श्रीलंका तेजी से इंटरनेशनल साइबर क्राइम का नया केंद्र बनता जा रहा है. एक्सपर्ट्स ने चेतावनी दी है कि साउथ-ईस्ट एशिया में साइबर ठगी के खिलाफ हुई सख्ती के बाद कई बड़े साइबर क्रिमिनल गैंग अब श्रीलंका में अपने नेटवर्क बना रहे हैं. इनमें चीन, भारत, वियतनाम, इंडोनेशिया, लाओस, फिलीपींस, मलेशिया और म्यांमार के नागरिक शामिल हैं.
साइबर ठगों के लिए स्वर्ग बना श्रीलंका, इंडियन-चीनी गैंग यहां बैठकर दुनिया को ठग रहे
Sri Lanka Cybercrime: श्रीलंका पुलिस के अनुसार, इस साल साइबर ठगी के मामलों में गिरफ्तार और डिपोर्ट किए गए लोगों में सबसे बड़ी संख्या चीनी नागरिकों की रही. वियतनाम, भारत, इंडोनेशिया, लाओस, फिलीपींस, मलेशिया और म्यांमार के नागरिक भी ऐसी कार्रवाइयों में पकड़े गए.


श्रीलंका पुलिस के प्रवक्ता फ्रेडरिक वूटलर ने कहा कि देश में साइबर अपराध के मामलों में चिंताजनक बढ़ोतरी देखी जा रही है. उनके मुताबिक कई लोग टूरिस्ट वीजा पर श्रीलंका आते हैं और बाद में गैर-कानूनी तरीके से ऐसे ठगी नेटवर्क खड़े कर लेते हैं, जो दुनिया भर के लोगों को निशाना बनाते हैं.
छापेमारी में सैकड़ों विदेशी गिरफ्तारइस साल की शुरुआत से अब तक श्रीलंका में कथित साइबर ठगी गिरोहों के खिलाफ एक दर्जन से ज्यादा छापेमारी की जा चुकी हैं. इन कार्रवाइयों में करीब 700 विदेशी नागरिकों को गिरफ्तार कर देश से बाहर निकाला गया है. जून 2026 में राजधानी कोलंबो में हुई कार्रवाई में पुलिस ने 18 चीनी नागरिकों और लाओस के एक नागरिक को हिरासत में लिया.

ब्रिटिश अखबार दी गॉर्डियन की रिपोर्ट के मुताबिक, छापेमारी करने वाले क्राइम इन्वेस्टिगेशन ब्यूरो के एक अधिकारी ने नाम ना छापने की शर्त पर बताया,
"उनके पास फोन, लैपटॉप, पेन ड्राइव, रैम, एक प्रोसेसर, दस्तावेजों की जालसाजी के लिए इस्तेमाल होने वाली मुहर और बड़ी संख्या में फर्जी डॉक्यूमेंट मिले. एक सर्टिफिकेट, जो हमें मिला, उसे भी फर्जी तरीके से तैयार किया गया था ताकि यह दिखाया जा सके कि उनका बिजनेस अमेरिका में रजिस्टर्ड है. उसे फ्रेम कर दीवार पर टांगा गया था."
छापेमारी वाली जगह पर कई नकली डॉक्यूमेंट मिले. इनमें फर्जी लीगल सर्टिफिकेट, नकली अमेरिकी ट्रेजरी डॉक्यूमेंट और कंपनी रजिस्ट्रेशन से जुड़े कागजात शामिल थे. डॉक्यूमेंट में दावा किया गया था कि संबंधित कंपनी की कीमत 10 अरब डॉलर है. क्राइम इन्वेस्टिगेशन ब्यूरो के अधिकारी ने बताया कि वहां से 62 पासपोर्ट भी मिले, जिनमें ज्यादातर चीनी नागरिकों के थे.
पुलिस सुपरिटेंडेंट (SP) कमल अरियावांसा ने कंफर्म किया कि इस ऑपरेशन के पीछे एक चाइनीज क्रिमिनल सिंडिकेट था. आरोप है कि यह गिरोह अमेरिकी नागरिकों को एक फर्जी अमेरिकी कंपनी में निवेश करने के लिए ठगने की कोशिश कर रहा था.
श्रीलंका पुलिस के अनुसार, इस साल साइबर ठगी के मामलों में गिरफ्तार और डिपोर्ट किए गए लोगों में सबसे बड़ी संख्या चीनी नागरिकों की रही है. हालांकि, वियतनाम, भारत, इंडोनेशिया, लाओस, फिलीपींस, मलेशिया और म्यांमार के नागरिक भी ऐसी कार्रवाइयों में पकड़े गए. पुलिस का कहना है कि गिरफ्तार सभी लोग पर्यटक वीजा पर श्रीलंका आए थे.
पिछले एक दशक में साउथ-ईस्ट एशिया में फैला साइबर ठगी का नेटवर्क दुनिया के सबसे बड़े संगठित अपराध नेटवर्क में से एक बन चुका है. यह नेटवर्क मुख्यतौर पर चीन के साइबर गिरोह चलाते हैं. इसमें हजारों लोग काम करते हैं. इनमें से कई लोगों को ह्यूमन ट्रैफिकिंग या अच्छी जॉब के नाम पर फंसाकर और जबरन इस काम में लगाया जाता है.
कंबोडिया और म्यांमार जैसे देशों में बने बड़े और सुरक्षित ठिकानों से ये गिरोह रोमांस स्कैम, क्रिप्टोकरेंसी फ्रॉड, ऑनलाइन जुआ और मनी लॉन्ड्रिंग जैसे जुर्म को अंजाम देते हैं. अमेरिका का अनुमान है कि 2024 में केवल अमेरिकी नागरिकों को साउथ-ईस्ट एशिया के ऐसे स्कैम सेंटर के कारण 10 अरब डॉलर का नुकसान हुआ.
श्रीलंका क्यों बना पसंदीदा पनाहगाह?हाल के सालों में साउथ-ईस्ट एशिया के कई देशों ने इन नेटवर्क के खिलाफ सख्त कार्रवाई शुरू की है. इसके बाद कई चाइनीज ऑपरेटर और अपराधिक गैंग ने अपने ठिकाने बदलने शुरू कर दिए. एक्सपर्ट्स के अनुसार, श्रीलंका में टूरिस्ट वीजा आसानी से मिल जाता है और हाल ही में शुरू किए गए 'डिजिटल नोमैड' वीजा ने भी विदेशी नागरिकों के लिए यहां आना आसान बना दिया है.
इसके अलावा सिम कार्ड और इंटरनेट कनेक्शन को लेकर और देशों के मुकाबले कमतर नियम-कायदे हैं. सस्ते रेट पर ऑफिस और होटल किराए पर मिल जाते हैं, जिससे ऐसे नेटवर्क को काम करने में आसानी होती है.
श्रीलंका के इंफ्रास्ट्रक्चर और बिजनेस में चीन की पहले से ही मजबूत और गहरी पैठ है. वहां चीनी लोगों का आना-जाना भी आम बात है. श्रीलंका ने ऑनलाइन गैंबलिंग और गेमिंग से जुड़े नियमों में भी ढील दी है. साइबर क्राइम से निपटने में वहां के तरीके नाकाफी माने जाते हैं.
अभी का तरीका यह है कि साइबर क्राइम करते हुए पकड़े गए विदेशियों पर मुकदमा चलाने के बजाय उन्हें ज्यादातर श्रीलंका से डिपोर्ट कर दिया जाता है. माने, श्रीलंका से बाहर निकाल अपराधियों को उनके देश वापस भेज दिया जाता है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि इन्हीं वजहों से श्रीलंका साइबर अपराधियों के लिए नया पसंदीदा ठिकाना बन गया है.
ठिकाने बदलकर बच रहे साइबर क्रिमिनलसाइबर क्राइम रिसर्चर और ‘Scam: Inside Southeast Asia’s Cybercrime Compounds’ नामक बुक के लेखक मार्क बो ने बताया कि कंबोडिया में कार्रवाई तेज होने के बाद उन्होंने टेलीग्राम चैनलों पर ऐसे कई पोस्ट देखे, जिनमें लोग कह रहे थे कि वे श्रीलंका जा रहे हैं.
मार्क बो ने आगे कहा,
"यह साफ दिखता है कि वहां (श्रीलंका) बिल्कुल उसी तरह का ढांचा तैयार किया जा रहा है. यह दिखाता है कि इस इंडस्ट्री को काबू करना कितना मुश्किल है, क्योंकि इसकी सबसे बड़ी खासियत इसकी मोबिलिटी और तेजी से खुद को ढाल लेने की क्षमता है."
कोलंबों में कुछ कमर्शियल कॉम्प्लैक्स में ऑफिस स्पेस का किराया डबल से भी ज्यादा हो गया है. कोलंबो के कारोबारी इसका कारण चीन से आने वाले ग्रुप की ऑफिस स्पेस के लिए बढ़ती डिमांड बताते हैं. चीनी लोग महंगा किराया भी ऑफर करते हैं.
पुलिस का कहना है कि ये गैंग बड़े और खुले ठिकाने बनाने के बजाय पांच-पांच लोगों के छोटे ग्रुप में काम करते हैं और हर तीन महीने में होटल, अपार्टमेंट और ऑफिस बदल लेते हैं ताकि पकड़े ना जाएं.
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जांच अधिकारियों के मुताबिक हाल में पकड़े गए कई नेटवर्क के पीछे मोटा पैसा लगा था. माने धोखाधड़ी, पैसों के बैकअप की कोई कमी नहीं. एक मामले में तो एक बिल्डिंग की आठ मंजिलें किराए पर ली गई थीं.
चीनी दूतावास का कबूलनामाकोलंबो स्थित चाइनीज एंबेसी ने भी खुले तौर पर माना है कि टेलीफोन फ्रॉड करने वाले कुछ चीनी गैंग साउथ-ईस्ट एशिया में कार्रवाई के बाद श्रीलंका पहुंचे हैं. एबेंसी ने कहा कि इस तरह के मामले बेहद नुकसान पहुंचाने वाले हैं और चीनी दूतावास संदिग्धों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने में श्रीलंकाई कानून प्रवर्तन एजेंसियों को पूरा समर्थन देता है.
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