सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने गुरुवार, 25 अगस्त को धन शोधन निवारण अधिनियम, 2002 (Prevention of Money Laundering Act या PMLA) पर सुनवाई करते हुए कहा है कि कोर्ट इस मामले पर अपने पुराने निर्णय की फिर से सुनवाई करेगा.
ED के पास कितनी पावर होगी? जजमेंट देने के बाद फिर से सुनवाई करेगा सुप्रीम कोर्ट
कार्ति चिदंबरम की याचिका गई, सुनवाई हुई, फिर याचिका सुनवाई के लिए स्वीकार हो गई!


मामला कांग्रेस सांसद कार्ति चिदंबरम (Karti Chidambaram) की उस याचिका से जुड़ा है जिसमें सुप्रीम कोर्ट से अपील की गई थी कि वो PMLA की संवैधानिक वैधता बनाए रखने के अपने फैसले की समीक्षा करे. शीर्ष अदालत ने बीती 27 जुलाई को ये जजमेंट दिया था जिसमें केंद्रीय जांच एजेंसी ED की शक्तियों और अधिकारों को कायम रखा गया था. आज CJI एनवी रमना (N V Ramana), जस्टिस दिनेश माहेश्वरी और जस्टिस सीटी रविकुमार की बेंच ने ओपन कोर्ट में रिव्यू पिटिशन यानी पुनर्विचार याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया.
पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई के लिए वही बेंच बैठती है जिसने मामले पर ऑरिजिनल जजमेंट दिया था. हालांकि PMLA पर फैसला देने वाली बेंच में शामिल जस्टिस एएम खानविलकर 29 जुलाई को रिटायर हो गए थे. इसलिए अब CJI एनवी रमना के नेतृत्व में रिव्यू पिटिशन पर सुनवाई होगी. ये जानना दिलचस्प है कि आम तौर पर इन याचिकाओं पर सुनवाई चेंबर में ही होती है.
कम ही मामलों में सुप्रीम कोर्ट रिव्यू पिटिशन को ओपन कोर्ट में सुनने को तैयार होता है. बुधवार को शीर्ष अदालत ने मामले की मौखिक सुनवाई की मंजूरी देते हुए इसके लिए 25 अगस्त की तारीख तय की थी.
संविधान का अनुच्छेद 137 सुप्रीम कोर्ट को अपने आदेशों या फैसलों की समीक्षा करने का अधिकार देता है. इससे पहले जनवरी 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला मंदिर मामले पर ओपन कोर्ट में समीक्षा सुनवाई की थी. शीर्ष अदालत ने सितंबर 2018 में इस केस में जजमेंट दिया था. रफाल डील केस को लेकर दायर रिव्यू पिटिशन पर भी सुप्रीम कोर्ट दिसंबर 2018 में ओपन कोर्ट में सुनवाई कर चुका है.
मार्च 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि अनुसूचित जाति या जनजाति से जुड़े आपराधिक मामलों में Scheduled Castes and Scheduled Tribes (Prevention of Atrocities) Act, 1989 लगाने से पहले उपयुक्त अधिकारी से अनुमति लेनी होगी. कोर्ट के इस फैसले पर काफी हंगामा हुआ था. बाद में इसकी समीक्षा के लिए याचिका दायर की गई थी जिस पर अप्रैल 2018 में सुनवाई हुई. तब भी शीर्ष अदालत ने ओपन कोर्ट में मामला सुना था.
PMLA पर कोर्ट ने पहले क्या फैसला दिया था?PMLA के अलग-अलग प्रावधानों पर सवाल उठाते हुए इसमें संशोधन की मांग के साथ 242 याचिकाएं दायर की गई थीं. सुप्रीम कोर्ट ने उन सबको क्लब करते हुए 27 जुलाई को PMLA की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा था. कोर्ट ने मनी लॉन्ड्रिंग (Money Laundering) के मामलों में केंद्रीय जांच एजेंसी प्रवर्तन निदेशालय (ED) की गिरफ्तारी करने, छापा मारने, संपत्ति अटैच और सीज करने की शक्तियों को भी बरकरार रखा था.
न्यायिक प्रक्रिया का एक अघोषित सिद्धांत है कि अपराध साबित होने से पहले आरोपी को निर्दोष माना जाता है. PMLA मामले पर फैसला देते हुए कोर्ट ने कहा था कि इस सिद्धांत को मानवाधिकार के रूप में लिया जाता है, लेकिन संसद या विधानसभा द्वारा पारित किसी कानून से इस धारणा पर रोक लगाई जा सकती है.
दरअसल, ED मनी लॉन्ड्रिंग के मामलों की रिपोर्ट ECIR (Enforcement Case Information Report) के तौर पर दर्ज करती है. फैसले में कोर्ट ने इस पर टिप्पणी की थी. कहा था कि ECIR को FIR के बराबर नहीं माना जा सकता, इसे हर केस में संबंधित व्यक्ति को देना अनिवार्य नहीं है और अगर ED गिरफ्तारी के समय उसके कारण बताती है तो ये काफी है. हालांकि फैसले में कोर्ट ने इस सवाल को छोड़ दिया कि क्या PMLA में संशोधन Finance Acts के जरिये किए जाएंगे.
अब 25 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई की, तो कहा कि ECIR न सौंपने वाले बिन्दु पर फिर से विचार किया जा सकता है.
इससे पहले, बुधवार को CJI रमना की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच ने बेनामी ट्रांजैक्शन (प्रोहिबिशन) ऐक्ट से जुड़े एक मामले में फैसला दिया. इस दौरान बेंच ने PMLA को लेकर दिए 27 जुलाई के फैसले की कुछ बातों पर चिंता जाहिर की थी. इनके मुताबिक ED अधिकारियों को ये अधिकार है कि वे ट्रायल से पहले ही संबंधित व्यक्ति की संपत्ति अपने कब्जे में कर सकते हैं. बुधवार को कोर्ट ने विशेष मामलों के संबंध में इस अधिकार को लेकर चिंता जताई. कोर्ट ने कहा कि इस पर अलग से व्याख्या करने की जरूरत है, वर्ना इसे लेकर और याचिकाएं आने की संभावना बढ़ जाएगी.
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