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स्मार्ट सिटी या स्विमिंग पूल? पहली ही बारिश में पानी-पानी क्यों हो जाते हैं भारत के शहर?

Urban Flooding Crisis: भारतीय शहरों में अर्बन फ्लडिंग यानी शहरी बाढ़ का संकट गहराता जा रहा है. आखिर क्यों मुंबई, दिल्ली और बेंगलुरु जैसे शहर पहली ही बारिश में डूब जाते हैं. क्या चीन का 'स्पंज सिटी' कॉन्सेप्ट इस समस्या को जड़ से खत्म कर सकता है?

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अर्बन फ्लडिंग के आगे क्यों फेल हो जाता है पूरा सिस्टम? (फोटो- PTI)

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  • भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने दक्षिण-पश्चिम मॉनसून के तेजी से बढ़ने और गुजरात, मध्य प्रदेश के नए इलाकों में इसके फैलने के बाद कई राज्यों में भारी बारिश और धूलभरी आंधी का अलर्ट जारी किया है।
  • शहरों में पुराना ड्रेनेज सिस्टम और तेजी से बढ़ते कंक्रीट निर्माण के कारण बारिश का पानी जमीन में नहीं समा पाता, जिससे मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु जैसे महानगर शहरी बाढ़ की समस्या से जूझ रहे हैं।
  • स्पंज सिटी कॉन्सेप्ट के तहत पानी को सोखने और संचय करने के लिए संभावित उपायों की प्रस्तुति हो रही है, लेकिन भारत में मास्टर प्लान में सुधार व अवैध कब्जे हटाने के बिना समस्या का समाधान सीमित रहेगा।

भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने अलर्ट जारी कर दिया है. दक्षिण-पश्चिम मॉनसून तेजी से आगे बढ़ रहा है. इसने गुजरात और मध्य प्रदेश के कई नए हिस्सों को घेर लिया है. महाराष्ट्र के कोंकण, गोवा और तटीय कर्नाटक में भारी से बहुत भारी बारिश की चेतावनी है. यूपी, बिहार और दिल्ली-एनसीआर में धूलभरी आंधी के साथ हल्की बारिश की संभावना जताई गई है. अगर ये सब पढ़कर आप सोच रहे हैं कि ये खबर है तो जरा रुकिये. असली कहानी तो इस चेतावनी के बाद शुरू होती है. 

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आज के तारीख में महानगरों की कड़वी हकीकत ये है कि जैसे ही आसमान में बादल घिरते हैं, वैसे ही देश के बड़े और तथाकथित 'स्मार्ट' शहरों के माथे पर चिंता की लकीरें खिंच जाती हैं. पहली ही तेज बारिश में चमचमाती सड़कें समंदर बन जाती हैं और अंडरपास कंक्रीट के स्विमिंग पूल में तब्दील हो जाते हैं. ये अर्बन फ्लडिंग (शहरी बाढ़) का वो चक्रव्यूह है, जिससे बाहर निकलने का रास्ता हमारे नीति-निर्माताओं को नहीं मिल रहा है.

50 साल पुराना सिस्टम और 500 गुना कंक्रीट

दिक्कत ये नहीं है कि बारिश ज्यादा हो रही है. दिक्कत ये है कि शहरों का ड्रेनेज सिस्टम यानी पानी निकासी का ढांचा बेहद पुराना हो चुका है. मुंबई, दिल्ली और बेंगलुरु जैसे महानगरों का नालियों और नालों का नेटवर्क करीब 50 से 70 साल पुराना है. वो उस जमाने की आबादी और बसावट के हिसाब से डिजाइन किया गया था. 

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सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले कुछ दशकों में भारतीय शहरों में कंक्रीट का निर्माण 500 गुना से भी ज्यादा बढ़ गया है. जब हर तरफ कंक्रीट की सड़कें, फुटपाथ और गगनचुंबी इमारतें खड़ी हो जाएंगी, तो जमीन पानी सोखेगी कैसे? मिट्टी को हमने सीमेंट की चादर से ढक दिया है. यही वजह है कि जो पानी जमीन के अंदर जाना चाहिए था, वो सड़कों पर बहने लगता है और कुछ ही घंटों में पूरा शहर ठप हो जाता है. 

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चीन के स्पंज सिटी का मॉडल (फोटो-AI)

बेंगलुरु और मुंबई की ग्राउंड रियलिटी

बेंगलुरु को देखिए, इसे भारत की सिलिकॉन वैली कहा जाता है. इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (IISc) के एक स्टडी से पता चलता है कि बेंगलुरु ने पिछले चार दशकों में अपने 70 फीसदी से ज्यादा जल निकायों (झीलों और तालाबों) को खो दिया है. जहां कभी झीलें हुआ करती थीं, वहां आज टेक पार्क और सोसायटियां खड़ी हैं. जब कुदरती रास्ते बंद होंगे, तो पानी नालों से उफनकर आपके लिविंग रूम में ही घुसेगा.

मुंबई का हाल भी अलग नहीं है. हर साल मीठी नदी की सफाई के दावे होते हैं, लेकिन बीएमसी के तमाम बजट के बाद भी पहली बारिश में लोकल ट्रेनें थम जाती हैं. नालों में गाद (सिल्ट) जमा रहती है और प्लास्टिक कचरा पानी के निकास को पूरी तरह ब्लॉक कर देता है. नीति आयोग की रिपोर्ट चेतावनी देती है कि अगर जल प्रबंधन में सुधार नहीं हुआ, तो शहरों की आर्थिक रफ्तार को भारी नुकसान पहुंचेगा.

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क्या है 'स्पंज सिटी' का ग्लोबल कॉन्सेप्ट?

अब सवाल उठता है कि दुनिया के बाकी देश इस मुसीबत से कैसे निपट रहे हैं? यहां काम आता है 'स्पंज सिटी' (Sponge City) का कॉन्सेप्ट. स्पंज तो आपने देखा ही होगा, जो पानी को अपने अंदर सोख लेता है. चीन ने साल 2015 में इस पायलट प्रोजेक्ट की शुरुआत की थी. इसके तहत शहरों को इस तरह डिजाइन किया जाता है कि वो बारिश के पानी को बर्बाद या बाढ़ में बदलने के बजाय उसे सोख लें, फिल्टर करें और जरूरत पड़ने पर दोबारा इस्तेमाल में लाएं.

वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के मुताबिक स्पंज सिटी के इस कॉन्सेप्ट मेंं कंक्रीट की जगह खास तरह की 'पारगम्य' (permeable) ईंटों और डामर का इस्तेमाल होता है, जिससे पानी छनकर सीधे जमीन के नीचे चला जाता है. यूरोप के कई शहर जैसे बर्लिन और कोपेनहेगन अपने यहां 'ग्रीन रूफ' (छतों पर बागवानी) और 'अर्बन वेटलैंड्स' (शहरी दलदली जमीन) को बढ़ावा दे रहे हैं. ये ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर पानी के बहाव को धीमा करता है और बाढ़ के खतरे को 40 फीसदी तक कम कर देता है.

कंक्रीट के तालाबों को बदलने की चुनौती

भारत में भी अब चेन्नई और मुंबई जैसे शहरों में 'स्पंज पार्क' बनाने की बातें शुरू हुई हैं, लेकिन ये रफ्तार बहुत धीमी है. जब तक हम मास्टर प्लान में बदलाव नहीं करेंगे, तब तक हालात नहीं सुधरेंगे. हमें नदियों के नेचुरल फ्लड प्लेन (बाढ़ क्षेत्र) पर अवैध कब्जों को हटाना होगा. कंक्रीट के अंधाधुंध इस्तेमाल पर रोक लगानी होगी और हर नई बिल्डिंग के लिए वॉटर हार्वेस्टिंग को अनिवार्य करना होगा. अगर ऐसा नहीं किया गया, तो हर साल मॉनसून राहत के बजाय आफत बनकर आता रहेगा और हमारे आधुनिक स्मार्ट सिटीज कंक्रीट के तालाब बनते रहेंगे.

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