डियर अरिजित सिंह, एक जोक चलता है तुमपे, पता हो या न हो, हम बताते हैं. अरिजित सिंह आलू-टमाटर हो गए हैं. थोड़ा-थोड़ा हर फिल्म में डाल दिए जाते हैं. हर दूसरी फिल्म में गाकर आलू-टमाटर बनना ठीक है. ये दिखाता है कि आप चल रहे हैं. लोकप्रिय हैं. लोकप्रिय होना बुरा नहीं है. लेकिन लोकप्रिय होने के साथ कुछ जिम्मेदारियां भी आती हैं. आप फेसबुक पर पोस्ट लिखते हैं. सलमान के लिए. ठीक उस दिन जिस दिन 'सुल्तान' का ट्रेलर आता है. ये कहते हुए कि मेरा गाना फिल्म में ले लो. गिड़गिड़ाते हुए.
सलमान सर मैंने आपकी बेइज्जती नहीं की, 'सुल्तान' से मेरा गाना मत हटाइए' आपने कहा मैं लगातार आपको मैसेज कर रहा था, ये बताने की कोशिश कर रहा था कि आपने मेरी बातों को गलत समझा है. ठीक इसके बाद आप , सलमान से माफी मांगते हैं, तुर्रा ये कि सबके सामने माफी मांग रहे हैं. आप माफी मांग ही क्यों रहे हैं? माफी मांगने से कोई छोटा नहीं हो जाता लेकिन आप तो इसलिए माफी मांग रहे हैं कि आपको गलत समझा गया, सलमान को गलतफहमी हुई, और माफी अरिजित ने मांगी. अरिजित ने लिखा कि 'मैंने बहुत गाने गाए हैं सर. लेकिन मैं अपनी लाइब्रेरी में आपके लिए कम से कम एक गाने के साथ रिटायर होना चाहता हूं. प्लीज मुझसे ये फीलिंग मत छीनिए.' सलमान की फिल्म में गाना हर सिंगर के लिए बड़ी बात होती है, गाना गली-गली बजता है. आपकी आवाज और नाम फैलता है. लेकिन कम से कम एक गाने के साथ रिटायर होने वाली बात बहुत हल्की है. एक सिंगर के तौर पर और भी हल्की. यहां बुरे अरिजित नहीं हैं, खलनायक अरिजित या सलमान को नहीं बताया जा रहा है, बात उस पूरे सिस्टम की है, जहां कोई स्टार हर चीज से ऊपर हो जाता है.

अरिजित ने ये पोस्ट उस दिन लिखी जिस रोज़ सुल्तान का ट्रेलर आया, फिर हटा भी ली. हम मानकर चलते हैं ये फिल्म के प्रमोशन के लिए कोई गिमिक नहीं है. लेकिन अगर ये फिल्म के प्रमोशन का हथकंडा है, तो ये एक गायक को एक एक्टर के सामने बहुत छोटा कर दिखा रहा है. अरिजित सिंह आपकी खुद की फैन फॉलोइंग है, लोग आपको पसंद करते हैं. सच या झूठ ये उनके आत्मसम्मान पर भी चोट नहीं लगती है? अरिजित खुद को सलमान के जोड़ने इतने डेस्परेट क्यों दिखा रहे हैं? सलमान कोई माइलस्टोन नहीं हैं, जो उनके करियर में न जुड़ा तो कुछ अधूरा रह जाएगा. ये कैसा स्टार सिस्टम है? जहां एक एक्टर तय करता है कौन उसके लिए गाना गाए न गाए. वो एक्टर जो खुद पर्दे पर किसी दूसरे का लिखा तीसरे के डायरेक्शन में बोलता है. 1998 में जब सुषमा स्वराज ने इसे इंडस्ट्री घोषित कर दिया. उस वक़्त माना गया था अब ये बॉलीवुड परिवार या आपसी संबंधों से चलने वाली कोई संस्था नहीं रह गई. जहां किसी की व्यक्तिगत पसंद-नापसंद चीजों को तय करे.
इंडस्ट्री माने कई सोर्स जहां मिलकर साथ में काम करें और साथ में पैसे बनाएं. किसी भी इंडस्ट्री में प्रोफेशनलिज्म नाम की एक चीज होती है. सोचिए सेल्स वाले कभी ये कह दें कि टेक सपोर्ट वालों के साथ काम न करेंगे क्योंकि हमारे बीच कुछ गलतफहमियां हैं. या हम उन्हें पसंद नहीं करते. ऐसा तो नहीं होता. फिर अगर 18 साल बाद भी वही हो रहा है तो कुछ न कुछ बहुत गलत हो रहा है. फिर इंडस्ट्री में इतने एसोसिएशन ही क्यों बनाए गए थे? क्या सब 'नायक' ही तय करेंगे?
आपका,
जो गाने सुनता है, कभी फैन नहीं हुआ