अमेरिका और इजरायल ने जब ईरान पर हमला किया, तब शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि ईरान जवाब में UAE, सऊदी अरब, कुवैत और कतर जैसे पड़ोसी गल्फ कंट्रीज यानी खाड़ी के देशों में ऐसी तबाही मचाएगा. उम्मीद यही की जा रही थी कि वो इन देशों में स्थित अमेरिकी मिलिट्री बेस को निशाना बना सकता है. लेकिन जिस तरह से ईरानी मिसाइलों ने इन देशों के अंदर रिहायशी इलाकों से लेकर अन्य इन्फ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाया है, उससे हर कोई हैरान है.
ईरान ने UAE, सऊदी और कतर, सब पर दागीं अंधाधुंध मिसाइलें, अब ये देश मिलकर मारेंगे?
क्या UAE, Saudi, Qatar जैसे खाड़ी देश Iran Strikes का जवाब देने के लिए War में कूद सकते हैं, क्या Israel-Iran War एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध में बदलने वाला है? जानिए ऐसे सभी सवालों के जवाब.


जर्मन मीडिया DW के मुताबिक ईरान ने पड़ोसी खाड़ी देशों के लग्ज़री होटल, पोर्ट, शहर के अंदर के इलाके, इंडस्ट्रियल एरिया, एयरपोर्ट और तेल के इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाया है. ऐसे में सवाल है कि क्या अब खाड़ी देश भी ईरान के हमले का जवाब देने के लिए जंग में कूद सकते हैं. इधर, लेबनान स्थित मिलिशिया संगठन हेजबुल्लाह जो कि ईरान समर्थित माना जाता है, ने भी इजरायल पर हमले शुरू कर दिए. जवाब में इजरायल ने भी हेजबुल्लाह के ठिकानों पर स्ट्राइक्स की हैं. तो सवाल ये भी उठता है कि क्या इजरायल-ईरान की जंग एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध में बदलने वाली है. एक-एक करके जवाब तलाशने की कोशिश करते हैं.
इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज़ में मिडिल ईस्ट पॉलिसी के एक्सपर्ट हसन अलहसन DW को बताते हैं,
इस इलाके में US बेस पर ईरानी हमलों का अंदाजा लगाया जा सकता था, लेकिन ईरान ने खाड़ी के शहरों, एयरपोर्ट और एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाकर एक नई हद पार कर ली है. खाड़ी के देश ईरान के बहुत करीब हैं और इजरायल जितने मजबूत नहीं हैं. जिससे ईरान के हमले करने के चांस बढ़ जाते हैं.
फिलहाल ईरान के हमले के खिलाफ खाड़ी के सभी देश एकजुट नजर आ रहे हैं. सब ने मिलकर ईरानी हमलों की निंदा की है और कहा है कि वो इसका जवाब देने का पूरा अधिकार रखते हैं. गौर करने वाली बात ये भी है कि इन हमलों ने UAE और सऊदी अरब को भी फिलहाल एक मंच पर ला दिया है, जिनके रिश्ते हाल के महीनों में बेहद खराब चल रहे थे. दोनों के बीच यमन में प्रॉक्सी वॉर भी चल रहा था. लेकिन ईरानी हमलों के खिलाफ सऊदी खुलकर UAE के साथ खड़ा नजर आया.

DW की रिपोर्ट में बताया गया है कि अब तक खाड़ी के देशों की रणनीति यही थी कि वो अपने यहां अमेरिकी बेस और उसके सैनिकों को रखने की इजाजत देते रहे हैं. साथ ही अमेरिका से हथियार भी खरीदते रहे हैं. वो इसे अपनी सुरक्षा के लिए सबसे प्रभावी तरीका मानते थे. इसके अलावा हाल के सालों में इन देशों ने ईरान के साथ भी राजनयिक रिश्ते बेहतर करने की कोशिश की थी. इसके लिए उन्होंने ईरान के साथ अपने ऐतिहासिक और धार्मिक मतभेदों को किनारे किया. इससे इन देशों को उम्मीद थी कि संघर्ष या जंग के हालात में कम से कम ईरान उन्हें निशाना नहीं बनाएगा.
यहां तक कि सऊदी अरब, UAE और जॉर्डन जैसे देशों ने संघर्षों से खुद को दूर रखने के लिए ये तक कहा कि वो अमेरिका को ईरान पर हमले करने के लिए अपने इलाके का इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं देंगे. लेकिन खाड़ी देशों के ये सभी प्रयास नाकाफी साबित हुए. जैसे ही अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हमला किया, ईरान ने इजरायल के साथ-साथ खाड़ी देशों पर भी मिसाइलें दागना शुरू कर दिया. ऐसे में खाड़ी देश न चाहते हुए भी उस लड़ाई में फंस गए हैं, जिसका हिस्सा वो नहीं बनना चाहते थे.
अब क्या हैं विकल्प?DW के मुताबिक खाड़ी के सभी देशों के पास अपनी मिलिट्री फोर्स है, जिसमें सऊदी अरब की मिलिट्री सबसे ताकतवर और अच्छी फंडिंग वाली मानी जाती है. लेकिन जानकारों का मानना है कि ये देश अपनी मिलिट्री के साथ लड़ाई में उतरेंगे, इसकी संभावना कम ही है. इसके बजाय, जानकार बताते हैं कि ये देश अमेरिका को अपने यहां और ज्यादा एक्सेस दे सकते हैं. इसके अलावा ईरान के खिलाफ लिमिटेड स्ट्राइक का भी विकल्प इन देशों के पास है. हालांकि हसन अलहसन का कहना है कि इस स्टेज पर ईरान के खिलाफ खाड़ी देशों की सीधी जवाबी कार्रवाई की उम्मीद कम ही है.

वहीं इस सवाल पर कि "क्या खाड़ी की मिलिट्री सीधे लड़ाई में उतर सकती है? किंग्स कॉलेज लंदन में स्कूल ऑफ़ सिक्योरिटी स्टडीज़ के सीनियर लेक्चरर एंड्रियास क्रेग कहते हैं,
यह मुमकिन है, लेकिन ये हमले की बजाय सेल्फ-डिफेंस यानी खुद की सुरक्षा के तौर पर ज्यादा हो सकता है. खाड़ी के देश बढ़ते युद्ध में एक्टिव रूप से शामिल होने के बजाय इसे फैलने से रोकने की कोशिश करेंगे. एक बार जब मिसाइलें इलाके के आसपास गिरने लगीं, तो उनके सामने एक दो ऑप्शन थे: या कड़ा जवाब दें और युद्ध बढ़ने का रिस्क लें, या छोटा-मोटा जवाब दें लेकिन अपनी ही जनता के सामने कमजोर दिखें.
एंड्रियास क्रेग का मानना है,
खाड़ी के देश अब सबसे पहले अपनी सुरक्षा मजबूत करने पर फोकस करेंगे. एयर और मिसाइल डिफेंस की संख्या बढ़ाएंगे. बेस और जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ-साथ इंटरनल सिक्योरिटी को भी मजबूत करने पर काम करेंगे. फिर वो डिप्लोमैटिक कोशिशें तेज़ करेंगे. ओमान और क़तर, जो US-ईरान बातचीत पर काम कर रहे हैं, डिप्लोमैटिक लाइनें खुली रखेंगे और इन सबसे बाहर निकलने का मौका ढूंढेंगे. दूसरे देश चुपचाप इनका साथ देंगे.
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उनका और दूसरे एनालिस्ट का मानना है कि खाड़ी के देश अमेरिका से अपने करीबी रिश्तों का इस्तेमाल करते हुए जंग को जल्द समाप्त करने का अनुरोध करेंगे. जानकारों का ये भी मानना है कि अब खाड़ी देशों का नजरिया भी बदलेगा. अब तक वो अमेरिकी गठबंधन और ईरान के साथ बेहतर होते रिश्तों को अपनी सुरक्षा के लिए पर्याप्त मान रहे थे. पर शायद भविष्य में ये देश अपनी सुरक्षा पर ज्यादा फोकस करेंगे. इसके अलावा वो केवल अमेरिकी मदद पर निर्भर रहने के बजाय नए पार्टनर्स भी तलाश सकते हैं, जिससे उनके लिए डिप्लोमैटिक ऑप्शन बढ़ जाएं.
वीडियो: Saudi, Turkiye और Qatar ईरान के खिलाफ क्या करने जा रहे?











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