नेपाल का रसुआ जिला पिछले तीन दिनों से सिर्फ तबाही की गवाही दे रहा है. भोटेकेशी की विकराल बाढ़ के बाद चारों तरफ विनाश के मंजर ही दिख रहे. मलबे में तब्दील हुए घर-गांव एक उजड़ी हुई दुनिया की दर्दनाक कहानी बयां करते बेहाल हैं. लेकिन, विनाश के चौतरफा मंजर के बीच जिजीविषा की ऐसी कहानी नेपाल से आई है, जिसे सुनेंगे तो दांतों तले उंगली दबा लेंगे. रेस्क्यू टीम के जो कुछ लोग रसुआ के टिमुरे में विध्वंस के बीच जीवन के बचे निशानों की तलाश कर रहे थे, शुक्रवार, 28 अगस्त की शाम उनके साथ कुछ ऐसा हुआ, जिसकी याद उनके जेहन से जीवन भर नहीं जाएगी.
नेपालः भारी मलबे के नीचे चल रही थी सांसें, 6 साल की बच्ची को 3 दिन बाद जिंदा निकाला
नेपाल के रसुवा में भयंकर बाढ़ के बाद मलबे में दबी 6 साल की बच्ची को तीन दिन बाद जिंदा बाहर निकाला गया. 72 घंटे तक जिंदगी और मौत से जूझने वाली बच्ची को सुरक्षाकर्मियों ने रोने की आवाज सुनकर खोज निकाला और हेलिकॉप्टर से काठमांडू पहुंचाया.

बाढ़ के बाद चारों तरफ तबाही का मंजर था और बर्बादी के बाद का सन्नाटा. लेकिन ठीक उसी समय भारी मलबे के नीचे से बहुत कमजोर लेकिन जिंदगी की गवाही देती एक मासूम आवाज आई और रेस्क्यू टीम के जवानों के पैर रुक गए. ये आवाज 6 साल की एक मासूम बच्ची की थी. ये बच्ची पिछले तीन दिनों से बाढ़ के मलबे के नीचे दबी जिंदगी और मौत के बीच झूल रही थी. तीन दिन कम नहीं होते. 72 घंटे का समय होता है. इतनी देर तक मलबे के नीचे बिना खाना-पानी और निर्बाध सांस के मजबूत से मजबूत इंसान की धड़कन ढीली पड़ जाए. लेकिन उस बच्ची ने जिंदगी के लिए अभूतपूर्व साहस और जीजीविषा से ऐसी जंग लड़ी कि देखने वाले हतप्रभ रह गए.
सर्च ऑपरेशन के दौरान मिली बच्चीये घटना रसुवा जिले के टिमुरे की है. यहां मिट्टी के नीचे दबी 6 साल की एक बच्ची को नेपाल की आर्म्ड पुलिस ने शुक्रवार, 28 अगस्त की शाम को सुरक्षित बाहर निकाला. ये तब हुआ, जब पुलिस की टीम भोटेकेशी की बाढ़ में मलबा बन चुके टिमुरे इलाके में सर्च ऑपरेशन चला रही थी. तभी मिट्टी के नीचे से एक बच्ची के रोने की आवाज सुनाई दी. जवानों के पैर ठिठक गए. यह उनका कोई भ्रम नहीं था बल्कि मिट्टी और लोहे-लक्कड़ के ढेर में दबी एक मासूम बच्ची की पुकार थी.
फिर क्या था. टीम तत्काल अलर्ट हो गई. फुर्ती से बिना एक पल गंवाए जवानों ने अपने हाथों से मलबा हटाना शुरू किया. भारी मलबे के नीचे दबी बच्ची के रोने की आवाज उनका कलेजा चीर रही थी. जैसे-तैसे जवानों ने सारा मलबा साफ किया और बड़ी नाजुकी के साथ बच्ची को गर्त से बाहर निकाला. थोड़ी देर बाद शांत और सहमी बच्ची उनकी गोद में थी. वह जिंदा तो थी लेकिन हालत काफी खराब थी.
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खराब मौसम ने अटकाई सांसेंइसके बाद सशस्त्र पुलिस बल के जवान बच्ची को टिमुरे के बॉर्डर आउटपोस्ट लेकर भागे. उसकी हालत लगातार कमजोर होती जा रही थी. उसे तुरंत इलाज चाहिए था. बेहतर इलाज नेपाल की राजधानी काठमांडू में ही मिल सकता था. उसी पल जवानों ने बच्ची को हेलिकॉप्टर से काठमांडू लाने की कोशिश की लेकिन हालात साथ नहीं दे रहे थे. रात का समय था. घने अंधेरे और खराब मौसम ने हेलिकॉप्टर को उड़ने नहीं दिया.
हेलिकॉप्टर शनिवार, 29 अगस्त की दोपहर बच्ची को लेकर काठमांडु पहुंचा, जहां अस्पताल में उसका इलाज चल रहा है.
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