टर - वू ज़ियांगडोंग के साथ. 21 किलोमीटर की 'शंघाई हाफ मैराथन' चल रही थी और 14 वें किलोमीटर में 'वू' के साथ 'वो' हुआ जो शायद उसके सबसे बुरे सपने के सच हो जाने से भी बुरा था. उसे पॉटी लग गई. लेकिन शायद 'शो मस्ट गो ऑन' को अपनी मोटिवेटिंग लाइन बना चुके वू ने कपड़ों में ही शौच निपटान कर लिया और दौड़ना जारी रखा. उसी स्थिति में. अगला, अगले 7 किलोमीटर तक उसी स्थिति में दौड़ता रहा और आश्चर्यजनक रूप से रेस में फर्स्ट भी आ गया. प्रश्न ये है कि 1 घंटे 16 मिनट 6 सेकंड में अपनी रेस पूरी करके जब वो फिनिंशग लाइन में पहुंचा होगा तब उसने राहत की सांस ली होगी या फिर उससे 7 किलोमीटर पहले?
वैसे वू ने भी रेस समाप्त होने के बाद कुछ कहा है -
मैं इस सब के बावज़ूद दौड़ता रहा और रुका नहीं. मैं अफ्रीकन धावक को हराना चाहता था. होने को मुझे खुद भी बदबू जानलेवा लग रही थी. अगर ये (पॉटी) न हुई होती तो निश्चित तौर पर मैं और तेज़ दौड़ सकता था. ये शायद इसलिए हुआ क्यूंकि मैंने गीले कपड़े पहने थे. या फिर शायद इसलिए कि मैंने रेस से पहले सिर्फ एक ब्रेड खाई और पानी पिया. मैं इस रेस को याद नहीं रखना चाहूंगा.
चलिए जाते-जाते आपको एक गीत के साथ छोड़े जाते हैं-
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