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जहां सूरज छिपता ही नहीं, वहां कैसे रोज़ा रखते हैं मुसलमान?

रोज़े के दौरान मुस्लिम सूरज निकलने से लेकर सूरज छिपने तक कुछ नहीं खाते-पीते.

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तस्वीर प्रतीकात्मक है, जो शाहनवाज़ मलिक के फेसबुक अकाउंट से ली गई है.
रमज़ान शुरू हो गया है. ये वो महीना है जब सूरज महाराज अपने तेवर सबको दिखाते हैं. इस महीने में रोज़ा रखना मुसलमानों के लिए बेहद मुश्किल होता है. सर्दियों में थोड़ा आसान होता है. क्योंकि खाना तो छोड़िए, पानी भी नहीं पीते हैं. वो भी तब तक जब तक सूरज छिप नहीं जाता. लेकिन उस देश का अंदाज़ा लगाइए कि जहां सूरज कभी डूबता ही नहीं. वहां मुसलमान कैसे रोज़ा रखते होंगे?
इंडिया में तो गर्मियों में सूरज निकलने के तकरीबन 16-17 घंटे बाद छिप जाता है. लेकिन जहां सूरज महज़ 55 मिनट के लिए छिपता हो तो वहां रोज़ा रखना...! है न ये चौंकाने वाली बात.
आर्क्टिक सर्कल में आने वाले देशों में मुस्लिम 24 घंटे सूरज की लाइट में रहते हैं. तो ऐसे में वो कब सहरी खाएं और कब इफ्तार. कब नमाज़ पढ़ें और कब तरावीह. लैपलैंड, फिनलैंड और स्वीडन उन देशों में से हैं, जहां सूरज बहुत कम वक़्त के लिए ही अस्त होता है.
फिनलैंड हजारों झीलों और आइलैंड्स से सजा हुआ यह देश काफी सुंदर और आकर्षक है. गर्मी के मौसम में यहां करीब 73 दिनों तक सूरज अपनी रोशनी बिखेरता रहता है. घूमने के लिहाज से यह देश काफी अच्छा है. इंडिपेंडेंट की रिपोर्ट के मुताबिक नॉरदर्न फ़िनलैंड में सूरज गर्मी में 55 मिनट के लिए ही छिपता है. वहां रहने वाली एक फैमिली ने AJ+ से अपना एक्सपीरियंस शेयर किया कि वो कैसे रोज़ा रखते हैं?
फ़िनलैंड में रहने वाले मोहम्मद ने AJ+ से अपने अनुभव शेयर किए.
फ़िनलैंड में रहने वाले मोहम्मद ने AJ+ से अपने अनुभव शेयर किए.

मोहम्मद ने बताया,
'रोज़ा सुबह के 1:35 बजे शुरू हो जाता है. और फिर रात के 12:40 बजे ख़त्म होता है. यानी महज़ 55 मिनट खाने पीने के लिए मिलते हैं. पूरे 23 घंटे और 5 मिनट तक रोज़ा रहता है. मेरे दोस्त फैमिली और रिश्तेदार बांग्लादेश में रहते हैं. वो इस बात पर यकीन नहीं करते कि यहां रोज़ा 20 घंटे से ज्यादा का होता होगा.'
मोहम्मद का कहना है कि 23 घंटे का रोज़ा रखना पड़ता है.
मोहम्मद का कहना है कि 23 घंटे का रोज़ा रखना पड़ता है.

मोहम्मद कहते हैं, 'जब मैंने उन्हें बताया कि यहां पर 23 घंटे या साढ़े 22 घंटे का रोज़ा रखते हैं तो उन्होंने कहा, ये विश्वास करने वाली बात नहीं है. तुम कैसे मैनेज करते होगे? लेकिन खुदा का शुक्र है कि हम मैनेज करते हैं. और सब ठीक चल रहा है.'
मोहम्मद का कहना है इसी तरह दूसरे देशों में भी लोग सूरज की रोशनी के अनुकूल हो जाते हैं. कुछ मुस्लिम जो लैपलैंड में रहते हैं, उनमें से ज़्यादातर मिडिल ईस्ट के टाइम टेबल को फॉलो करते हैं.
सभी देशों में रोज़े की टाइमिंग सूरज के निकलने और छिपने की वजह से अलग-अलग होती है. ये टाइमिंग एक ही देश में अलग-अलग इलाकों में भी अलग-अलग होती है. हालांकि ये फर्क कुछ मिनटों का होता है.
मोहम्मद ने अपने अनुभव 2016 में शेयर किए थे.


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