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नेहा बोरा की याचिका दिल्ली हाई कोर्ट ने खारिज की, SEM नोटिस से जुड़ा है मामला

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शनों से जुड़ी नेहा बोरा की याचिका दिल्ली हाई कोर्ट ने खारिज कर दी है. उन्होंने स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट के उस नोटिस को चुनौती दी थी, जिसमें 10 हजार का बॉन्ड भरने और शांति बनाए रखने को कहा गया था.

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नेहा बोरा की याचिका हाई कोर्ट ने खारिज कर दी. (फोटो- India today)

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  • दिल्ली हाई कोर्ट ने नेहा बोरा की याचिका खारिज कर दी, जिसमें उन्होंने स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट द्वारा जारी 10 हजार रुपये के पर्सनल बॉन्ड नोटिस को चुनौती दी थी।
  • नेहा बोरा को 16 अक्टूबर को विरोध प्रदर्शन के दौरान हिरासत में लिया गया था और 18 अक्टूबर को उन्हें शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड भरने का नोटिस दिया गया था, जिसे उन्होंने हाई कोर्ट में चुनौती दी।
  • कोर्ट ने विशेष मजिस्ट्रेट को जांच से पहले सावधानी बरतने और नेहा बोरा को पूरे मामले की सामग्री उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं, जिससे अगली कानूनी प्रक्रिया निर्धारित होगी।

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार विरोधी प्रदर्शनों का प्रमुख चेहरा रहीं नेहा बोरा को दिल्ली हाई कोर्ट से बड़ा झटका लगा है. कोर्ट ने उनकी एक याचिका खारिज कर दी है. Fसमें उन्होंने स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट की ओर से जारी नोटिस को चुनौती दी थी. 

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इस नोटिस में उन्हें 10 हजार रुपये का बॉन्ड भरने और शांति बनाए रखने के लिए कहा गया था. याचिका का विरोध करते हुए दिल्ली पुलिस ने कहा था कि नेहा बोरा की रिट मेंटेनेबल नहीं है.

शुक्रवार, 23 अक्टूबर को मामले पर फैसला सुनाते हुए जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद ने कहा कि इस मामले में पर्याप्त सुरक्षा उपाय मौजूद हैं. उन्होंने स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट यानी SEM को भी निर्देश दिए हैं कि जांच से जुड़ा कोई आदेश जारी करने से पहले वह सावधानी बरतें. साथ ही नेहा बोरा को केस से जुड़ी सारी सामग्री उपलब्ध कराएं.

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क्या है मामला?

नेहा बोरा को 16 अक्टूबर को विरोध प्रदर्शन के दौरान दिल्ली के मंडी हाउस इलाके से हिरासत में लिया गया था. अगले दिन यानी 17 अक्टूबर की सुबह उन्हें रिहा भी कर दिया गया. 18 अक्टूबर को एसईएम ने उन्हें एक नोटिस जारी किया, जिसमें उन्हें 10 हजार का पर्सनल बॉन्ड भरने, एक जमानतदार देने और शांति बनाए रखने के लिए कहा गया था. BNSS की धारा 126 और धारा 130 के तहत मजिस्ट्रेट ने नेहा को नोटिस जारी किया था, जिसे बीएनएसएस की धारा 135(3) के साथ पढ़ा गया. 

इसमें ये आरोप भी लगाया गया कि मंडी हाउस में नारेबाजी हुई थी. धारा 163 लागू होने के बावजूद जंतर-मंतर के आसपास बार-बार प्रदर्शन किए जा रहे थे. नेहा बोरा ने 16 अक्टूबर को कनॉट प्लेस में प्रदर्शन में शामिल होने के लिए लोगों को उकसाया था.

क्या है धारा 126 और 130?

BNSS की धारा 126 के तहत, अगर मजिस्ट्रेट को जानकारी मिलती है कि किसी व्यक्ति से शांति भंग होने की आशंका है तो वह उस व्यक्ति से शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड भरने को कह सकता है. वहीं धारा 130 के मुताबिक, जब मजिस्ट्रेट किसी व्यक्ति से ऐसा बॉन्ड भरने के बारे में जवाब मांगना जरूरी समझता है, तो उसे लिखित आदेश जारी करना होता है. इस आदेश में मामले से जुड़ी जरूरी जानकारी दर्ज होनी चाहिए.

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ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा ने इस नोटिस के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका डाली थी. उन्होंने इससे जुड़ी कार्रवाई को रद्द करने की मांग की थी. साथ ही अधिकारियों को उनके खिलाफ कोई कठोर या दंडात्मक कार्रवाई करने से रोकने का निर्देश देने की भी अपील की थी. 

नेहा बोरा ने कोर्ट में क्या दलील दी थी?

22 अक्टूबर को सुनवाई के दौरान नेहा बोरा की ओर से पेश वकील गोपाल शंकरनारायणन ने दलील दी कि मजिस्ट्रेट की ओर से जारी नोटिस बिना सोच-विचार के जारी किया गया था. उन्होंने कहा कि अंतरिम बॉन्ड भरने के लिए कहने से पहले भी शुरुआती जांच जरूरी है. इसके बाद ही बॉन्ड को लेकर जवाब मांगा जाना चाहिए.

बोरा की याचिका में कहा गया कि मजिस्ट्रेट के नोटिस में ऐसी कोई सामग्री नहीं बताई गई, जिससे लगे कि बोरा की गतिविधियों से शांति भंग होने की आशंका थी. नेहा के वकील ने हाईकोर्ट से कहा कि लोकतंत्र में सत्ता परिवर्तन की मांग करने में कुछ भी गलत नहीं है.

दिल्ली पुलिस की ओर से पेश वकील चेतन शर्मा ने इस बात को काटते हुए कहा कि सत्ता परिवर्तन सिर्फ वोट के जरिए हो सकता है. ‘नई दिल्ली के उपद्रवी तत्वों’ के जरिए सत्ता नहीं बदली जा सकती.

गुरुवार, 22 अक्टूबर को ढाई घंटे की सुनवाई के बाद कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था.

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