The Lallantop

41 मजदूरों को सुरक्षित बाहर निकालने वाले रैट माइनर्स की कहानी

17 दिनों तक अंधेरी सुरंग में किन चीजों के सहारे जिंदा रहे 41 मजदूर, जानिए उन्हीं की जुबानी.

Advertisement
post-main-image
रैट माइनर मुन्ना कुरैशी (बाएं), मजदूरों के साथ सीएम धामी (दाएं) (फोटो- X/इंडिया टुडे)

28 नवंबर को हमने आपको बताया था कि किन कठिनाइयों को पार करके 41 मजदूरों को सुरक्षित बचाया गया. अब आगे की कहानी बताएंगे. जब मजदूरों को सुरंग से सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया, तो उन्हें प्राथमिक जांच के लिए चिनयालीसौड़ के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में भर्ती कराया गया. जब उनकी जांच हो गई और इस बात की तसदीक कर ली गई कि वो दुरुस्त हैं. तो उन्हें एक कमरे में बिठाया गया. सामने था एक फोन. फोन की घंटी बजी. मजदूरों ने जवाब दिया, दूसरी तरफ से आवाज आई हैलो. ये थी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आवाज. PM मोदी 28 नवंबर की शाम चल रही कैबिनेट मीटिंग में भी लगातार सुरंग में चल रहे ऑपरेशन का हाल ले रहे थे. और खाली होते ही मजदूरों से बात शुरू की. फोन पर हुई इस बातचीत का वीडियो भी बना.

Add Lallantop as a Trusted Sourcegoogle-icon
Advertisement

तो मजदूर पीएम मोदी को बता रहे थे कि वो उस अंधेरी सुरंग में 17 दिनों तक कैसे रहे? शुरुआत में उन्हें लगा कि वो नहीं बच पाएंगे. फिर उन्हें धीरे-धीरे बाहर हो रहे प्रयासों की सूचना मिलने लगी. फोन डिस्चार्ज होने लगा तो फोन का चार्जर मिला, भूख लगी तो खाना, और दम घुटने लगा तो आक्सिजन. मजदूरों ने कहा कि धीरे-धीरे उनका भरोसा इस बात पर मजबूत होता गया कि उन्हें सुरक्षित बाहर निकाल लिया जाएगा. तमाम मजदूरों ने मीडिया से अपनी-अपनी कहानी साझा की.

ये तो हो गए वो लोग, जो सुरंग में फंसे हुए थे. अब इन्हें बचाने वालों की कहानियां जानते हैं. रेस्क्यू करने वाली टीम के बारे में संख्या की भाषा में बात करते हैं. 41 लोगों को बचाने के लिए कुल 652 लोगों की टीम लगी हुई थी. इन 652  लोग में शामिल थे-

Advertisement

189 पुलिसकर्मी 

106 स्वास्थ्यकर्मी 

101 लोग डिजास्टर रीस्पान्स फोर्स के. इसमें 39 लोग SDRF यानी State Disaster Response force के और 62 लोग NDRF यानी National Disaster Response Force के थे.

Advertisement

77 जवान इंडो-तिबतन बॉर्डर पुलिस के, इनकी कुल दो बटालियन तैनात थी. इसमें 60 जवान 12वीं  बटालियन से, 17 जवान 35वीं बटालियन से थे.

46 कर्मचारी उत्तरकाशी जल संस्थान के

32 कर्मचारी उत्तराखंड पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड के

24 कर्मचारी दिल्ली डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी के

12 कर्मचारी उत्तरकाशी के फायरमैन

9 उत्तरकाशी के जिला सप्लाई ऑफिसर के लोग

7 वायरलेस पुलिस जवान

7 कर्मचारी जल निगम से

3 कर्मचारी सूचना विभाग के लोग

1 कर्मचारी चिनयालीसौड़ PWD से

कुल संख्या हुई 652.  इसी 652 में वो नायक भी आते हैं, जिन्होंने पहाड़ तोड़ दिया. हाथों से. धीरे-धीरे पहाड़ में सुराख करने वाले रैट माइनर्स. इन माइनर्स ने 800 मिलीमीटर की पाइप में घुसकर हाथ से खुदाई पूरी की. और एक पाइप लगाकर सभी मजदूरों को बाहर निकाला. 12 मेंबरान वाली इस टीम के सदस्यों के नाम कुछ इस तरह है-

- देवेंद्र

- फिरोज

- राशिद

-इरशाद

- नसीम

- मोनू

- नसीर

- अंकुर

- जतिन

- वकील हसन

- सौरभ

- मुन्ना कुरैशी

इन 12 लोगों में 6 दिल्ली के रहने वाले थे, और 6 रहने वाले थे यूपी के बुलंदशहर के. इनमें सुरंग के अंदर फंसे मजदूरों तक सबसे पहले पहुंचने वालों में से मुन्ना कुरैशी ही थे. इन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर हाथों से करीब 12 मीटर तक का मलबा हटाया. ऑपरेशन सफल हो गया तो मुन्ना कुरैशी ने कहा कि सामने अड़चनें आती रहीं लेकिन हम चलते रहे. हिम्मत नहीं हारी.  

और इस तरह सुरंग में सबसे पहले पहुंचकर मुन्ना कुरैशी ने इतिहास लिखा. 29 नवंबर की सुबह होते-होते मुन्ना कुरैशी का नाम एक कीवर्ड में बदल गया. उनकी ज़िंदगी की कहानी खोजी जाने लगी. पता चला कि वो दिल्ली के खजुरी खास के रहने वाले हैं. पूरा नाम है आरिफ़ मुन्ना कुरैशी. जब कोरोना फैला, तो पत्नी की मौत हो गई. मुन्ना तीन छोटे बच्चों की दिल्ली में ही रहकर देखभाल करते थे.

जब उत्तरकाशी की सुरंग में ऑगर मशीन फंसकर पुर्जा-पुर्जा हो गई. तो रैट माइनिंग करने वाले जत्थे को दिल्ली में इकट्ठा किया जाने लगा. मुन्ना इसमें माहिर थे. उन्होंने अपने तीन बच्चों का जिम्मा अपने भाई को सौंपा, और उत्तरकाशी रवाना हो गए. पूरे माइनिंग के ऑपरेशन को लीड किया. सफलता मिल गई. और अगले ही दिन सुबह से मुन्ना के दिल्ली वाले घर पर पत्रकारों की भीड़ जमा हो गई.

मुन्ना की तरह ही इस टीम में शामिल नसीम भी इसी खजुरी खास के रहने वाले थे. रेस्क्यू ऑपरेशन के लिए जिस रोज़ नसीम निकले थे उस दिन घर में शादी का माहौल था. उनकी दो बहनों की शादी एक साथ पड़ी हुई थी. लेकिन माइनर की लिस्ट में नाम आया, नसीम ने सामान लिया. उत्तरकाशी चले गए. उनकी बहनें उनकी गैरमौजूदगी में विदा हुईं. लेकिन घरवाले इस बात से खुश कि नसीम हीरो बन गया. ये सभी लोग पानी की पाइपलाइन बिछाने या टनल में काम करने में माहिर थे, इसीलिए इन्हें इस कालजयी टीम का हिस्सा बनाया गया. ये बस मुन्ना, नसीम, देवेन्द्र या अंकुर का कोई फुटकर प्रयास नहीं था. एक साझा प्रयास था. और जब ये प्रयास सफल हो गया, तो सब एकसाथ कैमरे के सामने आए.

इन मजदूरों के साथ एक और नाम काफी चर्चा में रहा. ऑस्ट्रेलिया से आए अंतरराष्ट्रीय टनलिंग एक्सपर्ट अर्नोल्ड डिक्स. प्रोफ़ेसर डिक्स सुरंग का आकलन करने के लिए 20 नवंबर को उत्तरकाशी पहुंचे थे. शुरू में पहाड़ ढहने की आशंका थी. इसीलिए उन्होंने इलाक़े का मुआयना किया. तमाम अनिश्चितताओं के बावजूद वो लगातार अधिकारियों को ढांढस भी बंधाते रहे. जब रैट माइनर्स सुरंग में आखिरी चरण में थे, तो अर्नोल्ड डिक्स उस समय लोगों से कह रहे थे - "पर्वत हमें एक चीज सिखाता है - धैर्य रखो." धैर्य को उसकी परिणति मिली.

तो कौन हैं ये डिक्स?

अर्नोल्ड भूमिगत और परिवहन के बुनियादी ढांचे के निर्माण में एक्सपर्ट हैं. करीब तीन दशकों से भूमिगत निर्माण की सुरक्षा के इर्द-गिर्द काम कर रहे हैं. उनकी वेबसाइट के मुताबिक़, वो एक भूविज्ञानी, प्रोफ़ेसर, इंजीनियर और वकील भी हैं. वो जिनेवा के इंटरनेशनल टनलिंग एंड अंडरग्राउंड स्पेस एसोसिएशन के प्रमुख हैं. ये कंपनी अंडरग्राउंड कंस्ट्रक्शन के लिए कानूनी, पर्यावरणीय, राजनीतिक और अन्य जोखिमों को लेकर सलाह देती है. जेनेवा से पहले उन्होंने 2016 से 2019 तक अंतरराष्ट्रीय NGO 'रेड क्रेसेंट सोसाइटी' के साथ क़तर में काम किया है.

उनकी वेबसाइट का नाम है arnolddix.com. अगर आप इस वेबसाइट का मुआयना करने जाएंगे तो आपको पहली पंक्ति में लिखा दिखेगा-

'It is the uncertainty the future brings, and the illusion of the wisdom of hindsight, that drives Professor Dix’s focused legal/scientific/engineering approach'.

इसका मोटामाटी हिंदी तजुर्मा कुछ ऐसा है- 'प्रोफेसर डिक्स के नजरिए का केंद्र क्या है? भविष्य की अनिश्चितता और दूरंदेश के ज्ञान का भ्रम."

उत्तरकाशी में रेस्क्यू के दौरान अर्नोल्ड डिक्स ने विज्ञान और इंजीनियरिंग के साथ-साथ आस्था में भी अपनी उम्मीद बनाए रखी. अर्नोल्ड ने मज़दूरों को सुरक्षित निकालने के लिए स्थानीय संतों-बाबाओं के साथ प्रार्थना की. मिशन पूरा होने के बाद उन्होंने कहा -

"मैंने कहा था कि क्रिसमस तक सारे मज़दूर अपने-अपने घर पर होंगे और किसी को भी चोट नहीं पहुंचेगी. क्रिसमस जल्दी आ गया."  

जब उत्तरकाशी के सफल ऑपरेशन के लिए उन्हें ऑस्ट्रेलियाई पीएम एंथनी अल्बनीज ने बधाई दी तो डिक्स ने जवाब दिया - "हम (ऑस्ट्रेलिया के लोग) सिर्फ क्रिकेट में ही अच्छे नहीं हैं."

अब सारे बचाए गए मजदूर अब ऋषिकेश एम्स में हैं. वो यहां 48 घंटों तक रहेंगे. कोई दिक्कत नहीं मिली, तो वो 48 घंटों बाद अपने घर की गाड़ियों में होंगे. उन्हें बचाने गए सारे इंजीनियर भी. सारे मजदूर भी. सारे माइनर भी. किसी एक मौके पर मजदूर फिर से लौटेंगे काम पर.

Advertisement