एग्जाम हॉल से ऑटो में बैठकर घर निकलते हुए रितिका का मूड ठीक नहीं था. पेपर अच्छा नहीं गया. दिमाग में एग्जाम के पेपर घूम रहे थे, जो थे तो आसान लेकिन उन्हें सॉल्व करने में पसीने छूट गए. मूड तो ठीक नहीं था लेकिन ऑटो के स्पीकर पर बज रहा गाना उसे अच्छा लग रहा था. किशोर कुमार की आवाज. गाने के बोल थे- ‘रुक जाना नहीं, तू कहीं हार के. कांटों पे चलके मिलेंगे साए बहार के.’ रितिका ने भी सुर में सुर मिलाया. किशोर कुमार के साथ वह भी गुनगुनाने लगी.‘साथी न कारवां है ये तेरा इम्तिहां है. यूं ही चला चल दिल के सहारे. करती है मंजिल तुझको इशारे.’
सालों पुराने गाने याद, लेकिन कल रात की पढ़ाई भूल गए, जानें दिमाग ऐसा क्यों करता है
ऐसा क्यों होता है कि सालों पहले सुना गाना आज भी याद रहता है, लेकिन एग्जाम से एक रात पहले रटे फॉर्मूले पेपर देखते ही भूल जाते हैं?

अचानकर उसका चेहरा खिल उठा. बचपन में पहली बार उसने ये गाना सुना था. अब सालों बाद जब वो ये गाना फिर सुन रही थी तो उसके सारे बोल याद थे. ये सोचते हुए अचानक वो मायूस हो गई. एक खीझ चेहरे पर आई. सालों पहले सुने गाने के एक-एक बोल याद हैं. लेकिन कल गणित के जो फॉर्म्यूले याद किए थे, वो आज एग्जाम में दिमाग से ऐसे गायब हुए जैसे धूप निकलते ही ओस लापता हो जाती है. सारी रात उसने ये रटने में लगा दिए, लेकिन एग्जाम में बैठते ही सब गायब. वह अपने आपको कोसने लगी.
तभी उसके मन में ये सवाल आया. ऐसा क्यों होता है? कुछ घंटों पहले घोटकर पी लिए गए मैथ्स के सूत्र दिमाग से उड़ गए. लेकिन ये इतना पुराना गाना उसके दिमाग के किस कोने में रहकर जिंदा बच गया था? रितिका का सवाल जायज था. उसके साथ जो हुआ, वह भी उसकी गलती नहीं थी. यह एक मनोवैज्ञानिक पहेली है, जिसका बहुत तार्किक जवाब न्यूरोलॉजी और मनोविज्ञान की दुनिया के पास है.
इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट के मुताबिक, मनौवैज्ञानिक बताते हैं कि हमारा दिमाग गानों को अलग तरीके से समझता है और गणित के फॉर्म्यूले को अलग तरीके से. जब भी हम कोई सुरीला गाना सुनते हैं तो हमारा दिमाग उसे केवल शब्दों के कलेक्शन के रूप में नहीं देखता. उसके साथ आता है एक म्यूजिकल साउंड, म्यूजिकल मूवमेंट, इमोशन और मेमोरी. ये सारी चीजें मिलकर दिमाग के कई हिस्सों को एक साथ ऐक्टिव कर देती हैं.
संगीत में भी कई पैटर्न होते हैं. लय होती है. धुन होती है. ताल और कई दफा बार-बार रिपीट होता कोरस भी होता है. यह पैटर्न हमारी याद्दाश्त के लिए एक तरह से ‘हुक’ का काम करते हैं. इससे दिमाग के लिए जानकारी स्टोर करना और फिर से उन्हें ‘रिगेन’ (फिर से प्राप्त) करना आसान हो जाता है. यह सिर्फ एक बार के सुनने के बाद होता है. सोचिए आपने एक ही गाने को कितनी बार सुना होगा. हर बार जब आप इसे सुनते हैं तो दिमाग को इसे स्टोर करने का एक और मौका मिलता है. जब एक ही गाना बार-बार सुना जाता है तो उसकी याद दिमाग में बैठती जाती है.
एक और बात.
गाने हमारे जीवन की यादों से जुड़े होते हैं. कोई स्पेशल गाना जो आपके स्कूल के दिनों में सुना गया था. या जब कभी आपका दिल टूटा था. या आप प्यार में थे. ऐसे स्पेशल मौकों पर सुने गानें ज्यादा याद रहते हैं. दोस्तों के साथ, गर्लफ्रेंड के साथ या फिर आपकी किसी पसंदीदा जगह पर सुने गए गाने यादों के साथ ऐसे गुंथ गए होते हैं कि ये जीवन की बाकी सारी आम जानकारियों से कहीं ज्यादा मजबूती से दिमाग में स्टोर हो जाते हैं. यही वजह है कि एक गाना आपको पल भर में अतीत का सफर भी करा सकता है.
लेकिन, गणित के फॉर्म्यूले के साथ ऐसा क्यों नहीं होता?
गणित के सूत्र, या विज्ञान का कोई सिद्धांत, या अंग्रेजी की मीनिंग, या भूगोल का कोई प्रश्न जल्दी इसलिए भूल जाता है क्योंकि जब हम ये सब पढ़ते या याद करते हैं तो हमारे दिमाग का केवल एक छोटा सा हिस्सा ऐक्टिव होता है. ये वो हिस्सा होता है जो दिमाग में भाषा और लॉजिक का ‘कामकाज’ देखता है. यानी पढ़ाई-लिखाई वाली चीज याद करते हुए दिमाग के सिर्फ एक हिस्से में बत्ती जलती है, लेकिन जब आप कोई सुरीला गाना सुनते हैं तो पूरा दिमाग जगमगा जाता है.
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इसके अलावा, एक और वजह है. परीक्षा से जुड़ी चीजें हम कितनी बार दोहराते होंगे. एक, दो या तीन बार. लेकिन गाने तो हम कई बार सुन लेते हैं. हमारे दिमाग की बनावट ऐसी है कि वह बार-बार मिलने वाली जानकारी को हिफाजत के साथ स्टोर करने की ज्यादा संभावना रखता है.
रिवीजन, पैटर्न, रिदम और इमोशनल कनेक्शन. याद्दाश्त तेज करने के लिए मन के पास यही सबसे खास औजार हैं. इसीलिए अगर आपको भी याद रखने में समस्या है तो एक बार संगीत की शरण में जाकर देखिए. केमिस्ट्री वाले उस गुरुजी की तरह जिन्होंने एल्केन का फॉर्म्यूला (CnH2n+2) बच्चों को याद कराने के लिए ‘कह दो ना. कह दो ना पलस टू वाला’ गाना बना दिया था.
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