अब थोड़े से आंकड़े दे देते हैं. पकाऊ होंगे लेकिन आंखें चौड़ी करने वाले. अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोशिएशन ने आंकड़े दिए हैं कि 60 परसेंट महिलाएं सेल्फीसाइड का शिकार हैं, और उनको पता भी नहीं. और सुनो. 2015 की रिसर्च आई थी जिसमें कहा गया कि इस साल शार्क के हमलों से ज्यादा मौतें सेल्फी की वजह से हुईं. बीते साल के आंकड़े बताते हैं कि सेल्फी से हुई मौतों में इंडिया नंबर वन है. गूगल न्यूज आर्काइव के आंकड़े से दो साल में 19 मौतें सेल्फी की वजह से हुईं.आंकड़ों से बोर हुए तो आदतों के बारे में जान लो. ट्रेन की पटरी, ताज होटल, एयरपोर्ट, बेड, बाथरूम, शादी, बाइक कार की सीट पर, कोबरा के साथ, गधे और शेर के साथ, पहाड़ों की ऊंचाई से, कुएं की गहराई. बर्फ में नंगे बदन, पानी से लेकर दारू पीते. मतलब कोई जगह, पोश्चर, अभी तक बचा नहीं है जिसमें सेल्फी न ली गई हो. कभी कभी तो रंग में नहाए हुए सेल्फी भी ली जाती है जिसमें कोई पहचाने भी नहीं. कभी किसी सेलिब्रिटी के साथ सेल्फी होती है जिस सेलिब्रिटी को कोई जानता भी नहीं.
तो साहिबान ये हाल है सेल्फी के नशे का. मॉडर्नता एडिक्शन कहने से आती है. आप शब्द छोड़ो भावनाओं पर ध्यान दो. अब एक बात बताओ. दुनिया में सबसे बुरा क्या है? बाप के कंधे पर बेटे का जनाज़ा? उससे भी बुरा कुछ है. अगर वो बेटा सेल्फी लेते हुए मरा हो. ये एके हंगल नहीं बताएंगे क्योंकि वो इस दुनिया में हैं नहीं. हम बता रहे हैं. मतलब एक बात बताओ यार. जिस डैम पर जाकर सेल्फी लेने की सोची तुमने वो डैम फ़ूल भी न सोचे. बहादुरी और बेवकूफी के बीच में जो लक्ष्मण रेखा होती है उसको कब पार कर गए तुम, पता ही नहीं चला. डैम पर जाकर नीचे चले गए, फिर ऊपर. पता नहीं स्वर्ग गए कि नर्क. सेल्फी स्टिक्स ने काम आसान कर दिया है लेकिन अभी वैसी क्रीम या थेरेपी नहीं आई हैं जिनसे मुंह परमानेंट पाउट नुमा रह सके. अगर आ जाती तो उसकी बिक्री जियो सिम से ज्यादा होती, लिख के रख लो. अपने मुंह के साथ इतने अत्याचार शास्त्रीय गायक भी नहीं करता है जितना ये सेल्फी लेने वाले कर जाते हैं. फिर पेड़ पर चढ़कर और दीवार पर लटककर सेल्फी लोगे तो पाउट वाला मुंह तो टूटेगा है, जान जाने में भी कसर नहीं रहेगी. https://www.youtube.com/watch?v=A_aPgPq6hMM
एक बात बताओ यार. बरसों से सुनते आ रहे हो कि गांव के लोग सुबह लोटा लेकर टट्टी 'लाइन' पर जाते हैं. ट्रेनों से निकलने वाली टट्टी लाइन पर जाती है. इतनी टट्टी के बीच में खड़े होकर सेल्फी खींचने का रोमांच क्या है दोस्त? उसमें पाउट बनाने की जरूरत ही क्या होगी. नाक अपने आप सिकुड़ जाती होगी. अगर ट्रेन तुमको टट्टी में मिलाकर गुजर जाती है तो न ट्रेन की गलती है न टट्टी की. ये सेल्फी की दीवानगी है.अति हर चीज़ की खतरनाक होती है. औकात से ज्यादा सेल्फी जानलेवा है. यार सेल्फी लेते हुए मर जाना, इससे बुरा कुछ हो ही नहीं सकता. सोचो पैदा ही क्यों हुए थे. अगर सेल्फी लेते हुए कोई मर गया तो मां बाप को, घर वालों को अफसोस होता है. दुख का पहाड़ टूट पड़ता है. जो आंसू बहते हैं उनको सेल्फी के नशेड़ी डिजर्व नहीं करते.
अगर सेल्फी से मौतें ऐसे ही जारी रहीं तो मोबाइल के फ्रंट कैमरे के साथ सिगरेट के पैकेट जैसा नोट लिखा आएगा. "सेल्फी जानलेवा है. न लें न लेने दें." ये भी पढ़ें: सेल्फी विद कोबरा इंस्टाग्राम पर, फोटो खींचक जेल में फेसबुक पर चेंपी 'सेल्फी विद कोबरा', डसा लिए 25 हजार












