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फिल्म रिव्यू- उड़ता तीर

कैसी है आयुष्मान खुराना और सारा अली खान की नई फिल्म 'उड़ता तीर'?

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'उड़ता तीर', मुकुल देव के करियर की आखिरी फिल्म है.

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  • फिल्म 'उड़ता तीर' की कहानी पाकिस्तानी जासूस बिलाल अहमद के इर्द-गिर्द घूमती है, जो भारत की काउंटर टेररिज्म यूनिट में विक्रांत के नाम से काम कर रहा है और याददाश्त खो देने के बाद अपनी असली पहचान भूल जाता है।
  • फिल्म का कॉमिक थ्रिलर स्वरूप और देशभक्ति के बीच मिश्रण है, जिसमें अयोध्या के राम मंदिर और राष्ट्रीय नारे शामिल हैं, जिससे कहानी में असंगति उत्पन्न होती है और फिल्म अंततः उलझन भरी हो जाती है।
  • फिल्म में हास्य और गानों का प्रयोग कुछ स्थानों पर प्रभावशाली रहा है, पर सेकंड हाफ की उलझनों के कारण इसकी समग्र पहचान प्रभावित होती है, जिससे निर्देशक के लिए भविष्य में सुधार की संभावनाएँ बनती हैं।

फिल्म- उड़ता तीर
राइटर-डायरेक्टर- आकाश कौशिक
एक्टर्स- आयुष्मान खुराना, सारा अली खान, मुकुल देव, राहुल बोल, गुलशन ग्रोवर, संदीप आनंद, सुहैल नय्यर, राम कपूर 
रेटिंग- 3 स्टार 

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'उड़ता तीर' स्पाय फिल्म्स पर एक कॉमिक टेक या स्पूफ है. जो खुद को बताती तो 'धुरंधर' का एंटीडोट है, मगर ऑलमोस्ट वही बन जाती है. मगर इस दौरान ये अपने टाइटल को पूरी तरह जस्टिफाई करती है. जिसका मतलब एक ऐसे तीर से है, जिसे खुद नहीं पता कि वो कहां जाएगा.

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'उड़ता तीर' की कहानी बिलाल अहमद नाम के पाकिस्तानी स्पाय की है. जो इंडिया की काउंटर टेररिज्म यूनिट में विक्रांत बनकर काम कर रहा है. एक एक्सीडेंट में उसकी याददाश्त चली जाती है. जिसके बाद वो अपने कवर को ही अपनी असली पहचान मानने लगता है. यानी वो वाकई खुद को इंडियन ऑफिसर समझने लगता है. सुनने में ये क्या डेलिशियस आइडिया लगता है! मगर वो पेपर से स्क्रीन पर आते आते बहुत उलझ जाता है. ये फिल्म जिस चीज़ का माखौल बनाने निकलती है, खुद वही बन जाती है. एक स्पाय थ्रिलर. जो कि इसके क्रेजी प्रेमाइस को अंडरमाइन कर देता है. बावजूद उसके ये एक एंटरटेनिंग फिल्म बनी रहती है.

फिल्म का फर्स्ट हाफ बेहद मज़ेदार है. जिसमें फनी डायलॉग्स और वन लाइनर्स हैं, जो अच्छे से लैंड होते हैं. क्लीन कॉमेडी. मगर सेकंड हाफ आते आते मामला हो जाता है सीरियस. फिल्म खुद समझ नहीं पाती कि अब उसे ये सब समेटना कैसे है. उसमें अयोध्या का राम मंदिर वाला एंगल आ जाता है. 'जय श्री राम' से लेकर 'जय हिंद' के नारे लगने लगते हैं. बीच में एक देशभक्ति और रोमैंटिक गाना डाल दिया जाता है. जो कि फिल्म का फ्लो बिगाड़ता है.

हालांकि फिल्म के बाकी हिस्सों में म्यूजिक का इस्तेमाल दिलचस्प तरीके से हुआ है. मसलन, कुछ मौकों पर विक्रांत जब स्क्रीन पर होता है, तो 'नायक नहीं खलनायक हूं मैं' की धुन बैकग्राउंड में चलती है. जब वो पाकिस्तानी टेररिस्ट अज़हर मकसूद को पकड़ने जाता है, तो 'कभी खुशी कभी ग़म' का टाइटल ट्रैक सुनाई पड़ता है. हॉस्पिटल में लगी हार्ट रेट मॉनिटरिंग मशीन से 'कुछ कुछ होता है' की धुन निकलने लगती है. ये सब फिल्म के फन में इजाफा करते हैं. बिलाल के साथ दो और स्पाय इंडिया में काम कर रहे हैं. उन दोनों का ट्रैक भी इंस्ट्रेस्टिंग है. मगर सेकंड हाफ आते आते सब घालमेल हो जाता है. अचानक विक्रांत को एक मक़सद मिल जाता है. ऐसा लगता है कि नायक की तरह इस फिल्म की भी यादाश्त चली गई है कि वो आई कहां से थी. और करने क्या वाली थी!

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इस फिल्म को देखते हुए ऐसा लगता है कि जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ती जाती है, वो सिचुएशन के साथ खुद को इंप्रोवाइज करने लगती है. ट्रायल एंड एरर वाले खेल में चली जाती है. वो आपको सबकुछ ऑफर कर देना चाहती है. अपना ईमान भी. सबकुछ करने के बाद ये अपने आखिरी सीन में वहां पहुंचती है, जहां से ये शुरू हुई थी. जो कि एक सुंदर कॉल बैक लगता है. जब विक्रांत की पत्नी यामिनी एक स्पाय जोक करती है.

'उड़ता तीर' हर दर्शक वर्ग को केटर करना चाहती है. जो लोग स्पाय कॉमेडी देखना चाहते हैं, उनके लिए भी यहां कुछ है. जो एक देशभक्ति फिल्म देखना चाहते हैं, उनके लिए भी यहां ठीक-ठाक मटीरियल है. जो लोग पाकिस्तान बैशिंग देखना चाहते हैं, उनके लिए भी यहां भरपूर इतज़ाम है. मीम जीवियों के हालात-जज़्बात बदले जाते हैं. क्रिकेट प्रेमियों को टीवी टूटने वाला रेफरेंस मिल जाता है. बीच में एक कश्मीर सेंट्रिक जोक भी आता है. यानी आपको एक भरा-पूरा पैकेज देने की तैयारी होती है. ताकि कोई भी एंगल काम कर जाए और फिल्म चल जाए.      

आयुष्मान खुराना टिपिकल मेनस्ट्रीम सिनेमा का मोह छोड़, दोबारा से वो करने उतरे हैं, जिसके लिए उन्हें जाना जाता है. एक्सरपेरिमेंट. वो इस फिल्मी कैरेक्टर को आम इंसान बनाने की हरसंभव कोशिश करते हैं. खासकर तब जब विक्रांत उर्फ बिलाल को आइडेंटिटी क्राइसिस हो जाती है. मुकुल देव ने पाकिस्तानी टेररिस्ट अज़हर मक़सूद का रोल किया है. उन्होंने पाकिस्तानी पंजाबी एक्सेंट जबरदस्त तरीके से पकड़ा है. फिल्म में उनका हर सीन फनी है. ये मुकुल देव की आखिरी फिल्म है. 'मे आई कम इन मैडम' वाले संदीप आनंद ने बिलाल के साथी स्पाय तारिक़ का रोल किया है. सुहैल नय्यर ने पाकिस्तानी स्पाय अशफ़ाक उर्फ ध्रुव का रोल किया है. संदीप और सुहैल उन सीन्स में सबसे ज़्यादा फनी लगते हैं, जब वो विक्रांत को याद दिलाने की कोशिश करते हैं कि वो इंडियन नहीं पाकिस्तानी जासूस है. गुलशन ग्रोवर और राम कपूर ने पाकिस्तानी आर्मी के आला ऑफिसर्स के रोल किए हैं. जो कि कैरिकेचरिश हैं. क्योंकि फिल्म का मूल स्वभाव ही स्पूफ वाला है. मगर बाद में उन्हें एक विलेनिश आर्क दिया जाता है.

'उड़ता तीर' दोनों मामलों में एक फनी फिल्म है. एक वो जो है और दूसरा वो जो करना चाहती है. आइडिया के लेवल पर यूनिक मगर एग्जीक्यूशन में अटपटी. इस फिल्म को उन्हीं आकाश कौशिक ने डायरेक्ट किया है, जो इससे पहले 'हाउसफुल 4' और 'भूल भुलैया 3' जैसी फिल्में लिख चुके हैं. ये बतौर डायरेक्टर उनकी पहली फिल्म है. हम उम्मीद करेंगे कि वो इन फीडबैक्स को कंस्ट्रकटिवली लेंगे और मजबूत वापसी करेंगे.

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