सुप्रीम कोर्ट ने 30 मई तक चुनावी चंदे का ब्योरा जमा करने को कहा है. (सांकेतिक तस्वीर - Reuters/India Today)
इलेक्टोरल या चुनावी बॉन्ड पर सुप्रीम कोर्ट ने एक अंतरिम लेकिन बड़ा आदेश दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने सभी राजनीतिक दलों से कहा है कि वे 30 मई तक इलेक्टोरल बॉन्ड से मिले चंदे का ब्योरा चुनाव आयोग के पास दाखिल करें. पॉलिटिकल पार्टियों से चंदा देने वालों का ब्योरा देने को कहा गया है. अदालत ने सारी जानकारी सीलबंद लिफाफे में मांगी है. सुप्रीम कोर्ट में मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस रंजन गोगोई जस्टिस दीपक गुप्ता और संजीव खन्ना की बेंच में हुई. इलेक्टोरल बॉन्ड्स के खिलाफ मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी और एक एनजीओ ADR यानी एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स ने याचिका दाखिल की है. इलेक्टोरल बॉन्ड राजनीतिक दलों को चंदा देने के लिए एक बंधपत्र हैं, जिनको कोई भी शख्स खरीदकर अपनी पसंद की पार्टी को दान कर सकता है. ये बॉन्ड राजनीतिक दल कैश करा सकते हैं.
सुप्रीम कोर्ट में क्या-क्या हुआ?
सुप्रीम कोर्ट में 12 अप्रैल का अंतरिम फैसला आने से पहले अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल 11 अप्रैल को सरकार का पक्ष रखा. इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक इस दौरान वेणुगोपाल ने कहा,
'राजनीतिक दलों को मिलने वाले चुनावी चंदे की 'पारदर्शिता बहुत जरूरी नहीं' है. मेरी राय में वोटरों को सिर्फ ये जानने का हक है कि उनका कैंडीडेट कौन है. उनको ये जानने की कोई जरूरत नहीं कि राजनीतिक दलों के पास पैसा कहां से आ रहा है.'
उन्होंने कहा कि,
'भारत में राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे की अपनी सीमाएं हैं. राजनीतिक दलों को चलाने के लिए कोई सरकारी फंडिंग भी नहीं है. ऐसे में राजनीतिक दलों को चुनावी बॉन्ड के जरिए चंदा देने वाले दानदाताओं की पहचान उजागर करना सही नहीं रहेगा. चंदा देने वालों की पहचान का खुलासा होने से उनको ऐसे राजनीतिक दल निशाना बना सकते हैं, जिनको उन्होंने चंदा नहीं दिया है.'
इस सवाल पर कि ये स्कीम वोटरों के जानने के अधिकार के खिलाफ है, वेणुगोपाल ने कहा,
'वोटरों को ये जानने की जरूरत ही क्या है कि राजनीतिक दलों को चंदा कहां से आ रहा है!'
अटॉर्नी जनरल की टिप्पणी जस्टिस दीपक गुप्ता के एक सवाल के बाद आई. जस्टिस गुप्ता ने सवाल उठाया था कि
'आखिर वोटरों को ये जानने का हक क्यों नहीं है कि किस राजनीतिक दल को कौन चंदा दे रहा है? ये मतदाता के जानने के अधिकार का अहम हिस्सा है.'
इस पर अटॉर्नी जनरल ने निजता के अधिकार का हवाला दिया. कहा,
'पुत्तास्वामी फैसले में सभी को निजता का अधिकार दिया गया है.'
बेंच ने इस बात पर भी चिंता जताई कि चुनावी बॉन्ड से आने वाले वक्त में काला धन का जरिए बन सकते हैं. चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने ये जानना चाहा,
'क्या बैंकों को ये मालूम है कि चुनावी बॉन्ड खरीदने वाले कौन लोग हैं? अगर खरीदार के बारे में जानकारी नहीं है, तो चुनावी चंदे में कालाधन रोकने की आपकी सारी कोशिशें बेकार साबित होंगी.'
इस पर अटॉर्नी जनरल ने साफ किया कि बैंकों के पास हर ग्राहक का ब्योरा उपलब्ध है. चुनावी बॉन्ड खरीदने से पहले केवाईसी डॉक्यूमेंट्स जरूरी होते हैं. उनकी बात पर जस्टिस खन्ना ने सवाल किया,
'बॉन्ड के खरीदार की पहचान पता चलने से लेन-देन के वैध होने की गारंटी तो नहीं मिलती?'
इसके जवाब में वेणुगोपाल ने कहा कि चुनावी बॉन्ड सिर्फ अपने अकाउंट से पैसे चुकाकर खरीदे जा सकते हैं. वहां से पैसे का ब्योरा मिल सकता है. जस्टिस खन्ना ने फिर सवाल उठाया,
'ऐसे तो फर्जी कंपनियां भी बॉन्ड खरीदकर पार्टियों को चंदा दे सकती हैं?' इस पर अटॉर्नी जनरल ने कहा कि इनकम टैक्स डिपार्टमेंट कभी बॉन्ड की जानकारी हासिल कर सकता है. उन्होंने कहा कि
'चुनावी चंदे की ये स्कीम बुरी नहीं है. जिस तरह पहले की सरकारों के वक्त कालाधन पनपा. ये कालाधन रोकने के लिए सरकार का एक प्रयोग है. और ये तो वक्त ही बताएगा कि ये स्कीम कितनी सफल रही?'
जानिए क्या होते हैं इलेक्टोरल बॉन्ड?
ये चुनावी चंदा हासिल करने के बॉन्ड हैं. ये बॉन्ड एक तरह के नोट हैं. वैसे ही नोट जैसे हम आप 100-500 रुपए के नोट देखते हैं. मोदी सरकार ने जनवरी, 2018 में चुनावी चंदे के लिए बॉन्ड जारी किए हैं. इन बॉन्ड का मकसद राजनीतिक चंदे को पारदर्शी बनाना है. साल 2017 के बजट भाषण के दौरान वित्तमंत्री अरुण जेटली ने इसे बड़ा चुनावी सुधार बताया. जो लोग किसी राजनीतिक पार्टी को 2000 रुपए से ज्यादा का चंदा देना चाहते हैं. उनको भारतीय स्टेट बैंक की किसी भी ब्रांच से ये बॉन्ड खरीदने होते हैं. चंदा देने वाले लोग इन बॉन्ड को खरीदकर अपनी पसंदीदा पार्टी को दे सकते हैं. और वो पार्टी या दल इन बॉन्ड्स को अपने अकाउंट में लगाकर अपने पक्ष में भुगतान करा सकता है. ठीक वैसे ही, जैसे आप किसी को अकाउंट पेयी चेक देते हैं.
सुप्रीम कोर्ट में इस पर क्या सुनवाई चल रही?
मोदी सरकार पर आरोप लग रहे हैं कि चुनावी बॉन्ड और पॉलिटिकटल फंडिंग को लेकर जो सुधार किए हैं. वो ठीक नहीं हैं. उस पर 27 मार्च के दिन चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दाखिल किया. चुनाव आयोग ने इलेक्टोरल बॉन्ड को भारत के चुनावों के लिए खतरनाक माना. कहा कि इलेक्टोरेल बॉन्ड की स्कीम से राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे की ट्रांसपैरेंसी यानी पारदर्शिता पर 'गंभीर असर' पड़ेगा. राजनीतिक दल बगैर किसी जांच के विदेशी चंदा भी लेंगे. और चंदा देने वाली विदेशी कंपनियां भारत की नीतियों को प्रभावित कर सकती हैं. इसके अलावा इलेक्टोरल बॉन्ड पारदर्शी नहीं हैं. कौन इनको खरीद रहा ये पता नहीं चल रहा.
चुनावी बॉन्ड से किस पार्टी को कितना चंदा?
चुनाव सुधारों पर काम करने वाले एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स ADR का कहना है कि इलेक्टोरल बॉन्ड से वास्तव में सत्ता पक्ष को फायदा हो रहा है. साल 2017-18 में इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिए 222 करोड़ रुपए का चंदा दिया गया. इसमें से बीजेपी को 210 करोड़ यानी 94.5%, कांग्रेस को 5 करोड़ रुपए और बाकी दलों को 7 करोड़ रुपए मिले.