राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने दिल्ली की अरविंद केजरीवाल वाली सरकार का भेजा 'पार्लियामेंट्री सेक्रेटरी' बिल रिजेक्ट कर दिया. अब सब कह रहे हैं कि केजरीवाल के 21 विधायक नप जाएंगे. इन सीटों पर फिर से चुनाव भी हो सकते हैं. केजरीवाल हमेशा की तरह अपने प्रिय मोदी जी को कोस रहे हैं. उनकी दलील है कि दूसरे राज्यों में भी संसदीय सचिव की व्यवस्था है. वहां तो कुछ नहीं हो रहा. मगर ये मामला तकनीकी रूप से झाड़ू पार्टी के खिलाफ जा रहा है. क्योंकि जब संसदीय सचिव बनाए गए थे, तब नियम कुछ और थे. लाभ के कुछ प्रावधान भी थे. और जब केजरीवाल सरकार ने नियमों में बदलाव कर उन्हें पिछली तारीख से लागू किया, तो उसके लिए उप राज्यपाल और राष्ट्रपति की सहमति जरूरी थी. अब वहां से मनाही हो गई है. आइये समझते हैं कि ये पूरा बवाल क्या है.केजरीवाल के बवाल की जड़ 1. 13 मार्च, 2015 को अरविन्द केजरीवाल ने अपने 21 विधायकों को 'पार्लियामेंट्री सेक्रेटरी' बनाया. कहा कि ये लोग मंत्रियों की मदद करेंगे. एक RTI के मुताबिक ये निर्णय मुख्यमंत्री ऑफिस के कहने पर जनरल एडमिनिस्ट्रेशन डिपार्टमेंट ने लिया था. 2. एक NGO राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चा और एक वकील प्रशांत पटेल ने हाई कोर्ट में याचिका डाल दी. उन्होंने Delhi Members of Legislative Assembly (Removal of Disqualification) Act, 1997 का हवाला दिया. उसमें कहा गया है कि सिर्फ मुख्यमंत्री एक पार्लियामेंट्री सेक्रेटरी रख सकता है. सारे मंत्री नहीं रख सकते. 3. इसके अलावा इसमें एक और बात थी. ऑफिस ऑफ़ प्रॉफिट यानी लाभ का पद. पार्लियामेंट्री सेक्रेटरी को इस कानून के तहत 'लाभ का पद' माना गया. संविधान के मुताबिक कोई भी सांसद या विधायक एक साथ दो 'लाभ के पद' पर नहीं रह सकता. उसको संविधान के आर्टिकल 102 और 191 से डील किया जायेगा. मतलब बर्खास्त किया जायेगा. पार्लियामेंट्री सेक्रेटरी है क्या? 1. ये ब्रिटिश सिस्टम की देन है. इंग्लैंड में मंत्री संसद के उसी सदन में जा सकता है जिसका वो सदस्य होता है. तो दोनों सदनों में काम करने के लिए मंत्री को पार्लियामेंट्री सेक्रेटरी की जरूरत पड़ती है. वो अपने मंत्री की तरफ से किसी भी सदन में जाता है. 2. हमारे इंडिया में मंत्री लोकसभा या राज्यसभा किसी भी सदन में जा सकते हैं. मंत्रियों की मदद के लिए केंद्र में मिनिस्ट्री ऑफ़ पार्लियामेंट्री अफेयर्स है जो इस तरह के काम देखती है. उसी के अंतर्गत पार्लियामेंट्री सेक्रेटरी आते हैं. अब स्टेट में पार्लियामेंट्री सेक्रेटरी का क्या काम? पार्लियामेंट तो केंद्र में होता है. 3.राज्यों में कई बार मंत्री पद ना मिलने से नाखुश विधायकों को ये पोस्ट दे दी जाती है. पार्लियामेंट्री सेक्रेटरी को राज्य मंत्री या कैबिनेट मंत्री की रैंक दी जाती है और उसको सारी सुविधाएँ भी मंत्री वाली ही मिलती हैं. पर क्या राज्य सरकार का ऐसा करना ठीक है? किसी विधायक को खुश करने के लिए जनता का पैसा बर्बाद करना उचित है? संविधान क्या कहता है? 1. 2003 में संविधान में एक संशोधन किया गया था. इस 91वें संशोधन के मुताबिक आर्टिकल 164(1A) जोड़ा गया. इसमें कहा गया कि किसी भी राज्य में मुख्यमंत्री को मिलाकर कुल विधायकों का 15% ही मंत्री रह सकते हैं. यानी 100 विधायक हैं तो कुल 15 मंत्री. मतलब हर किसी को मंत्री बनाकर पैसा बांटना बंद. दिल्ली के लिए आर्टिकल 239(A) है. यहां 10% यानी 7 विधायक ही मंत्री रह सकते हैं. 2. लेकिन राज्य सरकारों में कोई फुद्दू लोग तो बैठे नहीं हैं. तुरंत अपना एक कानून बनाया. West Bengal Parliamentary Secretaries (Appointment, Salaries, Allowances and Miscellaneous Provisions) Bill, 2012 टाइप का. कई राज्यों में. ऐसे कानून से पार्लियामेंट्री सेक्रेटरी का पोस्ट बनाया गया. मंत्री की रैंक रहेगी. विधायक को और क्या चाहिए. लाल बत्ती, सिक्यूरिटी, दबदबा. मंत्रीजी. 3. पर मामला फिर फंसा. संविधान के आर्टिकल 191 के मुताबिक कोई विधायक या सांसद सरकार के अंतर्गत किसी लाभ के पद पर नहीं रह सकते. विधायकी से बर्खास्त हो जायेंगे. हालाँकि कैबिनेट मिनिस्टर या मिनिस्टर ऑफ़ स्टेट को लाभ का पद नहीं माना जाता. पर पार्लियामेंट्री सेक्रेटरी को लाभ का पद माना जाता है. 4. इसका भी तोड़ है. राज्य सरकार कानून ला के पार्लियामेंट्री सेक्रेटरी के पोस्ट को लाभ के पद से मुक्त कर देती है. जैसे दिल्ली सरकार के कानून Delhi Members of Legislative Assembly (Removal of Disqualification) Act, 1997 के मुताबिक ये लाभ का ही पद है. केजरी सरकार ने कानून में बदलाव लाते हुए जून 2015 में Delhi Members of Legislative Assembly (Removal of Disqualification) Bill ,2015 लाया. इसमें प्रावधान था कि मंत्रियों को दिए गए पार्लियामेंट्री सेक्रेटरी पोस्ट को लाभ का पद ना माना जाये. और इसे बैक-डेट यानी 14 फ़रवरी 2015 से लागू किया जाए. इस बिल को एक्ट बनाने के लिए उप-राज्यपाल नजीब जंग और राष्ट्रपति की अनुमति जरूरी है. इस पर राष्ट्रपति ने इलेक्शन कमीशन से राय मांगी और बिल को रिजेक्ट कर दिया. फ़रवरी 2015 से अब तक 'लाभ के पद' पर बने रहने के चलते आम आदमी पार्टी के 21 विधायक बर्खास्त किए जा सकते हैं. संविधान के मुताबिक इलेक्शन कमीशन इसपर निर्णय लेगा. अरविंद केजरीवाल क्या कहते हैं? वो तो ट्वीट पहले करते हैं. कहते बाद में हैं.
कहते हैं कि हमने पहले ही डिक्लेयर कर दिया था कि इस पोस्ट के लिए किसी विधायक को पेमेंट नहीं दी जा रही. अब काम करने से क्यों रोक रहे हो?
दिक्कत कहां है?
1. विधायिका और कार्यपालिका दोनों राज्य के विधान सभा के अंग हैं. कार्यपालिका यानी सरकार. मुख्यमंत्री और मंत्री. बाकि सारे विधायक, चाहे सरकार की पार्टी के हों या किसी और की पार्टी के, कानून बनाने के लिए होते हैं. और सरकार पर लगाम रखने के लिए.अब पार्लियामेंट्री सेक्रेटरी बनाकर किसी विधायक को किसी मंत्री के नीचे लाना इस व्यवस्था को तोड़ना है.
2. विधायक को खुश करने के लिए मंत्री का दर्जा देना पब्लिक के पैसे को बर्बाद करना है.
3. संविधान के आर्टिकल 246 के मुताबिक कोई राज्य सरकार 'मंत्री के दरजे वाली' संवैधानिक पोस्ट नहीं बना सकती.
बाकी राज्यों में क्या हाल है?
1. अरुणाचल प्रदेश: बीजेपी के सपोर्ट से बने मुख्यमंत्री कलिको पुल ने 15 विधायक पार्लियामेंट्री सेक्रेटरी बनाये गए. (किसी ने कोर्ट में मामला नहीं उठाया.)
2. पंजाब: बीजेपी के सपोर्ट वाली बादल सरकार के 25 विधायक पार्लियामेंट्री सेक्रेटरी हैं. 60 अकाली विधायक और 12 बीजेपी के हैं. 72 में से 25 पार्लियामेंट्री सेक्रेटरी हैं. (किसी ने कोर्ट में मामला नहीं उठाया.)
3. राजस्थान: बीजेपी की सरकार ने 2016 में ही 5 विधायक पार्लियामेंट्री सेक्रेटरी बनाये. (किसी ने कोर्ट में मामला नहीं उठाया.)
4. पश्चिम बंगाल: ममता बनर्जी ने 2014 में 15 विधायक पार्लियामेंट्री सेक्रेटरी बनाये थे. पर कलकत्ता हाई कोर्ट ने जून 2015 में सबको बर्खास्त किया.
5. बंगलौर: 2015 में कांग्रेस की सरकार ने 10 विधायक पार्लियामेंट्री सेक्रेटरी बनाये. (किसी ने कोर्ट में मामला नहीं उठाया.)
6. तेलंगाना: 2015 में 6 विधायक पार्लियामेंट्री सेक्रेटरी बनाये गए. कोर्ट ने निरस्त किया.
7. मेघालय: 2015 में ही सारी घटनाओं के उल्टा जाकर विधायक लम्बोक्लंग मिल्लियम ने पार्लियामेंट्री सेक्रेटरी के पद से इस्तीफ़ा दे दिया. क्योंकि उनकी नज़र में ये संविधान के खिलाफ था.
8. नागालैंड: 2014 में 60 की असेम्बली में 24 विधायक पार्लियामेंट्री सेक्रेटरी बने. (किसी ने कोर्ट में मामला नहीं उठाया.)
9: छत्तीसगढ़: 2015 में ही बीजेपी की सरकार ने 8 विधायकों को पार्लियामेंट्री सेक्रेटरी बनाया. (किसी ने कोर्ट में मामला नहीं उठाया.)
हम क्या कहते हैं?
केजरीवाल के विधायकों पर आखिरी फैसला इलेक्शन कमीशन लेगा. अभी तो बस प्रेसिडेंट ने बिल को रिजेक्ट किया है. पर 'पैसे' ना लेने वाली बात मामले को पेचीदा बनाती है. वहीं ऑफिस ऑफ़ प्रॉफिट का कोई डेफिनिशन नहीं है. ये सरकारों की परिभाषा पर चलती है. देखते हैं क्या होता है. मामला पार्लियामेंट्री सेक्रेटरी तक ही नहीं है. राज्यों में 'मंत्री के रैंक वाले' बहुत सारे पोस्ट ऐसे ही बना दिए जाते हैं. उत्तर प्रदेश में 2015 में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने एक ही दिन में 82 चेयरमैन और बोर्ड पदाधिकारी बर्खास्त किए थे. सारे 'मंत्री वाली हैसियत' रखते थे. लगभग हर राज्य में ऐसे चेयरमैन और बोर्ड पदाधिकारी होते हैं. अगर विधायक अपने मंत्री के साथ काम करना चाहते हैं और उसके लिए उन्हें कोई अतिरिक्त सहूलियत नहीं चाहिए तो इस पद पर नियुक्ति की जरूरत ही क्या है. केजरीवाल सरकार पूर्ण बहुमत वाली सरकार है. उनके सब मंत्री उनकी बात मानते हैं. वो किसी को भी कह सकते हैं. कि तुम्हारे डिपार्टमेंट में फलाने और ढिमाके विधायक तुम्हारी हेल्प करेंगे. बात खतम. इसके लिए पद नवाजने की नौबत क्यों आई. और सब इतना ही सरल था तो बाद में बिल क्यों लाए. ये मामला संविधान से जुड़ा हुआ है. केजरीवाल अपने विधायकों को पैसे नहीं दे रहे थे पर पोस्ट जरूर दिए थे. कोर्ट ने 'पार्लियामेंट्री सेक्रेटरी' पर अपने फैसले भी सुनाए हैं. अभी तो प्रेसिडेंट ने 'इलेक्शन कमीशन' से राय लेकर बिल नहीं पास किया. आम आदमी पार्टी कोर्ट भी जा सकती है. अन्य राज्यों के 'पार्लियामेंट्री सेक्रेटरी ' वाले मुद्दे को उठा सकती है. उनके विधायक निलंबित भी हो सकते हैं. अन्य राज्यों में भी ये हो सकता है. पंजाब में चुनाव हैं. बहुत कुछ हो सकता है, देखते हैं. (ये स्टोरी दी लल्लनटॉप से जुड़े ऋषभ श्रीवास्तव ने लिखी है.)














