हमारी धरती के भीतर एक गोल सा हिस्सा है, जो बेहद गर्म है. इसे इनर कोर कहते हैं (Inside earth inner core). यह लोहे और निकल (Nickel) धातु की बनी एकदम गझिन गेंद सा है. जिसका आकार हमारे चांद के आकार का दो-तिहाई है. इस तक पहुंचेंगे कैसे? इसके लिए हमको जमीन के नीचे करीब 4,800 किलोमीटर लंबी सुरंग खोदनी पड़ेगी. और हां, 5,200 डिग्री सेल्सियस की गर्मी से अगर हम बच जाएं तो, हम धरती के इनर कोर तक पहुंच जाएंगे. खैर अब एक हालिया रिसर्च इसके बारे में एक और बात बता रहा है.
धरती भीतर से धीरे घूमने लगी है, तो अब दिन छोटे होंगे?
इस रिसर्च में विडाल और उनके साथियों ने, साल 1991 से लेकर 2023 तक के 121 भूकंपों का डेटा देखा. साथ में कई Nuclear tests का डेटा भी देखा गया. पर भला इस सब से धरती के भीतर की तस्वीर का अंदाजा कैसे लगता है?


दरअसल हमारी धरती तो घूमती ही है. साथ में इसके भीतर की ये गेंद भी घूमती है. नेचर जर्नल में छपी इस रिसर्च में बताया जा रहा है कि इसकी रफ्तार में बदलाव हुआ है. ये पहले से धीरे घूम रही है. कई तरह के सवाल भी आ रहे हैं. भला हमारी धरती के भीतर चल क्या रहा है? क्या इसके धीरे घूमने से हमको हमारी घड़ियों का टाइम ठीक करना होगा? माने क्या दिन की लंबाई पर भी इसका कोई असर होने वाला है? सब समझते हैं.
दरअसल यह रिसर्च, अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ कैलिफोर्निया के साइंटिस्ट्स ने की है. रिसर्च से जुड़े साइंटिस्ट्स का कहना है कि कोर के घूमने की रफ्तार धीमी हुई है. जिसकी वजह से हमारे दिन की लंबाई पर भी असर पड़ सकता है. हालांकि यह असर सेकंड के बहुत छोटे हिस्से जितना होगा. इसलिए हमें हमारी घड़ियों को रिसेट करने की जरूरत तो नहीं पड़ेगी.
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वैज्ञानिकों को कैसे पता चला धरती के भीतर चल क्या रहा है?रिसर्च से जुड़े भूवैज्ञानिक जॉन विडेल का कहना है,
जब हमने पहली बार साइज्मग्राम (इसका मतलब आगे बताते हैं) देखे, तो हम भौचक्के रह गए. लेकिन जब ऐसी दो दर्जन चीजें और ऑब्जर्व की गईं, तब रिजल्ट हमारे सामने था.

आपने फिल्मों में भूकंप आने पर कागज में टेढ़ी-मेढ़ी लकीरें बनाने वाली मशीन देखी होंगी. जिसमें एक सुई जैसी चीज से कागज पर जिग-जैग लाइनें बनती हैं. दरअसल यही टेक्निकल भाषा में साइज्मग्राम है. जिसमें एक निश्चित जगह पर धरती के हिलने का हिसाब रखा जाता है. इसमें दो चीजों को रिकार्ड किया जाता है. एक तो टाइम और दूसरा धरती कितनी हिली.
इसी साइज्मग्राम की मदद से वैज्ञानिक धरती के भीतर के स्ट्रक्चर का अंदाजा लगाते हैं. कि धरती के भीतर क्या-क्या है. इसमें भूकंप हमारी मदद करते हैं. दरअसल जब भी कोई भूकंप आता है. तो उसकी वजह से कई तरह की तरंगे निकलती हैं. जो धरती के नीचे से सतह तक आती हैं.
इन तरंगों का अपना-अपना नेचर होता है. कुछ तरल और ठोस से होकर अलग तरह से गुजरती हैं, कुछ अलग. इनके इसी नेचर का फायदा वैज्ञानिक उठाते हैं. ये पता लगाने के लिए कि कौन सा हिस्सा ठोस है, कौन सा नहीं.
तो इसमें ये होता है कि धरती के अलग-अलग हिस्सों में कंपन का हिसाब रखने वाले सेंटर हैं. अब भूकंप के आने पर धरती हिलती है, जिससे ये तरंगे निकली हैं. जिनको S और P तरंगें कहा जाता है.
भीतर से होकर कौन सी वेव, किस सेंटर में, कितनी तीव्रता से पहुंची, नहीं पहुंची, ऐसी तमाम चीजों का हिसाब लगाकर, भूवैज्ञानिक अंदाजा लगाते हैं. कि धरती के भीतर कैसी संरचना हो सकती है? कमाल है जहां न पहुंचे रवि, वहां पहुंचे साइज्मिक वेव.
इस रिसर्च में विडाल और उनके साथियों ने, साल 1991 से लेकर 2023 तक के 121 भूकंपों का डेटा देखा. साथ में कई परमाणु धमाकों के टेस्ट्स का डेटा भी देखा गया. इनसे निकलने वाली साइज्मिक वेव या तरंगों की रफ्तार वगैरह से, साइंटिस्ट्स ने इनर कोर के साइज का अनुमान लगाया. इसकी गति के बारे में भी जानकारी जुटाई.
जिससे साइंटिस्ट्स बता रहे हैं कि इनर कोर धरती की सतह से धीरे घूम रहा है. जिसकी शुरुआत 2010 के आसपास हुई होगी. पर क्यों? वैज्ञानिकों का अनुमान है कि तरल लोहे की गति की वजह से पैदा हुआ चुंबकीय क्षेत्र या फिर गुरुत्वाकर्षण बल इसके पीछे की वजह हो सकते हैं.
हालांकि ज्यादा एक्साइटेड होने की जरूरत नहीं है. हॉलीवुड फिल्मों वाली त्रासदी आने की संभावना फिलहाल नहीं है. एक्सपर्ट्स का कहना है कि धरती के भीतर की ये गतिविधियां नई नहीं हैं. फिलहाल इससे दिन की लंबाई में सेकंड के कुछ हिस्से जितनी बढ़त या कमी से ज्यादा नहीं होने की आशंका है.
कमाल है ना, हमारी धरती के भीतर भी अजब ‘खेला’ चल रहा है.
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