आम लोगों की परवाह करता ही कौन है? परवाह होती है अपनी कुर्सी की. अपनी नींद की. अपने ऐशोआराम की. यही वजह है कि महीनों पहले ‘तानाशाही मुर्दाबाद’ का नारा लगाने वाले अचानक से गायब होने लगे हैं. आरोप पुलिस पर है. ये कहानी चीन की है.
चीन में कोविड के ख़िलाफ़ प्रोटेस्ट करने वाले गायब क्यों हो रहे हैं?
साल 2022 के आखिर में कोरोना नियमों के ख़िलाफ़ हुए थे प्रोटेस्ट
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नवंबर 2022 की बात है. शंघाई की एक सड़क पर एक महिला सरकार से नाराज़गी जताने के लिए प्रोटेस्ट कर रही थी. उसके दोनों हाथों में ज़ंजीर बंधी हुई थी, मुंह पर डक्ट टेप लगा हुआ था. उसने अपने दोनों हाथ ऊपर उठा रखे थे. हाथों में कोरे कागज़ की एक शीट थी. अपनी वेदना को स्वर देने की उसकी ये कोशिश अनोखी थी. अनोखी इसलिए क्योंकि कागज़ पर एक भी शब्द नहीं लिखा था. फिर ये कैसा संदेश था? दरअसल, वो महिला चीन की सरकार की कोविड पॉलिसी से नाराज़ थी. चीन में उन दिनों जीरो कोविड पॉलिसी लगी हुई थी. जिसके तहत सख्त लॉकडाउन का पालन करना अनिवार्य था. साल 2019 में हॉन्ग कॉन्ग में प्रोटेस्ट के दौरान चीनी सरकार ने पोस्टर पर लिखे नारों को बैन कर दिया था. इसलिएये महिला उसकी याद में कोरे कागज़ की शीट लेकर आई थी. महिला के साथ और भी लोगों ने प्रोटेस्ट में कोरा कागज़ पकड़ा हुआ था. ऐसा लग रहा था मानों ये लोग सरकार को चुनौती देते हुए कह रहे हों,
“क्या अब हमें कुछ न कहने पर ही गिरफ़्तार किया जाएगा?”
इसलिए इन विरोध प्रदर्शनों को वाइट पेपर प्रोटेस्ट भी कहा गया. प्रोटेस्ट 2 नवंबर से शुरू हुए. और फिर धीरे-धीरे इसकी आग चीन के दूसरे शहरों में भी फैलती गई. दिसंबर 2022 में जाकर ये प्रदर्शन समाप्त हुए. उस समय कुछ लोगों की गिरफ्तारी भी हुई. पर सरकार ने प्रोटेस्ट के बाद ज़ीरो कोविड पॉलिसी खत्म कर दी.

अब आप कह रहे होंगे कि ये घटना तो पिछले साल हुई थी. आज इसकी चर्चा की ज़रूरत क्यों पड़ी? दरअसल अब चीनी सरकार इन प्रोटेस्ट में हिस्सा लेने वाले लोगों को चुन-चुन कर टारगेट कर रही है. उनकी गिरफ्तारियां की जा रही हैं. एक मानवाधिकार संगठन का कहना है कि अब तक कम से कम 100 लोग गिरफ्तार हो चुके हैं. कुछ ऐसे लोग भी हैं जिनकी गिरफ्तारी पिछले साल नवंबर-दिसंबर महीने में हुई थी. औए वे लोग अभी भी जेलों में बंद हैं. कई अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने इन लोगों की रिहाई की मांग की है.
किस चार्ज में इन लोगों की गिरफ्तारी की गई है?
चीनी सरकार ने इनपर झगड़ा भड़काने का आरोप लगाया है. जब सरकार से इन लोगों की गिराफ्तारी पर जानकारी मांगी तो कोई जवाब नहीं मिला. लेकिन BBC ने गिरफ्तार किए गए लोगों के वकीलों और दोस्तों से बात की है. और 12 लोगों के नाम की पुष्टि की है.
गिरफ्तार किए गए लोगों में लेखक, पत्रकार, म्यूज़ीशियन, टीचर और बिज़निसमैन शामिल हैं. इनमें से कुछ लोग तो अमेरिका और ब्रिटेन में पढ़ाई करते हैं. कुछ वकीलों की कोशिशों से अब तक 5 लोगों को ज़मानत पर रिहा करवा लिया गया है. चीनी सरकार ने प्रोटेस्ट एरिया के आस-पास के कैमरों की फूटेज निकाली और फेशियल रिकोगनेशन सोफ्टवेयर का इस्तेमाल कर इन लोगों की पहचान की. इसके साथ सोशल मीडिया के ज़रिए भी लोगों की पहचान कर गिरफ्तारियां हुई हैं.
इस पूरे प्रकरण में एक बात और गौर करने वाली है कि गिरफ्तार हुए लोगों में जो महिलाएं शामिल हैं जेल में उनसे अलग तरह की पूछ-ताछ की जा रही है. उनसे पूछा जा रहा है कि क्या वो किसी नारीवादी संगठन से जुड़ी हुई हैं. चीन नारीवादी आन्दोलनों से परेशान रहा है. 2015 में उसने फेमिनिस्ट फाइव नाम के एक ग्रुप पर नकेल कस दी थी. उनके मेम्बर्स की ऑनलाइन ट्रोलिंग की गई. नारीवादी आंदोलन से चीन की सरकार कितनी नफ़रत करती है उसका उदहारण हाल ही में देखने को मिला. कुछ दिन पहले चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की एक शाखा ने अति नारीवाद की तुलना एक घातक ट्यूमर से की थी. सरकार से सवाल पूछने पर जेल में ठूंस देने का ट्रेंड अब दुनिया के कई देशों में प्रचलित हो गया है. चाहे वो धर्म, जाति, लिंग की असमानता पर किया गया सवाल हो या सरकार की ख़राब नीतियों पर किया गया तंज. तानाशाहों को कुछ पचता नहीं है.
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