पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच सऊदी अरब के कच्चे तेल के निर्यात पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं. यमन के हूती विद्रोहियों के लगातार हमलों ने सऊदी अरब के क्रूड एक्सपोर्ट नेटवर्क की पोल खोल दी है, जो रियाद के नीति निर्माताओं के लिए एक बड़ा सिरदर्द बन गया है.
इजरायल का सीक्रेट पाइपलाइन प्लान, क्या हूती हमलों से बच पाएगा रियाद का क्रूड?
Israel Eilat Ashkelon Pipeline Proposal: यमन के हूती हमलों से घिरे सऊदी अरब के लिए इजरायल ने दशकों पुरानी ईलाट-अश्केलोन पाइपलाइन का विकल्प सुझाया है, अब सवाल ये है कि क्या ये पाइप लाइन रियाद के तेल को हूती हमलों से बचा पाएगा?

एनडीटीवी की रिपोर्ट के मुताबिक, हाल ही में हूती विद्रोहियों ने जाजान और यानबू स्थित सऊदी अरामको की फैसिलिटीज पर ड्रोन और मिसाइल हमले किए, जिसके चलते जाजान रिफाइनरी को अस्थायी रूप से बंद करना पड़ा था.
लाल सागर में कमर्शियल शिपिंग के लिए हालात इतने मुश्किल हो गए हैं कि तेल टैंकरों को लंबा रास्ता अपनाना पड़ रहा है और यूरोप तक तेल पहुंचाने की लागत लगातार बढ़ती जा रही है. ऐसे में एक ऐसा विकल्प चर्चा में आ गया है, जो दशकों से इतिहास की परतों में छिपा हुआ था.
क्या है ईलाट-अश्केलोन पाइपलाइन का पुराना इतिहास
ये 254 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन इजरायल को पार करते हुए लाल सागर को भूमध्य सागर से जोड़ती है. इसे करीब छह दशक पहले ईरान के पैसे और इजरायल की इंजीनियरिंग से बेहद गुप्त तरीके से बनाया गया था, जिस वक्त ईरान में शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी का शासन था. इस्लामिक क्रांति से पहले बने इस प्रोजेक्ट का मकसद ईरान से आने वाले क्रूड ऑयल को ईलाट से इजरायल के रास्ते अश्केलोन तक पहुंचाना था, ताकि मिस्र के स्वेज नहर को बायपास करके यूरोप तक तेल भेजा जा सके.
सीआईए की डीक्लासिफाइड फाइलों के मुताबिक, अमेरिकी खुफिया एजेंसी इस प्रोजेक्ट को रणनीतिक रूप से बेहद अहम मानती थी. हालांकि, बाद में ईरान और इजरायल के रिश्ते कट्टर दुश्मनी में बदल गए और इजरायल ने इस पर पूरी तरह नियंत्रण कर लिया.
इजरायल का नया प्रस्ताव और सऊदी अरब के सामने चुनौती
मौजूदा क्षेत्रीय संकट के बीच इजरायल के ऊर्जा मंत्री एली कोहेन ने वाशिंगटन में सार्वजनिक रूप से एक बड़ा प्रस्ताव रखा है. इस प्रस्ताव के तहत सऊदी अरब के तेल को इजरायल के रास्ते यूरोप भेजने की बात कही जा रही है, जो कुछ साल पहले तक राजनीतिक रूप से असंभव लगता था.
ओपन-सोर्स इंटेलिजेंस एनालिस्ट जय लेत्नी के हवाले से एनडीटीवी ने बताया है कि इस मामले पर कैबिनेट स्तर पर गंभीरता से चर्चा चल रही है, हालांकि ये पूरी तरह से सऊदी अरब की राजनीतिक इच्छाशक्ति पर निर्भर करता है. इस रूट के जरिए सऊदी क्रूड को ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन के जरिए यानबू और फिर लाल सागर से ईलाट लाकर पाइपलाइन के रास्ते अश्केलोन तक पहुंचाया जा सकता है, जो रोजाना 4 लाख से 12 लाख बैरल तेल ले जाने में सक्षम है.
बुनियादी ढांचे की कमी और सुरक्षा से जुड़े बड़े खतरे
हालांकि ये विचार सुनने में बहुत दिलचस्प लगता है, लेकिन ज़मीनी हकीकत काफी चुनौतीपूर्ण है. हूती हमलों की वजह से ईलाट पोर्ट की गतिविधियों में भारी गिरावट आई है और सऊदी अरब के बड़े पैमाने पर तेल वॉल्यूम को संभालने के लिए वहां बड़े पैमाने पर ड्रेजिंग, टैंक फार्म और कड़ी सुरक्षा की जरूरत होगी, जिसमें अरबों डॉलर खर्च हो सकते हैं. इसके अलावा, इस रेगिस्तानी रास्ते पर सुरक्षा के गंभीर जोखिम भी हैं.
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जानकारों का मानना है कि इस पाइपलाइन को ईरान के विरोध, हूती हमलों और घरेलू राजनीति के बड़े मोर्चों का सामना करना पड़ेगा. अमेरिका इस तरह के विकल्पों का समर्थन कर सकता है ताकि हॉर्मुज और बाब अल-मदब पर निर्भरता कम हो सके, लेकिन सऊदी अरब और इजरायल के बीच कूटनीतिक संबंध न होना इस योजना की सबसे बड़ी रुकावट बना हुआ है.
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