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आजादी के बाद से नहीं मिली सड़क, चुनाव बहिष्कार कर सकते हैं 10 गांव

जमीन पर सड़क बनी 15 किलोमीटर, मगर सरकारी फाइलों में पौने 24 किलोमीटर पूरी हो चुकी है!

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गांव के लोगों का कहना है कि जो सिस्टम उन्हें इतने सालों में एक सड़क भी नहीं दे सकता, वो उस सिस्टम का हिस्सा क्यों रहें? क्यों वोट डालें और सरकार चुनें (फोटो: नरेंद्र सिंह नेगी)
दस गांव हैं. एक बड़ी दूर के पहाड़ पर बसे हुए. आज़ादी के इतने सालों बाद भी इन गांवों तक कोई सड़क नहीं पहुंची. कोई काम हो, ज़रूरत हो, तो सबसे नजदीकी सड़क तक पहुंचने के लिए इन्हें एक पूरा दिन पहाड़ों पर खाक छाननी पड़ती है. पिछले कई सालों से ये लोग अपने लिए एक अदद सड़क मांग रहे हैं. कितनी ही सरकारें आईं और गईं. इस पार्टी की, उस पार्टी की सरकार. मगर गांववालों को सड़क नहीं मिली. सब करके हार-थक गए लोगों ने फैसला किया कि वो वोट नहीं डालेंगे. उनका कहना है कि जिस सिस्टम ने उन्हें एक सड़क तक नहीं दी, उस सिस्टम के लिए वोट डालने का फायदा क्या?
गांव के लोग बहिष्कार के समर्थन में नारेबाजी करते हुए
गांव के लोग बहिष्कार के समर्थन में सभा करते हुए...

कहां हैं ये गांव? ये 10 गांव उत्तराखंड में हैं. चीन-भारत सीमा के पास बहुत रिमोट इलाके में. इनके नाम हैं- बेमरू, बजनी, लुदांऊ, स्यून, दुमक, कलगोठ, उच्छों, किमाणा, जखोला और पल्ला. ये सब चमोली जिले में आते हैं. हमने दुमक में रहने वाले जीत सिंह से बात की. उन्होंने बताया कि सड़क की मांग 40 साल पुरानी है. उस साल यहां अलकनंदा नदी में बड़ी बाढ़ आई थी. ये जो इलाका है, वो रोड से बहुत दूर था. तब ये बात उठी कि सड़क बननी चाहिए. इस जगह की लोकेशन ऐसी है कि एक घाटी है. घाटी के दाहिनी ओर सड़क है, जो आगे बद्रीनाथ को जाती है. ये सारे गांव घाटी के बाईं ओर बसे हैं. यहां अक्सर बाढ़ आती है. बाढ़ में कई बार बद्रीनाथ वाली सड़क टूट जाती है. लोगों का कहना है कि इधर वाली साइड भी सड़क बन जाए, तो एक वैकल्पिक रास्ता बचा रहेगा. बद्रीनाथ वाले रोड को आर्मी भी काफी इस्तेमाल करती है. ऐसे में किसी इमरजेंसी के मद्देनज़र भी एक वैकल्पिक सड़क काफी काम आएगी.
जीत सिंह ने बताया कि इन गांवों में 8वीं तक का स्कूल है. दुमक में 9वीं और 10वीं की पढ़ाई के लिए भी एक स्कूल है, जिसे गांववालों ने मिलकर बनाया था. इसके पैसे भी उन्होंने आपस में मिलकर जुटाए. 1998 से 2008 तक गांव के लोगों के चंदे से चलता था स्कूल. हर महीने हर परिवार स्कूल के लिए चंदा देता था. 2008 में जाकर राज्य सरकार ने इसे फंड देना शुरू किया. अस्पताल के नाम पर इन दसों गांवों को मिलाकर दो आयुर्वेदिक डिस्पेंसरीज़ हैं. बाकी कोई दिक्कत हो, डिलिवरी हो, तो गांव के लोग मरीज़ को स्ट्रेचर पर लादकर नदी-जंगल पार करके नज़दीकी रोड पहुंचते हैं.
जीत सिंह ने सड़क का काम रुक जाने की शिकायत भी की. ये उनके शिकायत की कॉपी है (फोटो: The Lallantop)
जीत सिंह ने सड़क का काम रुक जाने की शिकायत भी की. ये उनके शिकायत की कॉपी है

जमीन पर नहीं, सरकारी फाइलों में सड़क बन गई 2007-08 में सरकार ने प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के अंतर्गत इन गांवों को बाकी की दुनिया से जोड़ने के लिए साढ़े 32 किलोमीटर की एक सड़क को मंजूरी दी. काम 2009-10 में शुरू हुआ और फिर बंद हो गया. फिर नया टेंडर 2015 में निकला. इसके मुताबिक अगस्त 2016 तक रोड पूरी बन जानी चाहिए थी. मगर काम पूरा होता, इससे पहले ही रुक गया. जीत सिंह ने इस बात की शिकायत भी की. उनका कहना है कि रेकॉर्ड्स बताते हैं जनवरी 2017 से दिसंबर 2018 तक कोई काम ही नहीं हुआ.
इतने सारे सेटबैक्स के बाद हाल ही में गांववालों को पता चला कि जमीन पर उस रोड का काम भले बस 15वें किलोमीटर तक पहुंचा हो, मगर सरकारी फाइलों में पौने 24 किलोमीटर सड़क पूरी हो चुकी है. इससे गांव के लोग बहुत नाराज़ हुए. जनवरी 2019 में उन्होंने जिला मुख्यालय जाकर प्रदर्शन किया. कलेक्टर को सारी बात बताई. कलेक्टर ने दखलंदाजी की. रोड का काम फिर शुरू हुआ. कुछ दिन सड़क बनी और फिर काम बंद. ग्रामीणों को अपनी मांग न माने जाने का गुस्सा तो है ही. सरकारी रेकॉर्ड्स में घपलेबाजी पर भी बहुत तकलीफ है उन्हें.
'एक अदद सड़क को तरसा दिया, ऐसी सरकारों के लिए वोट क्यों करना?' गांववाले बेहद निराश हैं. उनका कहना है कि जब से मुल्क आज़ाद हुआ, वो इलेक्शन में भागीदारी करते आ रहे हैं. उन्होंने सिस्टम में भरोसा बनाए रखा. लोकतंत्र में यकीन किया. लेकिन आज़ादी के इतने सालों बाद भी वो एक अदद सड़क के लिए तरसाए जा रहे हैं. जिन गांवों के पास सड़क भी न हो, वो बाकी बुनियादी जरूरतों के लिए कितना तरसते होंगे? न ढंग का स्कूल, न अस्पताल. ग्लास में नमक घुलने की भी सीमा होती है. गांववालों को लगता है कि अब उनके सहन करने की सीमा खत्म हो चुकी है. उनका कहना है कि लोकसभा चुनाव का बहिष्कार करके वो एक चेतावनी दे रहे हैं. अगर स्थिति फिर भी नहीं सुधरी, तो वे कभी किसी चुनाव में हिस्सा नहीं लेंगे. यहां के रहने वाले प्रेम सिंह सनवाल का कहना है-
ये चमोली जनपद का सबसे दूरस्थ पोलिंग बूथ है. सरकार को केवल पोलिंग पार्टी भेजने की चिंता है. यहां की जनता कैसे रहती है, क्या करती है, इसकी सरकार को कोई चिंता नहीं. यहां के लोगों ने एक स्वर में ये तय कर लिया है कि जब तक इस गांव में सड़क नहीं आएगी, तब तक हम वोट नहीं देंगे.
उत्तराखंड के दूर-दराज़ के इलाकों में बसे कई गांवों का ऐसा ही हाल है.
प्रेमचंद की ईदगाह का हामिद मेला देखने शहर को गया. उसके साथ के बच्चों ने मेले में मिठाई खाई. खिलौने खरीदे. और हामिद ने क्या खरीदा, एक चिमटा. चाट-मिठाई, खिलौनों के लिए उसका दिल भी मचला. लेकिन उसकी सारी इंद्रियों ने मिलकर ये फैसला लिया कि इस समय जहां भर की सारी चीजों, सारी नेमतों से ज्यादा जरूरी है ये चिमटा. क्योंकि रोटी सेंकती दादी की उंगलियां चिमटे के अभाव से रोज़ाना जला करती हैं. हम भी वोटर हैं. वो गांववाले भी वोटर हैं. एक ही मुल्क, एक ही सिस्टम का हिस्सा. अपनी और उन गांववालों की उम्मीदों को तराज़ू पर रखकर तौलिये. हमारे बीच की उस खाई को महसूस कीजिए.


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