The Lallantop

जमे हुए बालों वाला बच्चा, जिसकी एक तस्वीर ने सोशल मीडिया को रुला दिया

जमे हुए बच्चे की दिल पिघला देने वाली कहानी.

Advertisement
post-main-image
क्लास में बर्फ में जमे खड़े वांग और उनके आसपास हंसते उनके साथी

चीन के शिंजा प्रांत में रहने वाले आठ साल के वांग फ्यूमन बहुत खुश हैं. उनकी खुशी का कारण ये है कि कुछ दरियादिल लोगों उन्हें और उनके स्कूल के लिए अब तक 2.13 करोड़ रुपए दान कर चुके हैं. पर क्यों? और ये वांग हैं कौन, जिनकी वजह से लोग इतने सारे पैसे दे रहे हैं.

Advertisement

असल में 9 जनवरी से पहले तक वांग को कोई जानता भी नहीं था. उनका परिवार गरीब था. मज़दूर मां घर छोड़कर जा चुकी थी. पिता भी मज़दूरी के सिलसिले में अपने शहर से दूर रह रहे थे. वांग अपनी बड़ी बहन और दादी के साथ शिंजा में रहते हैं. वो तीसरी क्लास में पढ़ते हैं और उन्हें स्कूल जाने के लिए करीब तीन मील का मुश्किल सफर पैदल तय करना पड़ता है. हमारे देश की तरह चीन में भी ठंड का मौसम है और जहां वांग रहते हैं, वहां भयंकर ठंड पड़ती है.


wang
वांग

तो 9 जनवरी को वांग -9 डिग्री तापमान में अपने घर से स्कूल जाने के लिए निकले. उनका स्कूल पहुंचना ज़रूरी था, क्योंकि उस दिन टेस्ट था. बेहद कम कपड़े पहने वांग जब स्कूल पहुंचे, तो उनके बालों पर बर्फ जमी हुई थी. उनकी भौंहों और पलकों पर भी बर्फ जमी हुई थी. उनके गाल करीब-करीब जलने वाली स्थिति में थे. हाथ-पैर के पंजे इतने सूज गए थे कि कोई अलग से देखे, तो कह ही न पाए कि वो वांग के शरीर का ही हिस्सा हैं. वांग को इस हालत में देखकर पहली दफा तो उनके साथी हंसने लगे.

Advertisement

क्लास में बर्फ में जमे खड़े वांग और उनके आसपास हंसते उनके साथी
क्लास में बर्फ में जमे खड़े वांग और उनके आसपास हंसते उनके साथी

फिर वांग के टीचर ने उनकी उसी हालत में एक फोटो खींची और चीन के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Weibo पर अपलोड कर दी. वहां वांग को नया नाम मिला- Ice Boy और Frost Boy. कुछ ही देर में #IceBoy हैशटैग वायरल होने लगा और लोगों ने वांग की मदद करने की ठानी. सबसे पहले लोकल अथॉरिटीज़ ने वांग के स्कूल जुआंगशेनबेओ प्राइमरी स्कूल को करीब दस लाख रुपए की मदद दी और स्कूल के सभी 81 बच्चों को ठंड के कपड़े दिए. रिपोर्ट्स के मुताबिक एक कंपनी ने वांग के पिता को उनके ही शहर में नौकरी भी ऑफर की.


वांग के ठंड की वजह से सूजे हुए हाथ
वांग के ठंड की वजह से सूजे हुए हाथ

जब वांग से पूछा गया कि इतनी सर्दी में वो सिर्फ एक पतली जैकेट पहनकर स्कूल क्यों आए, तो उन्होंने बताया कि उनके पास कुल तीन जैकेट हैं, जिनमें से दो गंदी थी और अब तक धोई नहीं जा सकी थीं, क्योंकि इतनी ठंड में पानी में हाथ डालकर काम नहीं किया जा सकता.

पहली निगाह में तो ये मुश्किल परिस्थितियों से जीतने, पढ़ाई के लिए डेडिकेटेड होने और लोगों की दरियादिली का मामला लगता है, लेकिन वांग ने चीन की आबादी को लेकर नई बहस पैदा की है. चीन की करीब 43% आबादी ग्रामीण इलाकों में रहती है. यहां का डेवलपमेंट दुनियाभर में दिखाया जाता है, लेकिन ग्रामीण इलाकों और शहर से दूर रह रहे लोग इस विकास से अछूते हैं. वांग की तरह लाखों ऐसे बच्चे हैं, जो ऐसे इलाकों में रहने की वजह से स्कूल नहीं जा पाते. ऐसे घरों के लोग पैसे कमाने दूसरे शहर जाते हैं और अपने सपने भूल जाते हैं.


वांग को मदद मिलने के बाद उनके साथ वॉलंटियर्स
वांग को मदद मिलने के बाद उनके साथ वॉलंटियर्स

चीन के ग्रामीण इलाकों में रहने वाले बच्चों का ड्रॉपआउट रेट भी ज्यादा है, जो आगे चलकर चीन की स्किल्ड वर्कफोर्स को प्रभावित करेगा. वाशिंगटन यूनिवर्सिटी में प्रो. कम विंग चान न्यूयॉर्क टाइम्स में लिखते हैं कि चीनी सरकार ऐसे परिवारों को शहर में एक साथ बसाकर उनकी मदद कर सकती है, लेकिन तब उन्हें एजुकेशन और हेल्थ केयर जैसी सुविधाओं से समझौता करना पड़ता है, क्योंकि चीन के कुछ शहरों में ग्रामीण लोगों को दूसरे दर्जे का नागरिक मानकर उन्हें कम सेवाएं दी जाती हैं.

Advertisement

चीन के ऐसे ही विकास की वजह से ढेर सारे परिवार आधुनिक रोडों, स्कूलों और अस्पतालों से दूर हो गई हैं. जहां शहरी परिवार लगातार अमीर हो रही हैं, वहीं वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक करीब 5.5 करोड़ चीनी रोजाना लगभग 350 रुपए की कमाई पर जी रहे हैं. Weibo पर ही एक यूज़र लिखता है, 'We can’t solve poverty, but we can praise poverty.'


12 जनवरी की वांग की तस्वीर
12 जनवरी की वांग की तस्वीर

वांग की वजह से एक बार ढेर सारे बच्चों की आवाज़ सुनी गई है. चीनी सरकार को सोचना होगा कि क्या वो वांग के बिना भी उन बच्चों की आवाज़ सुन सकती है?




ये भी पढ़ें:
नोहुआ: चीन की शादियों की वो घटिया रस्म जिस पर सिर्फ घिन आ सकती है

हमारे सैनिकों को इस तरह फंसा उनसे इनफॉर्मेशन निकाल रहा है चीन

ये भी देखें:
चीन की तरह ये फैसला लेने का कलेजा है, तभी दिल्ली को स्मॉग से बचा पाएंगे
 

Advertisement