2024 लोकसभा चुनाव (Lok Sabha Elections 2024) करीब आते ही कांग्रेस (Congress) में ऊहापोह साफ देखने को मिल रही है. छोटे से लेकर बड़े नेता तक पार्टी ऐसे छोड़ रहे हैं, मानो सी भगदड़ मची हो. इस फेहरिस्त में अशोक चव्हाण, नवीन जिंदल, संजय निरुपम, गौरव वल्लभ जैसे तमाम नाम शामिल हैं. इसकी वजह क्या है? सबकी अपनी अपनी वजहें है, मगर राग एक जैसे है. 4 अप्रैल को कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल हुए गौरव वल्लभ (Gaurav Vallabh) ने ग्रैंड ओल्ड पार्टी के कई वीक पॉइंट्स गिना दिए.
तीन गांधी, पांच पावर सेंटर... कांग्रेस को कमज़ोर कौन कर रहा?
राहुल, सोनिया, प्रियंका, केसी, खरगे...'पावर सेंटर्स' में फंसी कांग्रेस में सबसे 'पावरफुल' कौन?


समाचार एजेंसी ANI से बातचीत में गौरव वल्लभ ने कांग्रेस की कमियां गिनाईं हैं. उन्होंने अपनी पुरानी पार्टी पर कई गंभीर सवाल भी उठाए हैं. गौरव ने कहा-
# कांग्रेस पार्टी नए लोगों को या नए आइडिया को बढ़ावा नहीं देती है.
# 30 साल से कांग्रेस का घोषणापत्र एक ही शख्स बना रहा है. अगर उनमें इतना दम होता तो पार्टी 42 या 52 सीटों पर नहीं सिमटती.
# जिन लोगों ने कभी क्लास मॉनिटर का चुनाव तक नहीं लड़ा, केवल पूर्व मंत्रियों के PA रहे हैं. वो पार्टी चला रहे हैं. पहले वो प्रवक्ता के तौर पर पार्टी का बचाव करते थे. आज संचार प्रभारी हैं. (गौरव यहां बिना नाम लिए जयराम रमेश पर निशाना साध रहे थे.)
# कांग्रेस का जमीनी स्तर से कनेक्शन टूट चुका है. कार्यकर्ताओं और मतदाताओं की परेशानियां पार्टी नहीं समझ रही है.
गौरव, जयराम रमेश पर बिना नाम लिए निशाना साधते हुए कहते हैं कि वो केवल अपनी राज्यसभा की सीट सुरक्षित रखने की चिंता में हैं. पार्टी के प्रति उनका कोई वैचारिक कमिटमेंट नहीं है.
गौरव पार्टी आलाकमान पर निशाना साध रहे थे. वो कांग्रेस के एक पावर सेंटर की ओर इशारा भी कर रहे थे. लेकिन उनके साथ ही पार्टी छोड़ने वाले संजय निरुपम ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर आरोप लगाया था कि कांग्रेस के पांच पावर सेंटर हैं. उनका कहना था कि कांग्रेस पार्टी इन्हीं पावर सेंटर्स में फंसी हुई है और आगे नहीं बढ़ पा रही. संजय निरुपम का ये गुस्सा तब निकल रहा था जब वो पार्टी छोड़ चुके थे. पर सवाल ये है कि असल माजरा क्या है. क्या वाकई इन्हीं पावर सेंटर्स में फंस कर कांग्रेस सत्ता तक नहीं पहुंच पा रही है.
लल्लनटॉप के पॉलिटिकल शो 'नेता नगरी' में लोकमत पत्रकार आदेश रावल ने इस बात में हामी भरी है. उन्होंने बताया कि पहला पावर सेंटर खुद राहुल गांधी का है. दूसरा सोनिया गांधी, तीसरा प्रियंका गांधी, चौथा केसी वेणुगोपाल और पांचवां मल्लिकार्जुन खरगे का है. सोनिया गांधी लॉबी में अशोक गहलोत, भूपेंद्र सिंह हुड्डा, चिदंबरम, दिग्विजय सिंह शामिल हैं. जिनकी राहुल से नहीं बनती. वहीं प्रियंका की लॉबी में सचिन पायलट, डीके शिवकुमार जैसे नेता शामिल हैं. आदेश कहते हैं-
किसका पावर सेंटर मजबूत?राहुल और वेणुगोपाल की लॉबी एक ही है. क्योंकि राहुल ज्यादातर फैसले खुद न लेकर उनसे कराते हैं. सोनिया गांधी को भी राहुल का ही सेंटर मानिए. वो अब ज्यादा किसी से नहीं मिलती. खरगे ‘नो पावर’ के बराबर है. प्रियंका का पावर सेंटर अलग है.
कांग्रेस के पावर सेंटर के बारे में विस्तार से समझाने के लिए उन्होंने पार्टी से जुड़ा एक किस्सा सुनाया. उन्होंने बताया कि एक नेता ने खुद को कांग्रेस में फिक्स करने के लिए राहुल गांधी से बात की. राहुल ने कहा कि पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे से बात करिए. खरगे ने कहा कि इस बारे में केसी वेणुगोपाल बताएंगे. बाद में वेणुगोपाल ने कह दिया कि इस बारे में राहुल से बात करनी होगी. कांग्रेस में इसी तरह की सर्किल चल रही है. उन्होंने एक और किस्से का भी जिक्र किया. एक बार कांग्रेस की सेंट्रल इलेक्शन मीटिंग थी जिसमें राहुल गैरमौजूद रहे. हालांकि वो दिल्ली में ही थे. तब ‘न्याय यात्रा’ भी नहीं चल रही थी. आदेश रावल ने बताया,
राहुल कहते हैं कि वो मल्लिकार्जुन खरगे को फ्री हैंड देना चाहते हैं. पर बात ये है कि वो जिम्मेदारी नहीं लेना चाहते हैं. वो ज्यादातर काम केसी वेणुगोपाल से कराते हैं. हालांकि, कभी-कभी खरगे वेणुगोपाल के सामने मजबूत दिखते हैं.
प्रियंका गांधी के पावर सेंटर पर बात करते हुए उन्होंने बताया कि एक नेता ने टिकट के लिए प्रियंका से संपर्क किया तो उन्हें केसी वेणुगोपाल को नोट लिखना पड़ा. गांधी परिवार की सदस्य होने के बावजूद. यहां आपस में कम्यूनिकेशन ना होने की समस्या साफ झलकती है.
नो कम्यूनिकेशन!देश की सबसे पुरानी पार्टी में आलाकमान, नेताओं, कार्यकर्ताओं और प्रवक्ताओं के बीच Hierarchy को समझाने के लिए आदेश रावल ने एक और किस्सा सुनाया. कांग्रेस ने गठबंधन के लिए पर्टियों से बातचीत के लिए अलायंस कमेटी का गठन किया था . संयोजक मुकुल वासनिक को बनाया गया. लेकिन कोई मैंडेट नहीं दिया गया. उन्होंने बताया,
मान लें किसी पार्टी से मीटिंग हो रही है और वो बीच बातचीत में आलाकमान को फोन मिलाते हैं और कॉल नहीं उठता. फिर 5 घंटे बाद कॉल आता है. तो फैसला कैसे होगा? पार्टी में कम्युनिकेशन गैप की दिक्कत है. या फिर आप मैंडेट दीजिए कि वो खुद से फैसला लें.
ये भी पढ़ें- कांग्रेस छोड़ रहे नेताओं की लिस्ट लम्बीं होती नजर आ रही है लेकिन इससे असली फायदा किसे पहुंचेगा?
'प्राइड की चिंता करने वाले गए'कांग्रेस पार्टी से जिस तरह कई बड़े नेताओं, प्रवक्ताओं और कार्यकर्ताओं ने रुकसती है. इस पर वरिष्ठ पत्रकार राशिद किदवई ने भी 'नेतानगरी' शो में अपना मत रखा. कहा कि इंदिरा गांधी अपने खास दोस्तों और रिश्तेदारों को राजनीति से दूर रखती थीं. करीबियों को पॉलिटिक्स में लाने का सिलसिला राजीव गांधी ने शुरू किया. सभी ने बाद में राजीव का साथ छोड़ दिया. राहुल के साथ भी यही हुआ. कांग्रेस में जितने भी वॉइट कॉलर के लोग हैं, जिन्हें प्राइड की चिंता थी जैसे मिलिंद देवड़ा, जितिन प्रसाद, ज्योतिरादित्य सिंधिया सब से पार्टी छोड़ दी. लेकिन ब्लू कॉलर वाले लोग अब भी जुड़े हैं. इनमें माखनलाल फोतेदार, विंस्टन जॉर्ज जैसे नाम शामिल हैं. अकेले मध्य प्रदेश में 50 हजार कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने पार्टी छोड़ दी है. इनका अगर 50-100 सीट पर भी प्रभाव है तो सोचिए कांग्रेस के नीचे से जमीन कैसे खिसक रही है.
वीडियो: नेता नगरी: लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस में अंदरखाने क्या प्लानिंग चल रही है?












