जब ये सब ये हुआ, जसगीर का परिवार उनके आने की राह तक रहा था. फिर एक फोन आया. परिवार ने सुना कि जसगीर को गोली लगी है और उनके नाम के आगे शहीद लग गया है.
शहीद.फौज देश की रक्षा के लिए बनी है. देश की रक्षा, देश की सेवा है. देश की सेवा में मर जाने वालों को शहीद कहने का चलन है. तो जसगीर सिंह शहीद हो गए हैं. सरकारी रिकॉर्ड में, तमाशबीनों की स्मृतियों में. और परिवार?
जसगीर सिंह के पिता अमरजीत सिंह ने अनाथ हो चुके अपने दो पोतों को सीने से लगाकर इंडियन एक्सप्रेस से कहा -
कोई शौक नइ सी ओनु अपनी जान गंवान दा. मजबूरी सी.
(कोई शौक नहीं था उसे अपनी जान गंवाने का. मजबूरी थी.)

सिपाही जसगीर सिंह 2004 में जब सेना में भर्ती हुए, तो उनके परिवार को किसी कमाऊ शख्स की सख्त जरूरत थी. बाद में छोटा भाई दुबई चला गया. वहां ड्राइवर बन गया.
किसी शहीद फौजी के बाप का ये सबसे ईमानदार बयान है. एक ऐसे बाप का बयान, जिसे वो वर्दी तो दिखती थी जिसकी क्रीज़ कभी यहां से वहां नहीं होती थी लेकिन ज़्यादा ध्यान हमेशा उसका अपने बेटे पर रहता था. वर्दी अब भी है. लेकिन बेटा मर गया है. तो विलाप है. और इस विलाप में गर्व नहीं है. वैसा भावुक वादा भी नहीं है, जो कहे 'अगर मेरे और बेटे होते, तो मैं उन्हें भी देश पर कुर्बान कर देता'.
अमरजीत सिंह ने वो करने की हिम्मत की है, जिसे करने से जाने कितने बाप, कितने परिवार आज तक चूकते रहे. उन्होंने माना कि अमरजीत देश पर कुर्बान होने नहीं, अपने परिवार के लिए रोज़ी कमाने के लिए फौज में गए थे. कि अगर परिवार गरीब न होता और कोई दूसरा विकल्प होता, तो जसगीर शायद सेना में न जाते. इस एक लाइन को पकड़ लें, तो सैनिकों को भी इंसान की तरह देख सकेंगे. ऐसे, जैसे कि बाकी नौकरीपेशा लोग होते हैं. घर चलाने को, जरूरतें पूरी करने को नौकरी करते हैं. बैंक, रेलवे की तरह सेना भी उनके लिए एक करियर ऑप्शन होती है. मिल गई, तो कर लिया.

सिपाही जसगीर सिंह का परिवार. सबसे बाईं ओर बैठे बुजुर्ग की गोद में जो बच्चा है, वो जसगीर सिंह का दो बरस का बेटा है.
ज़िंदगी खतरे में होगी, ये जानकर भी फौज में ये लोग इसीलिए जाते हैं कि हर महीने घर पर अपनी तनख्वाह भेज सकें. सेना के ज़्यादातर एनसीओ (नॉन कमीशन्ड अफसर, जिन्हें हम जवान कहते हैं.) ऐसे ही गरीब परिवारों से आते हैं. पैसे की कमी ज्यादा पढ़ाई-लिखाई करने नहीं देती. कर भी ली किसी तरह तो वो इतनी नहीं होती कि 'कॉर्पोरेट इंडिया' में उन्हें 'जॉब' मिल जाए. एसएससी सीजीएल टाइप परीक्षाओं में गड़ाने के लिए उनके पास साल भी नहीं होते. लेकिन शरीर चुस्त-दुरुस्त होता है, तो उसके सहारे उन्हें नौकरी मिल जाती है. और नौकरी के साथ मिलती है वर्दी, उसका गुरूर.
ये ही चीजें बेसिक होती हैं उनके लिए. बाकी जो देशभक्ति और महानता वगैरह होती है, वो बोनस होती है.विडंबना है कि एक ऐसा पेशा जिसमें आपके मरने की काफी संभावना होती है, वही ऊपर उठने का इकलौता तरीका है कई लोगों के पास. अमरजीत का बयान इसी विडंबना की स्वीकारोक्ति है.
Mortal remains of Sepoy Jagsir Singh brought to his residence in Punjab's Firozpur; he was killed in ceasefire violation by Pakistan in Nowshera sector of Jammu & Kashmir pic.twitter.com/9JwJt8sq38
हम ऐसा हरगिज़ नहीं कह रहे. उस पार से आई गोली जसगीर को लगी, क्योंकि जसगीर खतरा जानकर भी अपना सीना तानकर खड़े थे वहां. ये सबूत है कि जसगीर ने बोनस में मिली देशभक्ति को कतई हलके में नहीं लिया था. हमारी बस एक गुज़ारिश है. जब भी जसगीर के नाम पर 'देशभक्त' और 'शहीद' जैसे विशेषण लादे जाएं, तब उस सच को बेमानी न होने दिया जाए जो जसगीर के पिता ने कहा.
वो जसगीर के पिता का बयान नहीं है. वो लाखों जसगीरों के पिताओं का बयान है.
ये भी पढ़ें:
CRPF कैंप पर हमला करने वाले 16 साल के आतंकी का वीडियो सामने आया है
इस लड़की की खुदकुशी की वजह बेहद बदसूरत है
रजनीकांत की पार्टी के इस सिंबल का मतलब क्या है
SBI और PNB बैंक में खाता है, तो ये खबर सबसे पहले पढ़ लीजिए
आपको पता चला, देश-दुनिया में ये 10 चीजें बदल गई हैं!
नेता रजनीकांत ने सोशल मीडिया पर पहली स्पीच में क्या बोला?
कहानी उस आदमी की जिसने हाथ कुचलकर पूछा था, 'बता हिंदू का ख़ून कौन सा और मुसलमान का कौन सा?'
हिमाचल चुनाव 2017 में में बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष की लुटिया क्यों डूबी?











