उनके अलावा एक और नाम है निधि दुबे, जिन्हें 9 सितंबर को लेफ्टिनेंट की पदवी मिली है. पति मुकेश दुबे सेना में नायक थे. 2008 में उनकी मौत हो गई. उस वक्त निधि गर्भवती थीं. ससुराल वालों ने उन्हें घर से निकाल दिया. इसके बाद निधि ने भी आर्मी जॉइन करने का फैसला लिया. 32 साल की उम्र में सेना में कमीशन होने के बाद निधि के भाई नीलेश ने बताया कि उनकी बहन ने जो किया है, वो शहीदों की पत्नियों के लिए एक मिसाल कायम करेगा. नीलेश के मुताबिक निधि का ऑर्मी ऑफिसर बनना ही लोगों को प्रेरणा देने के लिए काफी है.
उम्र का बंधन तोड़ बन गईं ऑफिसर

कर्नल संतोष महाडिक (बाएं) की शहादत के बाद ही स्वाति ने सेना में जाने की इच्छा जताई थी.
संतोष महाडिक भारतीय सेना के विशेष दस्ते 41 राष्ट्रीय राइफल्स में एंटी टेरर दस्ते में तैनात थे. जम्मू-कश्मीर में आतंकियों से लोहा लेने के दौरान वो शहीद हो गए. बाद में उन्हें शौर्य चक्र से सम्मानित किया गया. पति की मौत के एक साल बाद स्वाति ने भारतीय सेना में जाने की इच्छा जताई थी. उम्र आड़े आ रही थी तो उन्होंने तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल दलबीर सिंह से मुलाकात की. जनरल सिंह ने तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर से मुलाकात की. रक्षा मंत्री ने उन्हें मंजूरी दे दी. फिर क्या था, स्वाति तैयारियों में जुट गईं. अपने दोनों बच्चों को उन्होंने बोर्डिंग स्कूल में भेज दिया. इसके बाद स्वाति ने एसएसबी का एग्जाम पास किया. 2016 में वो सर्विस सेलेक्शन कमीशन की फाइनल लिस्ट में आ गईं. इसके बाद उन्हें ट्रेनिंग के लिए चेन्नई के ऑफिसर्स ट्रेनिंग एकेडमी भेज दिया गया.
लेफ्टिनेंट स्वाति ने बताया, पति का पहला प्यार थी सेना की वर्दी

पिता को अंतिम सलामी देती बेटी कार्तिकि (बाएं) 9 सितंबर को मां के लेफ्टिनेंट बनने के बाद मां के साथ नजर आई.
स्वाति पुणे यूनिवर्सिटी से एमए हैं. पति सेना में थे और वो खुद केंद्रीय विद्यालय में पढ़ाती थीं. पति की शहादत के बाद स्वाति ने नौकरी छोड़ दी और आर्मी ज्वॉइन कर ली. 9 सितंबर को आर्मी में कमीशन होने के बाद स्वाति ने बताया कि उनके पति संतोष का पहला प्यार सेना और उसकी वर्दी थी. पति के प्यार को पूरा करने के लिए उन्हें वर्दी पहननी ही थी.
किताब में मेजर ने साझा किए हैं अनुभव

सेना के जवानों पर ये किताब इसी महीने आ रही है. (दाएं) पासिंग परेड के दौरान सैन्य अधिकारियों के साथ स्वाति.
सेना के अफसरों की शहादत पर एक किताब आ रही है. इसे livefistdefence.com के एडिटर इन चीफ शिव अरूर और हिंदुस्तान टाइम्स के लिए सेना के मामले कवर करने वाले पत्रकार राहुल सिंह ने लिखी है. पेंगुइन से प्रकाशित होने जा रही किताब 'इंडियाज मोस्ट फियरलेस' में संतोष महाडिकका भी जिक्र है. किताब में मेजर प्रवीन कुमार ने भी अपने अनुभव साझा किए हैं, जो कश्मीर में उस वक्त आतंकियों और सेना के बीच चल रही मुठभेड़ में शामिल थे और कर्नल महादिक की यूनिट में ही तैनात थे. मेजर प्रवीन ने बताया है
गोली लगने के बाद जब कर्नल महाडिक को एयरलिफ्ट किया जा रहा था, तो मुझे उनकी पत्नी का फोन आया. उन्होंने घटना के बारे में पहले से सुन रखा था. उनका सवाल आज भी मुझे डरा देता है. उन्होंने मुझसे पूछा था कि वो जिंदा रहेंगे या नहीं, बस इतना बता दो. मुझे नहीं पता था कि क्या कहना है. मुझे पता था कि उन्हें सब पता है. हालांकि मुझे उम्मीद थी कि 92 बेस हॉस्पिटल के डॉक्टर किसी जादूगर की तरह कर्नल महाडिक को वापस ले आएंगे.मेजर प्रवीन याद करते हुए बताते हैं कि थोड़ी देर बाद एक और फोन आया. ये फोन भी उनकी पत्नी का ही था. इस बार भी उन्होंने एक सवाल पूछा था, जिसने मुझे और भी परेशान कर दिया. उन्होंने पूछा,
मेरे पति को कितनी गोलियां लगी हैं. मैंने खुद को किसी तरह से कठोर बनाया और कहा कि उन्हें सात गोलियां लगी हैं और उन्हें बचाया नहीं जा सका है. इसके बाद उन्होंने कुछ नहीं कहा और फोन रख दिया.अब स्वाति ने सेना की वर्दी पहन ली है. भले ही वर्दी उन्होंने पति के सपनों को पूरा करने के लिए पहनी है, लेकिन ये उन सभी के लिए मिसाल है, जो कुछ करना चाहते हैं, कुछ बनना चाहते हैं. सेना में महिलाओं को लड़ाई के मोर्चे पर भेजे जाने को पहले ही मंजूरी मिल चुकी है. स्वाति को सेना में लेफ्टिनेंट का पद उन महिलाओं को भी हौसला देगा, जिनके पास सेना के जरिए देश सेवा का जज्बा अभी तक उनके दिल में ही दफ्न था.
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