(सत्यम सिंह, उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले से आते हैं. बीएचयू से एमए मास-कम्यूनिकेशन कर रहे हैं. अभी अंतिम वर्ष में हैं. फ़िल्में देखना पसंद है और लेखक बनने की इच्छा रखते हैं. आज दी लल्लनटॉप के माध्यम से पढ़वा रहे हैं उनकी एक कहानी.)
'वयस्क फ़िल्मों में दिखाए गये प्रेम करने के तरीकों को व्यवहार में न लाइए'
एक कहानी रोज़ में पढ़िए सत्यम सिंह की कहानी फव्वारा

फव्वारा
सूचना की क्रांति के साथ ही एक और क्रांति भी आरंभ हुई थी, जिसके बारे में लोग अभी भी अनभिज्ञ है, वह क्रांति जो भारत को विश्वगुरु तो नहीं लेकिन बहुत ही जल्द विश्व जनसंख्या बाहुल्य देश जरुर बना देगी. यहां बात हो रही है प्रेम की क्रांति की.
प्रेम, जो की गंगा (औद्योगिक क्रांति के पहले की) की तरह पवित्र है.
प्रेम की क्रांति से समाज में प्रेम करने के कई नए तरीके व्यवहार में आए. जैसे की डर्टी टॉक्स, प्रेम बाई विडियो कालिंग आदि. प्रेम की क्रांति को सबसे ज्यादा प्रभावित किया सूचना की क्रांति के साधन इंटरनेट ने. इंटरनेट वह साधन है जिसने हमें प्रेम करने के कई नए तरीके तो सिखाये ही, साथ ही जो युवक/युवती अपने प्रेमी युगल को ढूंढ पाने में असमर्थ रह जाते है उन्हें भी आत्म संतुष्टी में सहायता की.
प्रेम करने के इन अनेक साधनों में एक साधन है - जिसमें प्रेमी युगल, स्नानगृह में जाकर, स्नान करने वाले फव्वारे को खोलकर, उसके नीचे खड़े होकर प्रेम करते है, इस प्रकार प्रेम करते समय प्रेमी युगल के शरीर पर जलधारा गिरती रहती है.
प्रेम करने के इस तरीके से चौबे जी का लड़का राजू अत्यंत प्रभावित था. राजू, जिसका पूरा नाम राजेंद्र चौबे है. जिन्होंने, इंटरनेट पर प्रेम करने के तरीकों के अध्ययन में बहुत रिसर्च की है. जिन्हें प्रेम करने के लगभग सारे तरीकों के नाम अंग्रेजी भाषा में याद है, हालांकि उन्हें अंग्रेजी भाषा का ज्ञान बहुत ही कम है, परंतु यहां पर हम राजू की शैक्षिक योग्यता पर बात नहीं करेंगे. क्यूंकि शैक्षिक योग्यता का प्रेम करने की इच्छा से कोई संबंध नहीं है. लेकिन शैक्षिक योग्यता के संबंध में एक बात ये जरुर बता दूं कि राजू ने वयस्क फिल्मों से प्रेम करने के तरीकों के साथ साथ अंग्रेजी भी सीखी है. इन्होंने जितनी अंग्रेजी सीखी है वो वयस्क फिल्मों से ही सीखी है.
इंटरनेट पर ही पड़ी अन्य वयस्क कहानियां जिसमे लेखक अथवा लेखिका अपने शारीरिक बनावट का परिचय देता है ठीक उसी प्रकार राजू के शारीरिक बनावट का परिचय दे दूं: कि राजू जो हैं, वो ठीक ठाक लम्बाई के हैं, पांच फीट से थोड़े ज्यादा और साढ़े पांच फीट से थोड़ा कम. पिता जी द्वारा कठिन परिश्रम कर के कमाई गयी रोटी भी इनके शरीर पर मांस की एक परत नहीं चढ़ा पाई थी.
हां हाथ पैर और शरीर पर भालू जैसे बाल जरुर उग आए थे. ऐसा प्रतीत होता था कि पिता जी की सारी रोटी का प्रोटीन और माता का सारा वात्सल्य इनके हाथ, पैर, पेट, सीना (जो कि दिखता नहीं), एवं पीठ के बालों को ही मिला है.
तो ये कहानी है राजू की, जो अभी तक आत्म संतुष्टी के लिए इन्हीं वयस्क फिल्मों का सहारा लेते थे, इन्होंने एक सुदर्शन महिला मित्र बना ली है.
वयस्क कहानियो में जिस प्रकार नायिका के शारीरिक बनावट का परिचय दिया जाता है एवं नायिका का नाम भी बताया जाता है (चाहे वह नाम बदला हुआ ही क्यों न हो), इस प्रकार यहां पर कुछ भी नहीं किया जाएगा. क्योकि शारीरिक परिचय सुंदरता को व्यक्त करने के लिए दिया जाता है और लेखक का मानना है की लड़कियां या तो सुंदर होती हैं या बहुत सुंदर तथा नाम इसलिए नहीं दिया जा रहा क्योंकि नाम में रखा ही क्या है? (ये शेक्सपियर का मानना है).
तो राजू यानी नायक और नायिका कई महीनो से आधिकारिक रूप से प्रेम में हैं, और इस आधिकारिक प्रेम की जो बची हुई औपचारिकता है उसे पूरा करने के लिए राजू ने अपने एक दोस्त का फ्लैट भी ढूंढ लिया है. औपचारिकता के साथ साथ अपनी इच्छा की पूर्ति के लिए स्नानगृह के फव्वारे की भी जांच कर ली है. अब बस जरुरत थी तो नायिका को इस कार्य के लिए मनाने की. युवा होने एवं सर्दी का मौसम होने के नाते नायिका को मनाने में कोई मुश्किल नहीं हुई. सर्दी भी ऐसी कि मानो पूरा शहर हिमाचल हुआ जा रहा है.
तो फिर देर किस बात की; राजू, नायिका को लेकर अपने दोस्त के फ्लैट पर पहुंच गया. उसके दोस्त ने पहले ही अपने फ्लैट की चाभी राजू को दे रखी थी. उस फ्लैट में राजू और नायिका के सिवा कोई नहीं था. यहां पर उस फ्लैट की स्थिति के बारे में भी बता दूं. वो फ्लैट दो शयनकक्ष, विशालकक्ष एवं रसोईघर (2 बीएचके) वाला था. जिसे राजू के दो मित्रों ने मिलकर किराए पर ले रखा था. अब चूंकि दो मित्रों ने मिलकर ले रखा था तो स्वभाविक है कि वो दोनों कुंवारें ही होंगे (यहां कुंवारें होने से मतलब है कि शादी शुदा न होना). दो मध्यमवर्गीय कुंवारें लड़के जब बाहर फ्लैट लेते हैं तो उनकी बस एक ही इच्छा होती है - और वो ये कि उन्हें आज़ादी मिलेगी. परंतु वास्तविकता में उन्हें आज़ादी मिलती है तो सिर्फ नहाने से. नहाने की आज़ादी की वजह से उस फ्लैट में गीजर या वाटर हीटर का कोई जुगाड़ नहीं था.
अब आते हैं मुख्य कथा पर:
हां तो नायक नायिका फ्लैट के अंदर अकेले हैं, दरवाजा बंद हो चुका है, सारी खिडकियों पर पर्दे भी डल चुके हैं. नायक नायिका अपने प्रेम की सारी औपचारिकताओं को विधिवत पूरा कर लेते हैं. आपको यहां पर बता दूं कि ये कहानी राजू की प्रेम की औपचारिकताओं को पूरा करने के बारे में नहीं है. इसलिए यहां औपचारिकता पूरी करने का पूरा वर्णन नहीं किया जा रहा है. यह कहानी है राजू की इच्छा की पूर्ति के बारे में.
तो राजू अपनी औपचारिकताओं की पूर्ति करने के बाद अपनी इच्छा की पूर्ति के लिए नायिका को शयनकक्ष से स्नानगृह में ले जाने का प्रयास करता है. यूं तो नायिका औपचारिकताओं की पूर्ति के बाद थोड़ी असहज रहती है, किन्तु अपने प्रेमी की इस विनती को मना नहीं कर पाती.
हालांकि भारतीय महिला होने के नाते वह प्रेम करने के दौरान अपनी इच्छाएं जाहिर नहीं कर सकती, इसलिए वह पहले मना करती है परंतु कुछ देर मना करने के बाद मान जाती है. नायिका राजू के साथ स्नानगृह में प्रवेश करती है.
भारतीय समाज के शर्म शास्त्र के अनुसार प्रेम करने से पहले सभी रोशनी के स्रोतों को बंद करने का प्रावधान है. किन्तु प्रेम की क्रांति के बाद से शर्म शास्त्र के इस नियम में थोड़ी सी नरमी आई है. इसके बावजूद भी अति उत्साहित राजू शयनकक्ष में अंधेरा किए हुए थे. राजू की शर्म शास्त्र में कोई श्रद्धा नहीं थी परंतु ऐसा उनकी प्रेमिका की शर्म शास्त्र में अटूट श्रद्धा होने के नाते करना पड़ा. परंतु स्नानगृह में जाते ही नायिका भी शर्म शास्त्र के बन्धनों से मुक्त हो गयी.
स्नानगृह के अंदर रोशनी का एक स्रोत अपना कार्य पूरी निष्ठा से कर रहा था. स्रोत के ठीक नीचे एक आइना भी लगा हुआ था. उस आईने के नीचे एक बेसिन एवं सामने फव्वारा. अंदर प्रवेश करते ही नायक एवं नायिका अल्प वस्त्रो में फव्वारे के नीचे खड़े हो गए. प्रेम की क्रांति से प्रभावित राजू की मानो सभी इच्छाएं पूरी हो गई हों.
इसके बाद उसे ईश्वर से कोई शिकायत नहीं. उसने जिस उद्देश्य हेतु यह मानव शरीर धारण किया था मानो वह उसे मिल गया. राजू अपने इस दिव्य स्थिति को देखने के लिए अति उत्साहित हो रहा था, जिस स्थिति में वह कई वर्षों से सपने देख रहा था, आज उसका वह सपना पूरा हो रहा था.
उसने स्वयं को देखने हेतु आईने की तरफ रुख किया परंतु आईने की तरफ देखते ही वह रुक सा गया. नायिका के ठीक पीछे खड़ा राजू स्वयं को उस स्थिति में देखकर थम सा गया, जैसे उसे सदमा लगा हो. वह वयस्क फिल्मों को देखकर खुद की कल्पना करता था. उसे स्वयं को 6 फीट लम्बाई वाले, मांसल भुजाओं, चौड़ी छाती वाले अभिनेता की जगह पर देखकर झटका लगा. गोर शरीर पर इधर उधर अनियंत्रित तरीके से उगे बाल, पतली बाजू और उससे भी पतला पेट. चौड़ी छाती के नाम पर उसकी गणनीय पसलियां. अपने शरीर को देखते ही राजू के आधे शरीर से मानो जन ही गायब हो गयी. किसी तरह उसने नायिका की तरफ उसी आईने में देखा तो पाया की नायिका ने आंखें बंद कर रखी है. यह देख कर राजू को थोड़ी राहत हुई की उसके इस दिव्य दर्शन का लुत्फ़ नायिका नहीं उठा रही है, किन्तु अपने शरीर को देख कर उसकी हिम्मत जवाब देने लगी. वह अपनी इच्छा पूर्ति हेतु आत्मबल की कमी महसूस करने लगा, इसलिए राजू ने तुरंत अपनी नज़रें आईने से हटा दी और फव्वारे की चरखी घुमा दी.
फव्वारे से पानी की अनेक धाराएं निकलीं और राजू एवं नायिका के शरीर पर पड़ने लगी. पानी की पहली बूंद पड़ने से पहले राजू को अपनी औपचारिकता की पूर्ति करने में मिली सफलता एवं इच्छा पूर्ति करने हेतु उत्साह का अनुभव हो रहा था. परंतु पहली बूंद पड़ते ही उसे जनवरी की सर्दी का भी एहसास हुआ.
जैसे ही पानी की बूंदे राजू के शरीर पर अपना सफ़र तय करे लगीं वैसे ही राजू का बचा हुआ आत्मविश्वास भी जवाब देने लगा. राजू का आत्मविश्वास आईने में अपने शरीर को देख कर पहले ही घायल हो चुका था, उसकी निर्मम हत्या फव्वारे से निकली बूंदों ने कर दी और जिससे राजू की इच्छा पूर्ति कभी न हो सकी.
इस कहानी का दुःखद अंत करना लेखक की इच्छा नहीं है, परंतु वयस्क फिल्मों से प्रेरित होकर प्रेम करना आजकल के राजुओं के हित में नहीं है, यह बात समझाने के लिए इस कहानी का दुःखद अंत आवश्यक हो जाता है. अंत में लेखक यही कहना चाहता है की वयस्क फ़िल्में देखिए परंतु उसमें दिखाए गये प्रेम करने के तरीकों को व्यवहार में न लाइए, वो हमेशा हितकर नहीं. प्रेम करने का सही तरीका क्या होना चाहिए यह नायक नायिका का भावनात्मक निर्णय है न की वयस्क फिल्मों से प्रभावित.
अंत में राजू को उसके सफल प्रेम के लिए बधाई.
लल्लनटॉप में पढ़िए एक कविता रोज़:
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