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भारी-भरकम चुनावी बक्सा देख खुद उठाने में जुट गईं IAS अनुपमा, वीडियो वायरल

वीडियो तो अब वायरल हुआ, इससे पहले मंत्री को इस्तीफा देने पर मजबूर करके चर्चा में आई थीं.

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फोटो - thelallantop
पूरे देश में चुनाव चल रहे हैं. इसके कई चरण हैं. केरल में 23 अप्रैल, 2019 को मतदान है. वहां भी अन्य राज्यों की तरह ही पूरी सरकारी मशीनरी इन चुनावों को सफलतापूर्वक संपन्न करवाने के लिए रात-दिन और जी-जान से लगी हुई है. मुझे एक रिपोतार्ज़ स्टोरी याद आ रही है, कि कैसे देश के प्रथम चुनाव संप्पन कराने के लिए, हर उपलब्ध संसाधन का महत्तम उपयोग किया गया था. घोड़े, गधे, बग्घी, मानव संसाधन, पैसा... इसमें से कुछ भी इतना आसान नहीं है. बहरहाल 2019 की इन्हीं सब तैयारियों का एक वीडियो सोशल मीडिया में खूब वायरल हो रहा है. इस वीडियो में एक लड़की बड़े-बड़े बक्सों को इधर से उधर ढो रही है. और हम सबसे पहले इसी की बात करेंगे.

# वीडियो का डीकंस्ट्रक्शन -

वैसे तो हम जिस समाज में रहते हैं उसमें एक लड़की को इस तरह से श्रम करते हुए दिखाना ही किसी वीडियो के वायरल होने के लिए पर्याप्त कंटेंट हैं. लेकिन जैसा कि हमने हल्का सा हिंट दिया था कि ये वीडियो चुनाव की तैयारियों को लेकर है. तो उसी हिंट को लेकर आगे बढ़ते हैं. दरअसल इस महिला का नाम टी वी अनुपमा है. और ये केरल के एक जिले त्रिशूर की जिलाधिकारी हैं. रही बात इनके द्वारा उठाये गए भारी-भारी बक्सों की, तो ये चुनावों से संबधित साजो-सामान हैं. ये इस सामान को एक जगह से दूसरी जगह शिफ्ट कर रही हैं. 'निश्चित तौर पर' ट्रक से और 'शायद' अपने ऑफिस तक. वैसे तो कोई काम छोटा बड़ा नहीं होता, लेकिन भारत में, जहां ये नॉर्म नहीं एक्सेप्शन है, वहां पर ऐसा होने पर जो होता है वही हुआ. यानी इस पूरे कार्यकलाप का वीडियो झामफाड़ वायरल हो गया... वायरल हो रहा है... वीडियो में उनके मातहत उन्हें ऐसा करने से मना करते हुए सुने जा सकते हैं. एक बंदा कहता है - सलाम है आपको मै'म. आप सही में एक रोल मॉडल हैं.

# और अब फ़्लैश-बैक -

तो चूंकि अब हमें इस वीडियो के बारे में भी पता चल गया है और उस लड़की के बारे में भी जो इस वीडियो में है तो फिर हम स्टोरी यही समाप्त कर सकते हैं. लेकिन हम करेंगे नहीं. क्यूंकि हमें वीडियो में जो चल रहा है वो तो समझ में आ गया लेकिन उस लड़की यानी टी वी अनुपमा के बारे में कुछ भी नहीं पता, सिर्फ उनके पद को छोड़कर. तो जब हमने सर्च किया तो उनके बारे में और भी बहुत कुछ और बहुत सारा जानने को मिला. ज़रा ये प्रमोशनल वीडियो देखिए. अगर आप हिंदी भाषी हैं तो सबटाइटल्स के आभाव में शायद आपको इस वीडियो की भाषा समझ में न आए, लेकिन कंटेट ज़रूर समझ आ जाएगा. इस वीडियो में वो एक स्पेशल एपीरिएंस हैं. वीडियो लोगों को वोट देने के लिए जागरूक करता है - लेकिन उनके ऊपर बताए हुए ये सब काम सोने पे सुहागा तो हैं, लेकिन असली खरे सोने के मानिंद उनकी एक दशक की सफलताओं की बात न करना खाने में सिर्फ चटनी भर परोस देना सरीखा है. बहुत टेस्टी, मगर फिर भी सिर्फ साइड-डिश.

# बैक टू दी फ्यूचर -

अब ज़रा पीछे की तरफ और आगे बढ़ते हैं. # साल 2010. मल्लापुरम, केरल की एक लड़की सिविल सेवा परीक्षा में 4th रैंक हासिल करके पूरे केरल को गौरवान्वित करती है. नाम- टी वी अनुपमा. उससे पहले बिट्स पिलानी गोवा से इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर चुकी अनुपमा हमेशा से ही आईएएस ऐस्प्रेंट रही थीं. और दिन में 16-16 घंटे तक इसके लिए तैयारी करती थीं. 'पूत के पांव पालने में ही दिख जाते हैं' वाले मुहावरे की तर्ज़ पर उन्होंने सेलेक्ट होने के तुरंत बाद अपनी मंशा ज़ाहिर कर दी थी. दी हिंदू से की गई बातचीत में उन्होंने अपनी एकेडेमिक तैयारियों के अलावा अपने फ्यूचर प्लान के बारे में बताया कि, असली परीक्षा तो अभी बाकी है. और वो समाज के भले के लिए नए और बेहतर तरीकें खोजेंगी. सवाल ये कि अब जब इस बात को 9 साल हो गए हैं, तो क्या ये उनका कहना एक स्टेटमेंट मात्र रह गया. या उन्होंने कुछ नया खोजा भी? बिलकुल. आगे हम 'ऑर्गेनिक फॉर्मिंग' के अलावा कई ऐसी बातें करेंगे, जिससे उनकी ईमानदारी, प्रॉब्लम सॉल्विंग एटीट्यूड और क्रिएटिविटी का पता चलता है. # साल 2018. 07 जून. गुरुवार. सुबह के दस बजे.  टी वी अनुपमा त्रिशूर के कलेक्टर का कार्यभार ग्रहण करती हैं. अब तक थॉमस चंडी भी अपना त्यागपत्र दे चुके हैं. थॉमस चंडी कौन? चलिए पहले उनकी ही खबर बताते हैं. यानी थोड़ा और पीछे चलते हैं. # साल 2017. अनुपमा ने अलाप्पुझा के 48 वें जिला कलेक्टर के रूप में कार्यभार संभाल लिया था. लेकिन दी न्यूज़ मिनट के अनुसार ये केरल के परिवहन मंत्री थॉमस चंडी के लिए परेशानी का सबब बन गया था.
अनुपमा ने रेवेन्यू प्रिंसिपल को एक रिपोर्ट जमा की. इस रिपोर्ट में थॉमस के खिलाफ गंभीर आरोप लगाए गए थे. कहा गया कि अलाप्पुझा की मार्तंडम झील के कुछ हिस्सों को थॉमस के लेक पैलेस रिज़ॉर्ट की बलि चढ़ा दिया गया. उस पैलेस के निर्माण के लिए इस झील के कुछ हिस्सों को समतल किया गया.
रिपोर्ट में ये तो मात्र एक आरोप था, और भी बहुत कुछ था जो थॉमस की रातों की नींद उड़ाने के लिए काफी था. ये इतनी बड़ी बात थी कि उन्हें उस समय खुद अपने बचाव में बयान ज़ारी करना पड़ा. होने को बयान भी एक रटा-रटाया रिमार्क था. जिसमें इस सब को विपक्ष की साजिश बताते हुए उन्हें चैलेंज किया गया था. # इससे दो साल पहले. साल 2015. इस साल वो केरल की फूड सेफ्टी कमीश्नर नियुक्त की गई थीं. साल 2015. शायद उनके प्रफेशन का सबसे एक्टिव, बिज़ी और हैपनिंग साल. साल 2015. इस साल उन्होंने जो गर्दा उड़ाया वो आने वाले कई सालों तक मिसाल बन गया, बना रहेगा. ढेरों रेड कहीं ज़्यादा एक्सपोज़. ये सब उनके रेज़्यूम में जुड़ता चला गया और उनको और महत्वपूर्ण, और महत्वपूर्ण बनाता चला गया. डेकन क्रॉनिकल से बात करते हुए इंटरव्यू में वो बताती हैं -
'कई चीजें दैनिक आधार पर तय होती हैं,लेकिन ऐसा तो है नहीं कि आपके पास पहले से ही कोई समाधान उपलब्ध हो. क्योंकि हमने ऐसा कुछ पहले कभी ट्राई ही नहीं किया था. हमें पता था कि पेस्टसाइड वगैरह भारी मात्रा में यूज़ होते हैं. लेकिन इसका समाधान क्या था? लोग रोज़  सब्ज़ियां खरीदते हैं. अब उन्हें तो आप बैन नहीं कर सकते न. इसलिए हमें कोई दूसरा हल ढूंढना था.'
यूं उनके इस पूरे कार्यक्रम से जो बाय-प्रॉडक्ट निकल कर आया वो और भी ज़्यादा बेहतरीन था. और वो था ऑर्गनिक फार्मिंग की ओर लोगों का ध्यानाकर्षण करना. और केवल जागरूक करने भर तक ही उनका कार्य सीमित नहीं था. किसानों और संबंधित विभागों को भी इसके लिए आवश्यक चीज़ों से लैस किया गया. फिर चाहे वो विशेष तरीके के बीज हों या इस तरह की खेती के लिए आवश्यक अन्य टूल्स, जो सामान्य तरीके के किसानों के लिए अनुपलब्ध थे. इसके पहले ज़्यादातर दूषित चीज़ें तमिलनाडु से आयात हुआ करती थीं. लेकिन केरल जब आत्मनिर्भर हुआ तो आयात कम हुआ और इसके फलस्वरूप फूड एडल्ट्रेशन में भी कमी आनी थी, सो आई. लेकिन इन सब में एक नहीं कई दिक्कतें भी आई. और वो दिक्कतें एग्ज़िक्यूशन लेवल की नहीं थीं जो 'सबका साथ सबका विकास' से हल हो सकतीं. ये थीं लॉबीइंग, थ्रेट्स और काम में जानबूझकर पैदा की गयी मानवीय दिक्कतें.साहट में ये पूरा मामला अब केरल राज्य का घरेलू मसला नहीं रह गया था. इसमें तमिलनाडु भी जाने-अनजाने शामिल हो गया था. उसके साथ व्यापार को लेकर शुरू हुई नोक झोंक अपनी जद में और मसलों को भी ले सकती थी. मगर ये चीज़ें आसान ही होतीं तो खबर या मिसाल थोड़ी न बनतीं. बहरहाल चलिए अब अंत में बात करते हैं उस साल की भी जब सबसे पहले वो सुर्ख़ियों में आई थीं. यानी... साल 2014. इस साल बड़ी इंट्रेस्टिंग चीज़ हुई. जिससे हमें यूनियन कैसे काम करती है इसका भी इनसाइट मिलता है. तत्कालीन सीटू (Centre of Indian Trade Unions) संयोजक मुरली के खिलाफ मेडिकल कॉलेज पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कर दी.  असल में अनुपमा को दिक्कत नोककुकोली से थी. नोककुकोली मतलब यूनियन लीडर और कुछ रजिस्टर्ड मज़दूर बाकी गैर-रजिस्टर्ड या प्राइवेट मज़दूरों को काम करते हुए देखें भर और इसके लिए उन्हें पैसे भी मिलें.
दरअसल अनुपमा जब शिफ्टिंग (इसका और आईएएस अधिकारीयों का चोली दामन का साथ है) कर रहीं थीं मुरली ने उनसे पैसों की मांग की. तब जबकि अनुपमा और उसकी फैमली ने सामान खुद शिफ्ट किया था. इसी बात से मुरली को दिक्कत थी, कि सामान तुमने खुद कैसे शिफ्ट कर दिया? और जबरिया अनुपमा का सामान शिफ्ट करने लगा और फिर पैसे मांगने लगा. अनुपमा के विरोध करने पर उनके घर के बाहर दीवार पर अपना नंबर लिख कर चला गया कि जब पैसे देने हों तो यहां संपर्क करें. अंत में अनुपमा की शिकायत पर मुरली को गिरफ्तार कर लिया गया और उसे 15 दिनों के लिए रिमांड पर ले लिया गया.
  तो दोस्तों इन सारी चीज़ों को पढ़ने के बाद आप भी मानते हैं न कि बेशक नया वायरल हुआ वीडियो बेशक टीवी अनुपमा के अच्छे कार्यों का 'आइसिंग ऑन दी केक' था लेकिन फिर भी केवल 'टिप ऑफ़ दी आइसबर्ग था'. साल 2019.  हमारा बेस्ट ऑफ़ लक रहेगा और हम दुआ करेंगे कि हम इस स्टोरी को बार-बार एडिट करते रहें. कि वो, टीवी अनुपमा बार-बार हमसे ऐसा करवाती रहें. अपने कार्यों के चलते. समाज के लिए. देश के लिए. विश्व के लिए.
वीडियो देखें - पांच साल में आंखें खुल गईं -

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