बच्चे 12-14 साल की उम्र में क्या करते हैं? ज्यादातर खेलने-कूदने से जुड़ी बातें करते हैं. पढ़ने वाले बच्चों में कुछ डॉक्टर बनना चाहते हैं. कुछ इंजीनियर. कुछ पायलट बनकर प्लेन उड़ाना चाहते हैं लेकिन अमेरिका की एक लड़की ने 12 साल की उम्र में खुद ही प्लेन बनाया और 14 साल की उम्र में उसे उड़ा भी लिया. इस होनहार लड़की को NASA और ‘ब्लू ओरिजिन’ जैसी संस्थाओं ने नौकरी का ऑफर भी दिया. एक यूनिवर्सिटी ने तो प्रोफेसर बनाने के लिए उन्हें करीब 1.1 मिलियन डॉलर (10.51 करोड़ रुपये) देने की पेशकश कर दी लेकिन लड़की ने सारे ऑफर ठुकरा दिए और अपने रिसर्च के काम में लग गई.
14 साल की थी, खुद का बनाया प्लेन उड़ाया था, इस लड़की को लोग 'अगला आइंस्टीन' कह रहे
सबरीना ने MIT से ग्रेजुएशन पूरा किया और करीब 2 दशकों तक फिजिक्स डिपार्टमेंट की टॉप करने वाली पहली महिला बनी. इसके अलावा उन्होंने प्रतिष्ठित ‘ओरलोफ स्कॉलरशिप’ पाने वाली भी पहली महिला बनी. सबरीना ने हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से अपनी PhD पूरी की.


ये जिस लड़की की कहानी हम आपको बता रहे हैं उसका नाम है, सबरीना गोंजालेज पास्टर्सकी. वो अब 33 साल की हैं.
साल 1993 में क्यूबन-अमेरिकी मां और एक पोलिश-अमेरिकी पिता के घर जन्मीं पास्टर्स्की को बचपन से ही जहाजों की दुनिया में काफी दिलचस्पी थी. 14 साल की उम्र तक आते-आते उन्होंने खुद के बनाए एक सिंगल-इंजन वाले प्लेन से उड़ान भर ली थी. इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, सालों बाद महान वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग का ध्यान उनकी रिसर्च पर गया. उसकी प्रतिभा ने लोगों पर ऐसा असर डाला कि लोग अमेरिका के शिकागो में जन्मी इस थ्योरेटिकल फिजिसिस्ट को अगला ‘अल्बर्ट आइंस्टीन’ कहने लगे हैं.
सबरीना को आइंस्टीन इसलिए नहीं कहा जाता कि उन्होंने आइंस्टीन की जगह ले ली है. बल्कि, इसलिए कहा जाता है क्योंकि वो उन सवालों के जवाब खोजने में लगी हैं, जो आइंस्टीन के काम के बाद भी अनसुलझा रह गया था. यानी, सबरीना पता लगाने में जुटी हैं कि क्वांटम लेवल पर ग्रेविटी कैसे काम करती है?
12 साल में बनाया प्लेनखैर, ये सब काफी वैज्ञानिक बातें हैं. उस पर विस्तार से चर्चा कभी और. फिलहाल, हम सबरीना के हवाई जहाज के शौक पर आते हैं. बचपन से ही सबरीना को एविएशन में काफी दिलचस्पी थी. उन्होंने 12 साल उम्र में एक किट की मदद से ‘जेनिथ CH 601 XL’ विमान को बनाना शुरू किया था. करीब 2 साल के बाद उन्होंने अपने इस प्रोजेक्ट को पूरा भी कर लिया. सिर्फ 14 साल की उम्र में उन्होंने अकेले ही इस प्लेन को उड़ाया भी. हालांकि, 14 साल के बच्चों को कानूनी तौर पर गाड़ी चलाने की भी परमिशन नहीं मिलती, लेकिन इस उम्र में सबरीना ने खुद से बनाया हुआ प्लेन उड़ाया था.
विज्ञान के प्रति उनका जुनून ‘इलिनोइस मैथमेटिक्स एंड साइंस एकेडमी’ में भी देखा गया, जहां सबरीना ने US ने इंटरनेशनल फिजिक्स ओलंपियाड टीम में जगह बनाने के लिए कठिन मुकाबला किया. इसके बाद नासा के कैनेडी स्पेस सेंटर और ब्लू ओरिजिन जैसी संस्थाओं में इंटर्नशिप की. साल 2010 में सबरीना ने मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MIT) में अप्लाई किया, लेकिन उन्हें वेटिंग लिस्ट में डाल दिया गया. पर उनके बनाए हुए प्लेन ने पूरा मामला ही पलट दिया.
सबरीना ने MIT से ग्रेजुएशन पूरा किया और करीब 2 दशकों तक फिजिक्स डिपार्टमेंट की टॉप करने वाली पहली महिला बनीं. इसके अलावा उन्होंने प्रतिष्ठित ‘ओरलोफ स्कॉलरशिप’ पाने वाली भी पहली महिला बनीं. सबरीना ने हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से अपनी PhD पूरी की. उन्होंने मशहूर फिजिसिस्ट एंड्रयू स्ट्रामिंगर के अंडर में अपनी रिसर्च की पढ़ाई पूरी की. स्ट्रॉमिंगर और अलेक्जेंडर जिबोडेव के साथ काम करते हुए सबरीना ने ‘स्पिन मेमोरी इफेक्ट’ पर रिसर्च का काम पूरा किया.
यह ग्रैविटेशनल वेव्स यानी गुरुत्वाकर्षण तरंगों और स्पेस-टाइम से जुड़ा एक अहम कॉन्सेप्ट है है. सबरीना के इस काम ने दुनिया भर का ध्यान खींचा. स्टीफन हॉकिंग जैसे बड़े वैज्ञानिक ने भी अपने आखिरी साइंटिफिक रिसर्च पेपर में इसका जिक्र किया, जो सबरीना के लिए बहुत बड़ी बात थी.
नासा की नौकरी ठुकराईविज्ञान पढ़ने वाले हर स्टूडेंट का सपना होता है कि उसे नासा जैसी बड़ी स्पेस कंपनी में काम करने का मौका मिले. सबरीना के पास ये मौके खुद चलकर आए. इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, नासा ने सबरीना से खुद संपर्क किया. उन्हें नौकरी देना चाहा लेकिन सबरीना ने मना कर दिया. जेफ बेजोस की स्पेस कंपनी है, ब्लू ओरिजिन. उसने भी सबरीना को ऑफर दिया था. इतना ही नहीं, ब्राउन यूनिवर्सिटी तो उन्हें अपने यहां असिस्टेंट प्रोफेसर बनाना चाहता था. इसके लिए करीब 11 लाख डॉलर यानी करीब 10.51 करोड़ रुपये के सालाना पैकेज का ऑफर भी दिया गया लेकिन सबरीना ने ये सारे ऑफर ठुकरा दिए.
बाद में सबरीना साल 2021 में कनाडा के ‘पेरिमीटर इंस्टीट्यूट फॉर थियोरेटिकल फिजिक्स’ से जुड़ गईं. यहां वह सबसे कम उम्र की रिसर्च फैकल्टी मेंबर्स में से एक बन गईं. यहां पर उन्होंने ‘सेलेस्टियल होलोग्राफी इनिशिएटिव’ प्रोग्राम शुरू किया. यह एक रिसर्च प्रोग्राम है, जो क्वांटम मैकेनिक्स और ग्रेविटी के बीच का संबंध पता लगाने की कोशिश करता है. साल 2023 में इस प्रोग्राम को साइमन्स फाउंडेशन की ओर से करीब 80 लाख डॉलर (66 से 68 करोड़ रुपये) की ग्रांट किए गए. बाद में इस प्रोजेक्ट के साथ हावर्ड, ऑक्सफोर्ड, कैंब्रिज और ‘इंस्टीट्यूट फॉर एडवांस्ड स्टडी’ जैसे बड़े संस्थानों के रिसर्चर भी जुड़े.
ग्रेविटी और क्वांटम पर नई रिसर्चसबरीना ग्रेविटी और क्वांटम मैकेनिक्स को जोड़कर नई रिसर्च कर रही हैं. दरअसल, ग्रेविटी और क्वांटम मैकेनिक्स दोनों ही अलग-अलग तरीके से काम करते हैं, लेकिन दोनों को एक साथ जोड़कर काम करने में अच्छा रिजल्ट नहीं निकलता है. यही बात है जिसकी पड़ताल में सबरीना लगी हुई हैं. अगर उनकी रिसर्च सफल होती है तो विज्ञान के क्षेत्र में नई क्रांति हो सकती है. यहां तक कि ऐसी टेक्नोलॉजी के लिए भी रास्ते खुल सकते हैं, जिनके बारे में हम-आप या कोई वैज्ञानिक सोच भी नहीं सकता.
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