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बंद हो गईं वो अदालतें, जो आतंकियों को मौत की सज़ा सुना रही थीं

इन अदालतों में 275 केस की सुनवाई हुई और 161 को मौत की सज़ा दे दी गई.

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फोटो - thelallantop
पेशावर में आर्मी स्कूल पर आतंकी हमला. दिल दहला दिया था इस अटैक ने. सैकड़ों मां-बाप के अरमान कुचले गए थे. तबाही का मंज़र था. और पाकिस्तान के लिए सबक लेने का वक्त. फैसले लिए गए. आतंक को ख़त्म करने की कसमें खाई गईं. मगर हालात अब भी वही हैं. धमाके होते हैं. लोग मरते हैं. आतंकी खुलेआम घूमते हैं. पाकिस्तान को नजर नहीं आता. बस सबूत मांगता रहता है. लेकिन आर्मी ने इस हमले के बाद कुछ अदालतें बनाने की बात की थी. जिसको वहां के सुप्रीम कोर्ट ने इजाज़त दे दी थी. इन अदालतों ने दो साल में ताबड़तोड़ फैसले लिए. 275 मामलों की सुनवाई इन अदालतों में हुई और 161 को मौत की सजा सुना दी गई. लेकिन जो काम खुद कोर्ट को करना चाहिए था उसके लिए आर्मी की अदालतें बनाने से विवाद हुआ. इसे मानवाधिकार के खिलाफ बताया गया. दो साल बाद अब ये अदालतें बंद हो गई हैं.
16 दिसंबर 2014 को पेशावर के आर्मी स्कूल पर तालिबानी हमला हुआ. उस हमले में 150 से ज्यादा बच्चे मारे गए. तब पाकिस्तानी आर्मी ने सख्ती से आतंकियों के सफाए करने की बात की. और आर्मी अदालतें बनाये जाने की मांग हुई, जिसमें आतंकियों का फैसला फटाक से किया जा सके. अदालतों में पड़ा न रहे. आर्मी अदालतों को बनाने के लिए संविधान में संशोधन करना पड़ा और दो साल के लिए ये अदालतें बना दी गईं. जिनकी मियाद 7 जनवरी को पूरी हो गई.
तालिबानी हमले में 16 दिसंबर को पेशावर में 150 से ज्यादा बच्चे मारे गए थे.
तालिबानी हमले में 16 दिसंबर को पेशावर में 150 से ज्यादा बच्चे मारे गए थे.
आर्मी अदालतें बनाये जाने भारी बहस छिड़ गई थी और अदालतों में विभिन्न ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट ने इसे देश के संविधान और इंटरनेशनल चार्टरों में मौजूद ह्यूमन राइट्स के खिलाफ बताया. लेकिन इन विरोधों के बाद भी इन अदालतों को काम करने दिया गया, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने संसद की ओर से साल 2015 में लागू किए गए 21वें संवैधानिक संशोधन और पाकिस्तान सेना (संशोधन) विधेयक, 2015 को वैध करार दिया था.
संविधान में किए गए संशोधन में यह स्पष्ट तय कर दिया गया था कि ये अदालतें दो साल बाद खत्म कर दी जाएंगी. इस फैसले से आर्मी के पास लोगों पर मुकदमा चलाने की पॉवर आ गई थी. दो साल के दौरान आर्मी अदालतों को 275 मामले सौंपे गए, जिनमें 161 आतंकियों को मौत की सजा सुनाई गई. इनमें से अभी तक सिर्फ 12 आतंकियों को मौत मिली है. इन अदालतों ने 116 आतंकियों को कैद की सजा सुनाई, जिनमें से ज्यादातर उम्रकैद की सजा काट रहे हैं.
जिन आतंकियों को सजाएं सुनाई गर्इं, वे अल-कायदा, तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान, जमातउल अहरार, तौहीद वल जिहाद ग्रुप, जैश-ए-मुहम्मद, हरकत-उल-जिहाद-ए-इस्लामी, लश्कर-ए-झंगवी, लश्कर-ए-झंगवी अल-आलमी, लश्कर-ए-इस्लामी और सिपह-ए-सहाबा से जुड़े थे. अब तक जिन आतंकियों को फांसी पर लटकाया जा चुका है उनमें पेशावर स्कूल पर अटैक कराने वाला भी शामिल था. जिन आतंकी मामलों को आर्मी कोर्ट में भेजा जा रहा था अब वो देश में पहले से मौजूद एंटी टेरर कोर्ट में सुनवाई के लिए जाएंगे.


 

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