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पटना एम्स में रजिस्ट्रेशन की लंबी लाइन में मर गई बच्ची, काश मुन्ना भाई आ जाता!

आदिवासी और गरीब होने की सजा मिली है बिहार के इस शख्स को.

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एम्स में 10 साल की लड़की की मौत हो गई क्योंकि पिता पहले रजिस्ट्रेशन करवाने के लिए भटकता रहा.
मुन्ना भाई एमबीबीएस का एक सीन याद आ रहा है. ज़हर खाए हुए बेटे को एक मां अस्पताल लेकर पहुंचती है. फौरन इलाज की बजाय मां को पहले रजिस्ट्रेशन करवाने को कहा जाता है. मां लाइन में खड़ी है, इधर बेटा तड़प रहा है. इतने में मुन्ना यानी संजय दत्त की नज़र उस लड़के पर पड़ती है. वो एक डॉक्टर से मदद करने को कहता है तो डॉक्टर इसे सुसाइड केस बताकर प्रोसीजर की बात करने लगता है. मुन्ना उसकी गर्दन पकड़कर दीवार पर दे मारता है. डॉक्टर साहब रजिस्ट्रेशन और तीन झाम भूलकर लड़के के इलाज में जुट जाते हैं. आपने ज़रूर इस सीन को देखकर ताली पीटी होगी पर ऐसा सिर्फ पिच्चरों में होता है. असल में क्या होता है वो हम बताते हैं.
मुन्ना भाई एमबीबीएस फिल्म का एक सीन.
मुन्ना भाई एमबीबीएस फिल्म का एक सीन.

बिहार के जमुई जिले से रामबालक अपनी बीमार बेटी को पटना एम्स लाते हैं. वहां उनसे रजिस्ट्रेशन करवाने को कहा जाता है. इतने बड़े अस्पताल में पहुंचने के बाद रामबालक को समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर रजिस्ट्रेशन कहां और कैसे करवाना है. वो एक काउंटर से दूसरे काउंटर तक भटकते रहे. कई लोगों से उन्होंने पूछा मगर किसी ने मदद नहीं की. कोई मुन्ना नहीं आया. कुछ समझ नहीं आया तो वो एक लाइन में लग गए. जब रामबालक का नंबर आया तो उसे बताया गया कि ओपीडी का समय खत्म हो गया है. वह अगले दिन आएं. इधर, मां संजू के हाथ में ही 10 साल की रोशन दम तोड़ देती है. अस्पताल के अंदर ही.
रामबालक किसी अच्छे घर के होते. बढ़िया पैंट-बुशर्ट पहने होते. सोर्स-सिफारिश होती तो यकीनन उनकी बिटिया का इलाज हो जाता. मगर रामबालक तो ठहरे आदिवासी. अनपढ़. पेशे से मजदूर. हाल ही में झारखंड से एक खबर आई थी कि एक बच्ची की मौत कथित तौर पर भूख से हो गई थी. उनके परिवार का राशन कार्ड आधार से लिंक नहीं था सो राशन नहीं मिला. मां का कहना है बिटिया चावल खाने को मांगती रही मगर घर में एक अन्न का दाना नहीं था. रोशन की तरह इस बिटिया ने भी दम तोड़ दिया.
मौत के बाद रामबालक बेटी को कंधे पर लेकर जाने को मजबूर हुए.
मौत के बाद रामबालक बेटी को कंधे पर लेकर जाने को मजबूर हुए.

नहीं मिली एंबुलेंस, कंधे पर लादकर बेटी को ले गए वापस  
हकीकत कितनी भयावह होती है. रील और रियल लाइफ में बहुत अंतर है. रामबालक की मुसीबत यहीं नहीं खत्म हुई. उन्हें बेटी के शव को घर ले जाने के लिए एंबुलेंस भी नहीं मिली. खुद के पास इतने पैसे थे नहीं कि प्राइवेट एंबुलेंस ले सकें. बेचारे दो किलोमीटर तक मृत बेटी को कंधे पर लादकर रेलवे स्टेशन तक गए. वहां से वापस अपने गांव. निराश. खाली हाथ. एम्स के डायरेक्टर प्रभात कुमार सिंह से जब बात करने की कोशिश की गई तो उन्होंने इस मुद्दे पर कुछ भी बोलने से इनकार कर दिया.
पटना एम्स की चमचमाती बिल्डिंग.
पटना एम्स की चमचमाती बिल्डिंग.

इस बात को तो मैं भी दावे से कह सकता हूं कि अपने देश के अस्पतालों में इमरजेंसी केसेज में इलाज करने का सिस्टम बड़ा झिलाऊ है. अब जो थोड़ा पढ़े-लिखे लोग हैं वो तो बातचीत करके काम निकाल लेते हैं. मगर गांव-देहात का आदमी सिर्फ भटकता रह जाता है. जबकि ये बेहद गलत है. जिम्मेदारों को, सरकारों को एक ऐसा सिस्टम बनाने पर ध्यान देना चाहिए जहां ऐसे लोगों की मदद की जा सके. क्योंकि अगर ये लोग निराश लौटते हैं तो बड़े-बड़े अस्पताल, सारे तीन झाम किसी काम के नहीं.


लल्लनटॉप का ये वीडियो देखिए- 

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