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विलेन से 'GOOD BOY' बनने की कहानी: अमेरिका क्यों हटाने जा रहा है सीरिया से 'आतंकवादी देश' का ठप्पा?

US on Syria: मार्को रुबियो के एक बयान ने मध्य-पूर्व की सियासत में भूचाल जा दिया है. बयान के मुताबिक राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की 'अमेरिका फर्स्ट' नीति के तहत सीरिया से 'आतंकवादी देश' का ठप्पा हटाया जा रहा है. रूस-ईरान संबंधों के अलावा इस फैसले से भारत के हित भी इसके चलते प्रभावित हो सकते हैं.

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सीरिया के विलेन से 'GOOD BOY' बनने की कहानी (फोटो-AFP)

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  • अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने घोषणा की है कि राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के निर्देशानुसार अमेरिका जल्द ही सीरिया को 'स्टेट स्पॉन्सर ऑफ टेररिज्म' की सूची से बाहर कर देगा।
  • 1979 में अमेरिका ने सीरिया को आतंकवाद का प्रायोजक घोषित किया था, जिसके पीछे फिलिस्तीनी और लेबनानी विद्रोही गुटों को समर्थन देने के साथ 2011 के गृहयुद्ध और केमिकल हथियारों के इस्तेमाल के आरोप थे।
  • सीरिया को सूची से बाहर करने से अमेरिकी कंपनियों को वहां निवेश और पुनर्निर्माण के अवसर मिलेंगे, जिससे मध्य-पूर्व में अमेरिका की रणनीतिक और आर्थिक स्थिति प्रभावित हो सकती है।

ये दुनिया की सियासत है साहब, यहांं कोई मुल्क किसी का सगा नहीं होता. कल का दुश्मन आज का दोस्त बन सकता है और आज का दोस्त कल आपको आंखें दिखा सकता है. 8-9 जुलाई 2026 को कुछ ऐसा ही हुआ जिसने पूरी दुनिया की मीडिया और कूटनीतिक गलियारों को चौंका दिया. अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने एक ऐसा बयान दिया, जिसकी उम्मीद किसी को नहीं थी. उन्होंने कहा कि 

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राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के निर्देश पर अमेरिका जल्द ही सीरिया को 'स्टेट स्पॉन्सर ऑफ टेररिज्म' (आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले देशों की सूची) से बाहर कर देगा. 

समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक ये एक ऐसा फैसला है जो मध्य-पूर्व (Middle East) की पूरी राजनीति को सिर के बल खड़ा कर सकता है.

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ये खबर इसलिए भी बड़ी है क्योंकि अमेरिका ने सीरिया को हमेशा एक ग्लोबल विलेन की तरह पेश किया है. लेकिन अब अचानक ऐसा क्या हो गया कि व्हाइट हाउस को सीरिया से प्यार हो गया है? इसे समझने के लिए हमें इतिहास के पन्नों को पलटना होगा. ‘बीबीसी’ की रिपोर्ट के मुताबिक बात सिर्फ आज की नहीं है, बल्कि दशकों पुरानी दुश्मनी की है.

सीरिया पर ये ठप्पा लगा कब था?

आपको जानकर हैरानी होगी कि सीरिया उन देशों में शुमार है, जिन पर अमेरिका ने सबसे पहले ये बैन लगाया था. साल 1979 में जब अमेरिका ने पहली बार 'स्टेट स्पॉन्सर ऑफ टेररिज्म' की लिस्ट बनाई, तो उसमें सीरिया का नाम सबसे ऊपर था. वजह थी फिलिस्तीनी और लेबनानी विद्रोही गुटों को सीरिया का खुला समर्थन. 

लेकिन असली दुश्मनी तब शुरू हुई जब 2011 में 'अरब स्प्रिंग' (Arab Spring) के दौरान सीरिया में भयंकर गृहयुद्ध (Civil War) छिड़ गया. बशर अल-असद की सरकार ने अपने ही लोगों पर जुल्म ढाए. बात तब हद से आगे बढ़ गई जब 2013 में असद सरकार पर आरोप लगा कि वो अपने ही नागरिकों पर रासायनिक हथियारों (Chemical Weapons) का इस्तेमाल कर रहे हैं. ओबामा प्रशासन ने तब सीरिया पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए और वो दुनिया की नजरों में एक खूंखार देश बन गया.

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ट्रंप का इतिहास और सीरिया का कनेक्शन

यहां सबसे दिलचस्प बात ये है कि डॉनल्ड ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में सीरिया पर बम बरसाए थे. 2017 और 2018 में जब सीरिया में फिर से केमिकल अटैक की खबरें आईं, तो ट्रंप ने सीधे सीरियाई एयरबेस पर टॉमहॉक मिसाइलें (Tomahawk Missiles) दागी थीं. तो फिर आज वही ट्रंप सीरिया पर मेहरबान क्यों हो रहे हैं? ‘काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशन्स’ (Council on Foreign Relations) की मानें तो इसका सीधा सा जवाब है - ट्रंप की 'अमेरिका फर्स्ट' नीति. ट्रंप प्रशासन कभी भी खैरात में कुछ नहीं बांटता. अगर वो सीरिया से ये ठप्पा हटा रहे हैं, तो इसके पीछे एक बहुत बड़ी डील सेट हुई है. 

सीरिया में ईरान और रूस का खेल

ट्रंप चाहते हैं कि सीरिया में रूस और ईरान का जो जमावड़ा है, उसे तोड़ा जाए. पिछले एक दशक में सीरिया पूरी तरह से रूस और ईरान की कठपुतली बन चुका था. ईरान अपने हथियार सीरिया के रास्ते ही लेबनान में हिजबुल्लाह तक पहुंचाता रहा है. ट्रंप और मार्को रुबियो की जो नई कूटनीति है, वो ईरान को मध्य-पूर्व में पूरी तरह से अलग-थलग करने की है.

‘अल जजीरा’ (Al Jazeera) की रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका अब सीरिया की नई लीडरशिप या मौजूदा व्यवस्था में अपने लिए जगह बना रहा है ताकि वो ईरान के इस 'एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस' (Axis of Resistance) की कमर तोड़ सके.

तेल के कुएं और रीकंस्ट्रक्शन का पैसा

इसके अलावा, सीरिया के तेल के कुओं पर भी अमेरिका की नजर हमेशा से रही है. पूर्वी सीरिया में मौजूद तेल के बड़े भंडारों पर फिलहाल अमेरिकी सेनाओं और उनके समर्थित कुर्द लड़ाकों का कंट्रोल है. ‘फॉरेन पॉलिसी’ (Foreign Policy) की रिपोर्ट ‘द बिजनेस ऑफ रिबिल्डिंग सीरिया’ (The Business of Rebuilding Syria) के मुताबिक ट्रंप का बिजनेस माइंडसेट कहता है कि दुश्मनी से ज्यादा फायदा दोस्ती की आड़ में किए गए व्यापार में है. 

सीरिया इस वक्त पूरी तरह से बर्बाद हो चुका है. इसे फिर से बनाने (reconstruction) के लिए अरबों डॉलर के कॉन्ट्रैक्ट मिलने वाले हैं. चीन इन कॉन्ट्रैक्ट्स पर गिद्ध की तरह नजर गड़ाए बैठा है. ट्रंप चाहते हैं कि सीरिया के पुनर्निर्माण का ठेका अमेरिकी कंपनियों को मिले, ना कि चीन को. इसी वजह से सीरिया को टेरर लिस्ट से बाहर निकाला जा रहा है ताकि अमेरिकी कंपनियां वहां लीगल तरीके से काम कर सकें.

तुर्किये और कुर्द लड़ाकों का एंगल

इस पूरी कहानी में एक और बड़ा प्लेयर है, और वो है तुर्किये. तुर्किये की सीमा सीरिया से लगती है. अमेरिका सीरिया में कुर्द लड़ाकों का समर्थन करता आया है, जिन्होने आईएसआईएस को खत्म करने में अमेरिका की बहुत मदद की थी. लेकिन तुर्किये इन कुर्द लड़ाकों को आतंकवादी मानता है. ट्रंप के लिए ये एक बहुत बड़ी सिरदर्दी रही है. 

‘फॉरेन अफेयर्स’ (Foreign Affairs) की रिपोर्ट ‘टर्की, कुर्द एंड यूएस पॉलिसी’ (Turkey, Kurds and US Policy) के मुताबिक सीरिया को इस लिस्ट से बाहर निकालकर ट्रंप तुर्किये के राष्ट्रपति एर्दोगान को भी एक मैसेज देना चाहते हैं. वो चाहते हैं कि इस पूरे रीजन में अमेरिका एक मीडिएटर की तरह काम करे, जो अपनी शर्तों पर शांति समझौता करवा सके. अगर सीरिया की सरकार कुर्द लड़ाकों के साथ कोई समझौता कर लेती है, तो अमेरिका आसानी से अपनी सेना वहां से निकाल सकता है.

मार्को रुबियो का बयान क्यों अहम है?

मार्को रुबियो अमेरिका के उन नेताओं में गिने जाते हैं जो चीन और ईरान को लेकर बहुत आक्रामक रुख रखते हैं. अगर वो खुद सामने आकर सीरिया को क्लीन चिट देने की बात कर रहे हैं, तो इसका मतलब है कि पेंटागन और सीआईए ने मिलकर एक सॉलिड ब्लूप्रिंट तैयार किया है. 

‘वॉशिंगटन पोस्ट’ की रिपोर्ट ‘मार्को रूबियो और अमेरिकी विदेश रणनीति’ (Marco Rubio and US Foreign Strategy) के मुताबिक ये फैसला इजरायल की सुरक्षा से भी जुड़ा है. इजरायल और सीरिया के बीच गोलान हाइट्स को लेकर हमेशा टेंशन रहती है. अगर सीरिया अमेरिका के पाले में आता है, तो इजरायल के लिए भी बॉर्डर पर शांति मेंटेन करना आसान हो जाएगा.

भारत पर क्या असर पड़ेगा?

अब आते हैं अपने मतलब की बात पर. मध्य-पूर्व में हो रहे इस बड़े बदलाव से भारत के व्यापारिक और रणनीतिक हितों पर क्या असर पड़ेगा? ‘द हिंदू’ की रिपोर्ट की रिपोर्ट ‘सीरिया के साथ भारत के कूटनीतिक संबंध’ (India's Diplomatic Ties with Syria) के मुताबिक भारत के लिए मध्य-पूर्व बहुत जरूरी है. हमारे लाखों लोग वहां काम करते हैं और हमारा ज्यादातर तेल वहीं से आता है. सबसे बड़ी बात ये है कि भारत ने सीरिया के गृहयुद्ध के दौरान भी अपनी एंबेसी दमिश्क में कभी बंद नहीं की. भारत हमेशा से बशर अल-असद सरकार के साथ कूटनीतिक संतुलन बनाकर चलता रहा है.

कूटनीतिक थिंक टैंक ‘इंडिया मैटर्स’ के रोहित शर्मा इसे भारत के लिए अच्छा संकेत मानते हैं. लल्लनटॉप से बात करते हुए रोहित कहते हैं कि 

सीरिया पर से अमेरिकी प्रतिबंध हटने का मतलब है कि भारत अब खुलकर सीरिया के साथ व्यापार कर सकेगा. पहले अमेरिकी प्रतिबंधों के डर से कई भारतीय कंपनियां सीरिया में निवेश करने से कतराती थीं. अब ये रास्ता पूरी तरह से साफ हो जाएगा. सीरिया को फिर से बसाने में इंफ्रास्ट्रक्चर, आईटी, और फार्मास्युटिकल सेक्टर की बहुत जरूरत है. 

‘ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन’ (Observer Research Foundation) की रिसर्च ‘मिडिल ईस्ट में भारत’ (India in the Middle East) भारत की दवाइयां सीरिया में पहले से ही बहुत लोकप्रिय हैं. अब भारतीय कंपनियां सीरिया के रीकंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट्स में बड़ा रोल निभा सकती हैं.

दूसरी तरफ ‘इंडियन एक्सप्रेस’ के मुताबिक, सीरिया में शांति आने से इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर और ईरान के चाबहार पोर्ट प्रोजेक्ट को भी बल मिलेगा. भारत का सपना है कि वो चाबहार के जरिए सेंट्रल एशिया और यूरोप तक अपनी पहुंच बनाए. सीरिया के शांत होने से इस पूरे रीजन में व्यापारिक रूट सुरक्षित हो जाएंगे, जो भारत की अर्थव्यवस्था के लिए किसी बूस्टर डोज से कम नहीं होगा.

आम सीरियाई नागरिकों की जिंदगी पर असर

अमेरिका के इस फैसले को सिर्फ नेताओं और कूटनीति के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए. इसका सीधा असर सीरिया के उन करोड़ों आम नागरिकों पर भी पड़ेगा, जो पिछले कई सालों से नरक जैसी जिंदगी जी रहे हैं. ‘वर्ल्ड बैंक’ के मुताबिक प्रतिबंधों की वजह से सीरिया में विदेशी निवेश पूरी तरह से जीरो हो चुका था. 'स्टेट स्पॉन्सर ऑफ टेररिज्म' का ठप्पा हटने से सीरिया को इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड और वर्ल्ड बैंक से कर्ज मिलने का रास्ता भी खुल जाएगा. इससे वहां की टूटी हुई सड़कों, बर्बाद हो चुके स्कूलों और खस्ताहाल अस्पतालों को फिर से बनाने का काम शुरू हो सकेगा.

ये अमेरिका के फायदे की बात है!

कुल मिलाकर कहानी ये है कि जियोपॉलिटिक्स में नैतिकता से ज्यादा अहमियत हितों की होती है. सीरिया का इतिहास चाहे जितना खूनी रहा हो, लेकिन आज के समय में अमेरिका को वहां अपने हित नजर आ रहे हैं. ‘ग्लोबल पॉलिसी जर्नल’ के मुताबिक ट्रंप की ये चाल ईरान को घेरने और रूस को कमजोर करने की एक बड़ी कूटनीतिक बिसात है. आने वाले दिनों में मध्य-पूर्व की राजनीति में कई और बड़े उलटफेर देखने को मिल सकते हैं. फिलहाल दुनिया की नजर इस बात पर है कि सीरिया इस अमेरिकी मेहरबानी के बदले ट्रंप को क्या रिटर्न गिफ्ट देता है. राजनीति का यही उसूल है, यहां कोई पक्का दुश्मन नहीं होता, बस पक्के फायदे होते हैं. 

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