बॉम्बे हाई कोर्ट के पूर्व जज आरसी चव्हाण ने समान नागरिक संहिता (UCC) का ड्राफ्ट तैयार करने वाली कमिटी से इस्तीफा दे दिया. कमिटी के काम करने के तरीकों पर सवाल उठाते हुए उन्होंने 19 सितंबर को समिति की अध्यक्ष और सुप्रीम कोर्ट की पूर्व जज जस्टिस रंजना देसाई को अपना इस्तीफा ईमेल किया है. इसमें पूर्व जज जस्टिस चव्हाण ने आरोप लगाया कि मीटिंग को जल्दबाजी में बिना ठीक से चर्चा किए खत्म कर दिया जाता है. उन्होंने दावा किया कि कमिटी की एक मीटिंग में ‘बाहरी’ व्यक्ति को बैठाया गया था.
महाराष्ट्र की UCC कमिटी में ही सब 'बराबर' नहीं? जस्टिस चव्हाण का इस्तीफा बड़े सवाल खड़े कर गया
बॉम्बे हाईकोर्ट के पूर्व जज आरसी चव्हाण ने महाराष्ट्र की UCC कमिटी से इस्तीफा दे दिया है. उन्होंने समिति के काम करने के तरीके, प्रश्नावली और बैठक में गैर-सदस्य की मौजूदगी पर आपत्ति जताई.

‘कटाक्ष की भाषा में’ जस्टिस चव्हाण ने कहा कि अगर उस व्यक्ति को कमिटी में शामिल किया ही जाना है तो उनके इस्तीफे से एक जगह खाली हो रही है. सरकार उस जगह पर किसी को भी नियुक्त कर सकती है. इसके अलावा उन्होंने UCC की प्रश्नावली और मीटिंग के एजेंडे पर भी आपत्ति जताई.
जुलाई में बनी थी समितिजस्टिस चव्हाण साल 2013 में बॉम्बे हाईकोर्ट के जज के पद से रिटायर हुए थे. जुलाई 2026 में महाराष्ट्र सरकार ने समान नागरिक संहिता (UCC) के लिए नियमों का ड्राफ्ट तैयार करने और कुछ सिफारिशों के लिए 7 सदस्यों वाली एक समिति का गठन किया था. इसमें जस्टिस चव्हाण को भी शामिल किया गया था. जब से ये समिति बनी है, तब से इसकी कई बैठकें हुई हैं. जस्टिस चव्हाण की आपत्ति है कि मुद्दों पर बिना पर्याप्त चर्चा किए ही ये मीटिंग्स खत्म कर दी जा रही थीं. तंज करते हुए एक मीटिंग के बारे में उन्होंने कहा कि ये वाकई अच्छा हुआ कि बिना इधर-उधर की बात किए इसे जल्दी खत्म कर दिया गया. इस मीटिंग में समिति की वेबसाइट में बदलाव की चर्चा की गई थी.
जस्टिस चव्हाण के मुताबिक, इसी मीटिंग में एक ऐसा व्यक्ति भी बैठा था, जिसका जिक्र समिति की अध्यक्ष पूर्व जज रंजना देसाई ने पिछली मीटिंग में किया था. वो ‘बाहरी’ व्यक्ति कमिटी का मेंबर नहीं था. जस्टिस चव्हाण ने कहा कि अगर सरकार किसी और को समिति में शामिल करना चाहती है तो उनके इस्तीफे से खाली हुई जगह पर उसकी नियुक्ति कर सकती है.
जस्टिस चव्हाण की अन्य आपत्तियां‘जल्दबाजी में बैठकें’ और ‘बाहरी व्यक्ति’ की आपत्ति के अलावा भी कई मुद्दों पर जस्टिस चव्हाण समिति से चिढ़े थे. उन्होंने बताया कि कमिटी के तीन लोगों ने क्वेश्चनेयर में बदलाव का सुझाव दिया था. इनमें जनता से मिलने वाले जवाबों को सिर्फ ‘हां या ना’ के उत्तर तक सीमित कर दिया गया था. इसके साथ ही प्रश्नावली के प्रोफेशनल रिव्यू का भी सुझाव था. लेकिन कमिटी की चेयरपर्सन रंजना देसाई पहले से ही तैयार खुद का क्वेश्चनेयर लेकर आई थीं. उन्होंने इसे सदस्यों को दिया और कहा कि वेबसाइट बनते ही इसे उस पर अपलोड कर दिया जाएगा.
इसे लेकर जस्टिस चव्हाण ने कहा कि उन्हें लगता था कि समिति का मकसद पूरे प्रदेश के लोगों से राय लेना और अलग-अलग मुद्दों पर एक सहमति बनाने की कोशिश करना है. इनमें देर से होने वाली शादियां, संतान न होना, नाजुक वैवाहिक रिश्ते और विवादों को सुलझाने में होने वाली देरी जैसे मुद्दे शामिल थे. उन्होंने कहा कि ‘हां या ना’ के जवाब वाली प्रश्नावली ने उन लोगों के लिए कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी, जो इन मुद्दों पर अपनी राय देना चाहते हैं. जब इन मुद्दों को हटा दिया गया तो उन्हें लगा कि समिति का मकसद जनता को सिर्फ ‘हां या नहीं’ में ही जबाव देने का मौका देना है. ये सब होने के बाद जस्टिस चव्हाण मीटिंग से बाहर निकल गए.
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चव्हाण के हिसाब से कैसा हो UCC?पूर्व जज ने ये भी बताया कि उनके हिसाब से UCC का ड्राफ्ट कैसा होना चाहिए. उन्होंने कहा कि UCC का फोकस परिवार को बचाए रखने के साथ-साथ सुरक्षा और लैंगिक समानता तय करने पर होना चाहिए. उनके मुताबिक,
– कानून जेंडर न्यूट्रल यानी महिला और पुरुष दोनों के लिए बराबर होना चाहिए. इसके लिए कानून में ‘पति-पत्नी’ या ‘बेटा-बेटी’ की जगह 'जीवनसाथी' (spouses) और 'बच्चे' (Children) जैसे जेंडर न्यूट्रल शब्दों का इस्तेमाल होना चाहिए.
– UCC को धर्म से अलग रखना चाहिए. यानी यह कानून किसी के निजी धार्मिक तौर-तरीकों में दखल न दे.
– संपत्ति और विरासत में सभी को बराबर अधिकार मिलना चाहिए. वारिसों की अलग-अलग कैटेगरी के आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए.
– बालिग लोगों और अपनी मर्जी से रिश्ता बनाने वाले लोगों को आपसी समझौते के जरिए अपने रिश्तों की शर्तें तय करने की इजाजत होनी चाहिए. सेपरेशन, प्रॉपर्टी, विरासत या बच्चों की जिम्मेदारी मां की होगी या पिता की, जैसे फैसले तय करने का अधिकार उन्हें ही होना चाहिए. ऐसे रिश्तों के आसान और स्वैच्छिक रजिस्ट्रेशन का विकल्प होना चाहिए.
– हर बच्चे को वैध माना जाना चाहिए. बच्चों की जिम्मेदारी उन्हें जन्म देने वाले या फिर गोद लेने वाले माता-पिता की होनी चाहिए. 18 साल की उम्र तक उन्हें बच्चे के पालन-पोषण और पढ़ाई का खर्च उठाना चाहिए.
ये सब बताने के बाद जस्टिस चव्हाण ने इस्तीफे के अंत में लिखा कि अब वो एक स्वतंत्र नागरिक के रूप में इस मुद्दे पर खुलकर अपने विचार रख सकेंगे.
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