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'शरीर पर हक सिर्फ पीड़िता का' HC ने रेप विक्टिम को दी 26 हफ्ते की प्रेग्नेंसी टर्मिनेट कराने की मंजूरी

Rape victim 26 week pregnancy termination: दिल्ली हाई कोर्ट ने एक नाबालिग (15 साल) रेप विक्टिम को अबॉर्शन की इजाजत दी है. पीड़िता गर्भपात के लिए 24 हफ्ते की कानूनी सीमा पार कर चुकी थी. कोर्ट ने पीड़िता की मानसिक स्थित के आधार पर अनुमति दी

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कोर्ट ने माना कि ऐसे मामलों में पीड़िता के मन में गहरा मानसिक आघात पहुंच सकता है. (फोटो-Pexels)

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  • दिल्ली हाई कोर्ट ने 15 साल की रेप पीड़िता की 26-28 हफ्ते की प्रेग्नेंसी को टर्मिनेट करने की अनुमति दी, जो मेडिकल बोर्ड के रिपोर्ट और माननीय जज के आदेश पर आधारित है।
  • पीड़िता की याचिका MTP एक्ट के 24 हफ्तों के कानूनी सीमा पार होने के कारण कोर्ट में दायर की गई, जिसमें अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का आधार दिया गया।
  • कोर्ट ने AIIMS को प्रक्रिया का खर्च उठाने निर्देश दिए, डीएनए टेस्टिंग के लिए भ्रूण का टिश्यू सुरक्षित रखने और बच्चे को उचित मेडिकल सहायता एवं गोद के लिए कदम उठाने को कहा।

दिल्ली हाई कोर्ट ने 15 साल की रेप सर्वाइवर को उसकी प्रेग्नेंसी टर्मिनेट करने की मंजूरी दी है. कोर्ट ने प्रेग्नेंसी के 24 हफ्ते की कानूनी सीमा पार होने के बाद पीड़िता को इजाजत दी है. विक्टिम 26-28 हफ्ते की गर्भवती है. इस मामले की सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने खास तौर पर गर्भवती पीड़िता के शरीर के बारे में फैसला लेने के अधिकार पर टिप्पणी भी की.

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मामले की सुनवाई जस्टिस मिनी पुष्करणा कर रही थीं. कोर्ट ने इस दौरान नाबालिग के मौलिक अधिकारों पर भी बात की. जस्टिस पुष्करणा ने कहा कि गर्भवती पीड़िता की बॉडी ऑटोनॉमी (अपने शरीर से जुड़े निर्णय लेना बिना किसी दबाव के) और खुद से फैसला लेने का अधिकार उसके मौलिक अधिकारों का अहम हिस्सा है.

वकील ने अनुच्छेद 21 का दिया तर्क

Live Law की रिपोर्ट के मुताबिक, पीड़िता और उसके पिता ने हाई कोर्ट में प्रेग्नेंसी खत्म करने की याचिका दायर की थी. क्योंकि उसकी मौजूदा प्रेग्नेंसी की अवधि MTP एक्ट, 1971 के तहत तय सीमा से ज्यादा थी.  

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याचिकाकर्ता के वकील अन्वेश मधुकर और प्रांजल एस ने कोर्ट में तर्क दिया कि पीड़िता के साथ रेप हुआ है. अभी उसकी प्रेग्नेंसी लगभग 26-28 हफ्ते की है.  पीड़िता ने कहा कि प्रेग्नेंसी खत्म करने की मांग भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले 'जीवन के अधिकार' का इस्तेमाल करते हुए किया जा रहा है. याचिका में यह भी दलील दी गई थी कि अगर ऐसा नहीं हुआ, तो पीड़िता को गहरा मानसिक आघात पहुंच सकता है.

AIIMS की रिपोर्ट के बाद मंजूरी

रिपोर्ट के मुताबिक, एक SOP है जिसके तहत नाबालिग रेप पीड़ितों के मामलों में ऐसी रिक्वेस्ट को मंजूरी देने के लिए जरूरी ज्यूडिशियल ऑर्डर की जरूरत होती है. अदालत ने ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (AIIMS) के बनाए मेडिकल बोर्ड की 19 जून की रिपोर्ट भी देखी. जिसमें प्रेग्नेंसी खत्म करने की मंजूरी दी गई थी. 

कोर्ट ने नोट किया कि नाबालिग को मेडिकल प्रोसीजर से गुजरने के लिए मेडिकली फिट बताया गया है. जिसके बाद जस्टिस मिनी पुष्करणा ने बुधवार, 24 जून को याचिकाकर्ता की रिक्वेस्ट मान ली. और AIIMS को इस प्रक्रिया का खर्च उठाने का निर्देश दिया.  

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उन्होंने माना कि मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) एक्ट, 1971 के तहत 24 हफ्ते के बाद प्रेग्नेंसी खत्म करने पर रोक है. लेकिन कोर्ट रेप की विक्टिम के मामले में खास परिस्थितियों (मानसिक सदमा पहुंचना) में इसकी इजाजत दे सकता है.

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कोर्ट ने कहा कि नाबालिग की प्रेग्नेंसी खत्म करने के लिए की गई प्रक्रिया का पूरा रिकॉर्ड मेडिकल बोर्ड द्वारा रखा जाना चाहिए. साथ ही एम्स को निर्देश दिया कि वह DNA टेस्टिंग के लिए भ्रूण के टिश्यू को सुरक्षित रखें. ये आरोपी के खिलाफ दर्ज क्रिमिनल केस के लिए जरूरी होगा.

कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर फीटस जिंदा है, तो पैदा हुए बच्चे को जरूरी मेडिकल सपोर्ट दिया जाए. संबंधित अधिकारियों को बच्चे को गोद देने के लिए कदम उठाने के लिए भी कहा है. 

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