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कोरोना डायरीज़: दिल्ली से यूपी तक पैदल सफ़र करने वाले मजदूर की कहानी सुन्न कर देगी

हो सकता है कि आपकी देखी तस्वीरों में ये शख्स भी कहीं हो.

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बिहार लौट रहे मजदूर की सांकेतिक तस्वीर. साभार- PTI
सुरेन्द्र महतो
सुरेन्द्र महतो

नाम – सुरेन्द्र महतो
काम – मजदूर
पता – उत्तर प्रदेश

हम वहां दिल्ली में सीसा के कारखाना में काम करते हैं. अब नहीं करते गांव आने से पहले करते थे. हमारे बाप हमको ले गए थे दिल्ली. कि पढ़ाई करेंगे. लेकिन मन नहीं लगा पढ़ाई में. भाग के गांव आ गए. फिर जब बाप गांव आ गए तो हम भाग के दिल्ली चले गए. उनका साथ नहीं रहे. वहां दिल्ली में कई काम किए. इधर साल भर से सीसी बोतल बनाने वाला कारखाना में काम करते थे. सीसा के काम में सीना पे बहुत जोर पड़ता है.

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पानी का काम जब करते थे दिल्ली में तब परिवार बुला लिए थे गांव से. हमारा दो बच्चा है. दोनों छोटा है. कोरोना जब आया तो हुआ कि सब काम कारखाना बंद किया जा रहा है. हमारा भी कारखाना बंद होगा. लेकिन हम लोग कारखाने में ही रहते थे. हमारे साथ कई मजदूर लोग अपना-अपना छानी में रहते थे. कच्चा रूम दिया था कारखाने में ही एक ओर. तो नया सीसी बोतल नहीं बन रहा था. भट्टी बंद हो गया था. लेकिन सीसा छांटने वाला काम हम लोग सब कर रहा था. एक दिन पुलिस वाले आकर बोले कि कारखाना सील हो रहा है. बाहर चले जाओ सब लोग. काम किया था उसका पैसा बाक़ी था सबका. मालिक लोग आया ही नहीं.


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ट्रेन बस गाड़ी कुछ चल ही नहीं रहा था. पत्नी और हम दोनों लोग बीमार ही थे. वहां से कुछ समझ में नहीं आया तो हुआ कि गांव चला जाए. लेकिन आते कैसे. तो हम कुछ रास्ता दिल्ली से अनाज के एक ट्रक में आए. हमारे साथ और लोग भी थे. आधा ट्रक में अनाज था. पीछे आधे में हम लोग थे. कहीं कहीं जाकर ट्रक एकदम रुक जाता था. दिन-दिन भर रुका ही रहे. रात वाट में चले तो चले थोड़ा बहुत. हर जगह पुलिस वाले रोक रहे थे. तीन दिन तक हम लोग कुछ खाए पिए नहीं. डर था कि पुलिसवाले रोक लेंगे तो वापस दिल्ली भेज देंगे. वहां जाकर क्या करते? क्या खाते? बच्चा सब हाथ पांव छोड़ दिया. बीबी की तबियत और ख़राब हो रही थी. बाद में ट्रक वाला सबको एक जगह रात में उतार के चला गया. सात सौ रुपया लिया था हमसे. वहां से समझ ना आवे कि जाएं किधर.

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फिर पीछे से और मजदूर लोग आया. वो लोग सब जा रहा था बिहार. उनके पास ठेला गाड़ी था. दिल्ली में फल सब्जी बेचता था लोग. सब अपना सामान ओमान अपने-अपने ठेलागाड़ी पर रखे थे. हाथ पांव जोड़कर बीबी बच्चों के लिए एक ठेला पर जगह किया. बाक़ी में सामान रखा था उसका. तो हमहीं को खींचना था पूरा रास्ता ठेला. परिवार तो हमारा ही लदा था. ऐसे ही गिरते पड़ते अंत में गांव पहुंचे हम पूरे परिवार. जब यहां पहुंचे तो हम सब लोग बीमार थे. बस किसी तरह जिंदा पहुंच गए यही देवता का धन्यवाद मनाते हैं. डीह बाबा. काली माई सहाय थीं. नहीं तो कभी गांव पहुंच नहीं पाते.

# कोट-
अब गांव आ गए हैं तो मेहनत मजदूरी नहीं है कहीं. वापस नहीं जाना चाहते. लेकिन आज नहीं तो कल जाना पड़ेगा ही.

कोरोना डायरीज. अलग अलग लोगों की आपबीती. जगबीती. ताकि हम पढ़ें. संवेदनशील और समझदार हों. ये अकेले की लड़ाई नहीं है. इसलिए अनुभव साझा करना जरूरी है. आपका भी कोई खास एक्सपीरियंस है. तस्वीर या वीडियो है. तो हमें भेजें. corona.diaries.LT@gmail.com







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