‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ (One Nation, One Election) का व्यापक आर्थिक प्रभाव देखने-जोखने वाली एक कमेटी का कहना है कि अगर विधानसभा और लोकसभा चुनाव एक साथ होते हैं, तो ये आर्थिक नज़रिए से अच्छा है. इससे GDP ग्रोथ रेट में बेहतरी होती है और ख़र्च का प्रबंधन भी बेहतर हो जाता है. महंगाई भी कम हो सकती है.
लोकसभा-विधानसभा चुनाव साथ कराने से महंगाई घटती है... इस कमेटी ने तो खूब फायदे गिना दिए
One nation-One election का नफ़ा-नुक़सान मापने के लिए Modi सरकार ने एक कमेटी बनाई थी. उसकी रिपोर्ट में क्या-क्या है?


नरेंद्र मोदी सरकार लोकसभा और सभी विधानसभा चुनाव साथ कराना चाहती है. इसका नफ़ा-नुक़सान मापने के लिए उन्होंने पिछले साल - सितंबर 2023 में - पूर्व-राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में एक उच्च-स्तरीय समिति का गठन किया था. समिति ने अलग-अलग राष्ट्रीय-क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के साथ बातचीत की है. जनता और न्यायविदों से भी राय मांगी गई है.
इस आईडिया को हक़ीक़त बनाने में क्या चुनौतियां आ सकती हैं, ये जानने के लिए कई टीम्स में काम चल रहा है. आर्थिक बेहतरी का दावा करने वाली ये रिपोर्ट पंद्रहवें वित्त आयोग के पूर्व अध्यक्ष एनके सिंह और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के सिस्टमिक डिवीज़न इशूज़ की प्रमुख प्राची मिश्रा ने बनाई है. इंडियन एक्स्प्रेस की दामिनी नाथ की रिपोर्ट के मुताबिक़, कोविंद कमेटी इस हफ़्ते राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को अपनी फ़ाइनल रिपोर्ट सौंप देगी.
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आज़ादी के बाद तो सभी चुनाव साथ ही होते थे. साल 1951-52, 1957, 1962 और 1967 में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ ही हुए. जब एन के सिंह और प्राची मिश्रा ने अपनी रिपोर्ट के लिए रिसर्च शुरू की, तो बताया कि 60 के दशक से पहले का आर्थिक डेटा बहुत डिटेल में मिला नहीं. इसीलिए उन्होंने अपनी रिपोर्ट में 1962 के बाद के चुनावों पर ज़्यादा ध्यान दिया है. उन चुनावों को भी शामिल किया गया, जब 40% से ज़्यादा राज्यों में एक साथ चुनाव हुए थे. 1962, 1967, 1977, 1980 और 1984-85 का दो साल पहले और दो साल बाद का डेटा लिया और पाया गया कि औसतन GDP बढ़त 1.5% बढ़ी है.
हालांकि, एक्सप्रेस की रिपोर्ट में ये भी छपा है कि रिपोर्ट के लिए जब कुछ बाहरी विशेषज्ञों और अर्थशास्त्रियों से बातचीत की गई, तो उन्होंने कहा कि वृद्धि और महंगाई की वजह सिर्फ़ चुनाव नहीं हैं. और वजहें होती हैं. मसलन, खाद्य पदार्थ की क़ीमत बढ़ जाना, सप्लाई कमज़ोर हो जाना. इन कारकों का चुनाव से कोई लेना-देना नहीं है.
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रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि आर्थिक कारकों के अलावा ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ का शिक्षा और अपराध दर पर भी असर पड़ेगा. दरअसल, चुनावों के वक़्त स्कूल के शिक्षकों और पुलिसकर्मियों सहित कई विभागों के कर्मचारियों की ड्यूटी लगती है. जितनी बार चुनाव, उतनी बार ड्यूटी, उतना ही नुक़सान स्कूलों और नागरिक सुरक्षा का. डेटा से ये बात स्थापित की गई है कि साथ चुनाव करवाने और न करवाने में सीधे-सीधे नामांकन प्रभावित होता है. सुरक्षा को लेकर भी NCRB के डेटा का हवाला दिया गया है.












