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'हर घर तिरंगा' के लिए सैलरी से 38 रुपये काटने की बात कही, रेलवे में काम करने वाले नाराज हो गए!

नॉर्थ सेंट्रल रेलवे ने एक झंडे की कीमत 38 रुपये लगाई है. ठेका एक निजी कंपनी को दिया है.

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तिरंगा और रेलवे की सांकेतिक तस्वीर. (फाइल फोटो- आजतक)

15 अगस्त आने को है. हर जगह देशभक्ति का माहौल है. आज़ादी की 75वीं वर्षगांठ के मौके पर सरकार ने हर घर तिरंगा अभियान (Har Ghar Tiranga) चलाया है. सरकार का अभियान है और देशभक्ति का मामला है, तो सरकारी कर्मचारियों तो शामिल होंगे ही. इसीलिए रेलवे का हर कर्मचारी अपने घर में तिरंगा फहराए, इसकी विशेष व्यवस्था की गई है. नॉर्थ सेंट्रल रेलवे खुद अपने सभी कर्मचारियों को तिरंगा मुहैया कर रहा है. और इसके लिए इस जोन के सभी कर्मचारियों की सैलरी से काटे जाएंगे 38 रुपये.

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वैसे, आपको बचपन का 15 अगस्त याद है. जब स्कूल वाले एक टेलर को ठेका दे देते थे कि सारे बच्चे उसी के यहां से 15 अगस्त की स्पेशल ड्रेस खरीदेंगे. एक ही दुकान से खरीदे गए कपड़ों में सारे बच्चे झक्क सफेद बन कर आते थे. लड़कियों के पास तो चोटी में तिरंगा वाला बैंड लगाने का प्रिविलेज अलग होता था. तो स्कूल जैसी ही कुछ व्यवस्था नॉर्थ रेलवे ने की है. कर्मचारियों घर भले ही छोटे बड़े, खुद के या किराये के हों, तिरंगा एक जैसा ही फहरेगा.

कर्मचारियों की नाराजगी

आदेश आने के बाद नाराजगी की आवाजें भी सुनाई दे रही हैं. नार्थ सेंट्रल रेलवे एंप्लाइज संघ के लोगों ने इस व्यवस्था पर कड़ी नाराजगी जताई है. मंडल मंत्री चंदन सिंह के मुताबिक झंडों की खरीददारी कर्मचारी लाभ कोष यानी स्टाफ बेनिफिट फंड से की जानी है और बाद में सैलरी से काट कर पैसे इसी फंड में वापस भेज दिए जाएंगे. चंदन सिंह का कहना है कि झंडों की खरीददारी फंड से ही की जाए, कर्मचारियों का वेतन ना काटा जाए.

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अब एक बहस ये भी है कि 38 रुपये का झंडा थोड़ा महंगा नहीं हो गया! बीजेपी दफ्तर में जाकर झंडा खरीदेंगे तो 20 रुपये में ही मिल जाएगा. घर पर बैठे बिठाए डाक विभाग भी झंडा देने के लिए तैयार है. उसके लिए डाक विभाग भी 25 रुपये ही मांग रहा है. तो रेलवे के कर्मचारियों को 38 रुपये वाला झंडा क्यों बेंचा जा रहा है.

इस बीच रेलवे के CPRO का बयान सामने आया है. उन्होंने कहा है कि आदेश आया है कि कर्मचारियों के वेतन से 38 रुपये काटे जाएंगे, और झंडा रेलवे की तरफ से उपलब्ध कराया जाएगा.

खैर, बता दें कि रेलवे ने झंडा बनाने का ठेका एक निजी एजेंसी को दिया है, जैसे स्कूल वाले टेलर देते थे. हालांकि रेलवे 'अभी' सरकार के ही अधीन है

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