इजरायल में चुनाव के नतीजों के बाद वहां की सड़कों पर प्रदर्शन शुरू हो गए हैं. लोग नेतन्याहू के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं. साथ ही विपक्ष से कह रहे हैं कि वो अरब पार्टियों के साथ मिलकर सरकार बनाए. राजधानी तेल अवीव में प्रदर्शनकारियों ने सड़कें जाम कर दीं. कई लोग सड़क पर बैठ गए. पुलिस ने उन्हें हटाने की कोशिश की. कुछ प्रदर्शनकारियों ने नेतन्याहू के चुनावी पोस्टर भी पैरों से कुचले. उनके हाथों में एक पोस्टर था, जिस पर लिखा था- 'Arabs and Jews, Only Together Will we Win.' यानी अरब और यहूदी साथ होंगे, तभी जीतेंगे.
'अरब पार्टियों के साथ सरकार बनाओ और नेतन्याहू को... ', इजरायल की सड़कों पर होने लगी बड़ी मांग
इजरायल चुनाव के बाद तेल अवीव और हर्जलिया में प्रदर्शन हो रहे हैं. इनकी मांग है कि अरब पार्टियों के साथ मिलकर सरकार का गठन किया जाए. अरब पार्टियों की 19 सीटों के समर्थन से विपक्ष के पास बहुमत का गणित बन सकता है, लेकिन इसमें कुछ अड़चनें भी हैं.

नेतन्याहू के घर के बाहर भी प्रदर्शन हुआ. यहां लोगों ने गाजा में जारी युद्ध खत्म करने की मांग उठाई. लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा उस प्रदर्शन की हुई, जो विपक्षी नेता गादी आइजेनकोट के घर के बाहर हुआ. हर्जलिया में जुटे लोगों ने आइजेनकोट से अरब पार्टियों के साथ गठबंधन करने की अपील की. प्रदर्शनकारियों का कहना था कि अगर नेतन्याहू को सत्ता से बाहर रखना है, तो अरब पार्टियों को साथ लेना होगा.
क्यों हो रही अरब पार्टियों को लाने की मांग?यहां सवाल उठता है कि अरब पार्टियों की इन 19 सीटों में आखिर ऐसा क्या है, जिसने इजरायल की पूरी राजनीति का गणित बदल दिया है? इसे समझने के लिए पहले इजरायल चुनाव के नतीजे समझते हैं. इजरायल की संसद को नेसेट कहते हैं. इसमें कुल 120 सीटें हैं. सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सांसदों का समर्थन जरूरी है. 27 अक्टूबर को हुए चुनाव की काउंटिंग 29 अक्टूबर को पूरी हुई. चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, नेतन्याहू के गठबंधन को 53 सीटें मिलीं. विपक्षी गठबंधन को 48 सीटें मिलीं. वहीं अरब पार्टियों को कुल 19 सीटें मिलीं.
पार्टी के हिसाब से देखें तो नेतन्याहू की लिकुड सबसे बड़ी पार्टी बनी. उसे 27 सीटें मिलीं. विपक्षी नेता गादी आइजेनकोट की याशार पार्टी को 21 सीटें मिलीं. अरब पार्टियों 19 सीटें मिलीं. यानी नेतन्याहू के गठबंधन और विपक्ष, दोनों के पास बहुमत नहीं है. लेकिन विपक्ष अगर अरब पार्टियों की सभी 19 सीटों का समर्थन हासिल कर लेता है, तो उसके पास 67 सांसदों का समर्थन हो सकता है. इस तरह 61 का आंकड़ा पार हो जाएगा.
अरब पार्टियों के साथ गठबंधन क्यों नहीं चाहते नेतन्याहू?चुनाव प्रचार के दौरान ही नेतन्याहू ने अरब पार्टियों के साथ किसी भी तरह की साझेदारी का विरोध किया था. उन्होंने इन पार्टियों को इजरायल की सुरक्षा के लिए खतरा बताया. उन पर हमास के प्रति नरम रुख रखने के आरोप भी लगाए. चुनाव के बाद उनकी पार्टी ने आरोप लगाया कि अरब पार्टियों ने वोट खरीदने और विदेशी फंडिंग के जरिए चुनाव को प्रभावित किया है. लिकुड ने चुनाव में गड़बड़ी का दावा भी किया.
मामला इतना बढ़ा कि चुनाव आयोग के प्रमुख ने विदेशी दखल के शक की जांच शिन बेट यानी इजरायल की घरेलू खुफिया एजेंसी को सौंप दी. पुलिस भी कुछ कथित वोट खरीदने के मामलों की जांच कर रही है. हालांकि, चुनाव आयोग के अधिकारियों ने बड़े पैमाने पर चुनावी धांधली के आरोपों को बेबुनियाद बताया है. शिन बेट ने भी साफ किया है कि उसकी जांच सीमित दायरे में है. अभी किसी आरोप की पुष्टि नहीं हुई है. एजेंसी ने यह भी कहा है कि उसकी जांच को पूरे अरब समुदाय से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए.
यहां भी एक बड़ी अड़चन है. विपक्षी गठबंधन में अविग्दोर लिबरमैन की पार्टी यिस्राएल बेतेनु को 7 सीटें मिली हैं. लिबरमैन अरब पार्टियों के समर्थन पर निर्भर सरकार का हिस्सा बनने का विरोध कर चुके हैं. यानी आइजेनकोट के सामने मुश्किल है. अरब पार्टियों का समर्थन लेते हैं, तो लिबरमैन जैसे सहयोगियों के साथ मतभेद हो सकते हैं. समर्थन नहीं लेते, तो 61 सीटों का बहुमत हासिल करना मुश्किल होगा.
हालांकि, विपक्षी खेमे में बातचीत शुरू हो चुकी है. 29 अक्टूबर को आइजेनकोट ने नफ्ताली बेनेट और यायर गोलान से मुलाकात की. गोलान ने अरब पार्टी के नेता मंसूर अब्बास से भी बातचीत की. यानी विपक्ष सरकार बनाने के दूसरे रास्ते तलाश रहा है. एक रास्ता ये भी है कि आइजेनकोट अरब पार्टियों के समर्थन से अल्पमत सरकार बनाने की कोशिश करें. लेकिन इसके लिए विपक्षी दलों के बीच सहमति जरूरी होगी.
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क्या फिर होंगे चुनाव?अब चुनाव आयोग ने काउंटिंग पूरी कर ली है. 4 नवंबर को नतीजे राष्ट्रपति इसहाक हर्जोग को सौंपे जाने हैं. इसके बाद राष्ट्रपति अलग-अलग पार्टियों के नेताओं से बात करेंगे और सरकार बनाने के लिए किसी नेता को आमंत्रित कर सकते हैं. नई संसद की शपथ 10 नवंबर को होनी है. अगर कोई भी नेता बहुमत साबित नहीं कर पाता, तो इजरायल में फिर से चुनाव कराने की नौबत आ सकती है.
फिलहाल नेतन्याहू कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने रहेंगे. लेकिन उनकी सत्ता में वापसी का रास्ता आसान नहीं है. दूसरी तरफ अरब पार्टियों के पास पहली बार इतनी सीटें हैं कि उनके समर्थन के बिना सरकार बनाने का गणित पूरा करना मुश्किल हो सकता है. कुल मिलाकर इजरायल में अब सरकार बनाने का फैसला इस बात पर भी निर्भर करेगा कि यहूदी और अरब पार्टियां साथ आने को तैयार होती हैं या नहीं.
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