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अब एक दो लोग नहीं, सारा देश करेगा अंगदान

फ्रांस ने बनाया अपने हर एक सिटीज़न को डोनर

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फोटो - thelallantop
फूंकने और दफ़न होने के अलावा के अलावा भी ये जिस्म काम में लाया जा सकता है. पश्चिम ये बात बहुत पहले जान गया था. मौत के बाद शरीर के ज़रूरी अंगों को निकाल कर ज़रूरतमंदों के लिए स्टोर करने का चलन वहां काफ़ी दिनों से है. इधर कुछ सालों से भारत में भी इसकी अहमियत समझी जाने लगी है. ऑर्गन डोनेट करने की प्रथा धीरे-धीरे ज़ोर पकड़ रही है.
हालांकि धार्मिक कर्मकांडों में जकड़े हमारे समाज में इसे पूरी तरह स्वीकार्यता अब भी नहीं मिल पाई है. मृतक के परिवारजन खुद होकर अंगदान तो क्या करेंगे, कई बार तो मृतक कंसेंट देकर मरा होता है तब भी उसकी आख़िरी इच्छा को नकारते हुए उसका अंतिम संस्कार कर डालते हैं. अभी बहुत वक़्त लगेगा हमें ये समझने में कि शरीर को नष्ट करने की जगह उसे मानव-कल्याण के काम में ले आना मृतक के लिए सबसे अच्छी श्रद्धांजलि है.organ
विदेशों में अंग-दान की अहमियत जानने वाले लोगों की भरमार है. लोग समझते हैं कि मरने के बाद मिट्टी हो जाने वाले अंगों को किसी और ज़रूरतमंद को सौंप जाने से बेहतर और कुछ नहीं. स्वेच्छा से ‘ऑर्गन-डोनेशन’ करने वाले बहुतायत में हैं वहां.
वहां की सरकारें भी इसकी इम्पोर्टेंस समझती है और लोगों को अंगदान के लिए प्रोत्साहित करती रहती है. फ्रांस की सरकार ने एक कदम आगे जाते हुए ये सुनिश्चित कर दिया है कि उसका हर एक नागरिक बाई-डिफ़ॉल्ट ऑर्गन डोनर बने.
एक जनवरी 2017 से अब फ्रांस का हर एक नागरिक तब तक ऑर्गन-डोनर है, जब तक कि वो अपने आप को इस लिस्ट से हटा न दे. अबसे पहले लोग स्वेच्छा से अंगदान कर सकते थे. अबसे हर एक बाशिंदा डोनर है. अगर कोई नहीं चाहता कि उसके अंग दान किए जाएं तो वो अपने आप को डी-रजिस्टर कर सकता है.
इसके लिए नेशनल रिजेक्शन रजिस्टर बनाया जाएगा जहां लोग अपना इंकार दर्ज करा सकेंगे. अगर कोई इस रजिस्टर में नाम लिखवाने से चूक जाता है तो उसके पास लिखित रुप से अपने निर्देश छोड़ जाने का भी विकल्प होगा. इतना ही नहीं वो अपने रिश्तेदारों से ये इच्छा जाहिर कर के मर सकता है कि उसके अंगों को दान ना किया जाए. ऐसी सूरत में उसके रिश्तेदारों को ये बात मेडिकल टीम को बतानी होगी.who
गौरतलब है कि ऑस्ट्रिया, बेल्जियम और स्पेन जैसे कई यूरोपियन मुल्कों में भी इस ‘बाई-डिफ़ॉल्ट-सहमति’ का चलन है. वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाइजेशन (WHO) के मुताबिक़ स्वेच्छा से अंगदान करने वाले मुल्कों के मुकाबले “presumed consent’ वाले मुल्कों में अंगदान का प्रतिशत बेहतर है.
दान की महिमा गाने वाले हमारे समाज को इंसानियत के इन बदलते प्रतीकों की दख़ल ज़रूर लेनी चाहिए. किसी पंडित को दक्षिणा में मोटा चढ़ावा कर दूसरी दुनिया में आत्मा की शांति की कल्पना करने से बेहतर है कि किसी ज़रूरतमंद के काम इसी दुनिया में ही आया जाए.
यही सच्ची मानवता है. सच्चा मोक्ष यही होगा.
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