समुद्र के पानी में नमक की तरह, नसों में दौड़ते हुए ख़ून की तरह, पहुंचेगा दिलों की धड़कनों के बहुत ही निकट
वीडियो: कश्मीरी पंडितों के विस्थापन का दर्द सुना रहे हैं अनुपम खेर
19 जनवरी को कश्मीरी पंडित 'विस्थापना दिवस' मनाते हैं, आज 27 बरस पूरे हुए हैं.

बोरी से झड़ते हुए आटे की तरह देगा हमारा पता हम जहां भी हों, किसी दुःस्वप्न में या दुःस्वप्न से भी भयंकर किसी वास्तविकता के कगार पर, दूब की जडों सा, अंधेरे से होता हुआ गुत्थमगुत्था, मांगेगा अपने लिए एक पूरी ज़मीन.
पड़ा रहेगा हीरे की चमकती अंगूठी सा, हमारे दुख की छोटी उंगली में, शरणार्थी शिविरों में हमेशा के लिए उदास हो गया बच्चों का मौन, कोटर से निकाल ली गई बूढ़े कवि की आंखों का मौन, जो हमेशा सच की तरह खुलती थी, स्त्रियों के होंठों पर जमी शोक की काली नदी का मौन, उन सब लोगों का मौन जिन्हें चुप करा दिया गया है.
बेचैन पक्षी सा उड़ेगा आग के इस पेड़ से उस पेड़ पर, आधी रात को हवा के झोंकों की तरह, आकर नींद के गुप्त दरवाज़ों की सांकलें खटखटाता हुआ, विचारों में गुप चुप करेगा प्रवेश, अपने लहूलुहान पैरों की छाप छोड़ जाएगा, हर आंख से आंसुओं को बटोरता हुआ, बुनेगा एक लम्बी और मज़बूत रस्सी, सुलगते हुए बारूद सा पड़ा रहेगा उन पुलों के नीचे, जहां से गुज़रेंगें झूठ के हज़ारों हज़ार पांव. और तब हमारे मौन के धमाके से बड़ा कोई और धमाका नही होगा.
कश्मीरियों तुम्हारी रोल मॉडल ज़ायरा नहीं तो क्या बंदूकची बुरहान है?
कश्मीर से दिल खुश करने वाली खबर आई है










