धृतराष्ट्र आंखों से महरूम थे, मगर ये न समझो कि मासूम थे. उन्हें भी थी ख्वाहिश कि दुनिया है क्या, अंधेरा है क्या और उजाला है क्या. वो एक शख्स संजय पड़ा जिसका नाम, वही उनसे आखिर हुआ हमकलाम. उसे रब ने ऐसी नजर बख्श दी, कि बिन देखे हर एक शै देख ली. धृतराष्ट्र राजा भी थे बाप भी, समझते थे वो पुण्य भी पाप भी. मुहब्बत में बेटों की सरशार थे, अजब ही तरह के वो किरदार थे. उन्हें थी ये ख्वाहिश की सब जान लें, सभी लड़ने वालों को पहचान लें.आइए एक शायर को शायरी से ही याद किया जाए. क्यूंकि 'यही' वो चीज़ है जो जलालपुरी अपने बाद छोड़ गए हैं:
एक कविता रोज़ के संस्करण पढ़ें: 'इस तरह भूल जाएं बीते साल भर की मुश्किलें' 'मेरी मां मुझे अपने गर्भ में पालते हुए मज़दूरी करती थी, मैं तब से ही एक मज़दूर हूं' 'बड़े लोग इसी काम के लिए बेदांता नाम के हस्पताल में जाते हैं' 'किन पहाड़ों से आ रहा है ये किस समंदर को जा रहा है, ये वक़्त क्या है?' 'पंच बना बैठा है घर में फूट डालने वाला' 'सुनो परम ! पैदल चलना, हाथ से लिखना और सादा पानी पीना...' 'बंधे हों हाथ और पांव तो 'आकाश' हो जाती है उड़ने की ताक़त' 'अगर बचा रहा तो कृतज्ञतर लौटूंगा' 'तीन आलू सरककर गिर गए हैं किसी के' 'मेरे लिए दिल्ली छोड़ने के टिकट का चन्दा इकट्ठा करें' 'दिल्ली में रोशनी, शेष भारत में अंधियाला है'
Video देखें: 'कुछ बन जाते हैं':





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