
लोग कहते हैं कि इमरजेंसी असल में संजय गांधी के दिमाग की उपज थीं. इंदिरा सब कर पाती थीं, लेकिन बेटे संजय के आगे कमजोर पड़ जाती थीं.
जोहानन ने इंदिरा को चिट्ठी भेजी जोहानन मार थोमा मेट्रोपॉलिटन. ये ही नाम था उनका. मार थोमा चर्च के सरदार थे ये उन दिनों. कहते हैं कि जोहानन बड़े लिबरल टाइप के इंसान थे. उन्हें इमरजेंसी लगने से बड़ी तकलीफ हुई. उन्होंने इंदिरा गांधी को चिट्ठी लिखी थी. और क्या चिट्ठी लिखी? कड़ी निंदा जितनी कड़ी होनी चाहिए, उतनी कड़ी. जोहानन ने इंदिरा को लिखा. कि वो इमरजेंसी वापस ले लें. विपक्षी दल के नेताओं को जेल से रिहा करें. राजनैतिक बंदियों को आजाद करें. और, मीडिया जैसी संस्थाओं पर लगाए गए प्रतिबंध हटाएं.

23 जून, 1980. इसी दिन एक विमान हादसे में संजय गांधी की मौत हो गई. इसके चार बरस बाद इंदिरा की भी हत्या कर दी गई. संजय की मौत के ग्यारहवें साल, मई 1991 में राजीव गांधी भी मारे गए.
क्या चीज है ये मार थोमा चर्च? थोड़ी सी हिस्ट्री आगे बढ़ें, इससे पहले आपको मार थोमा चर्च के बारे में थोड़ा बता देते हैं. लोगों को लगता है कि ईसाई मतलब ईसाई. मतलब एक जमा धर्म. फिर बहुत सारे लोग हैं, जो कैथलिक और प्रोटेस्टेंट वाला बंटवारा जानते हैं. लेकिन ईसाई धर्म बस इतना थोड़े न है. एक खास तरह के चर्च का मतलब है धर्म की एक खास शाखा. एक खास परंपरा. तो ये जो मार थोमा चर्च है, उसका किस्सा है. कि सन् 52 में सेंट थॉमस नाम के एक संत जहाज पर बैठकर केरल के क्रांगनोर पहुंचे. वो अलेक्जेंडरिया से हिंदुस्तान आए थे. उन्होंने सात जगहों पर चर्च बनाया. यहां से ईसाई धर्म की जो शाखा निकली, उसको मलंकारा चर्च कहते हैं. बाद में एक बार क्या हुआ कि फारस के एक बिशप को पुर्तगालियों ने पकड़कर जेल में डाल दिया. उस बिशप की मौत हो गई. इस घटना से नाराज होकर मलंकारा चर्च के करीब दो हजार ईसाईयों ने ऐलान किया कि वो रोम से अलग हैं. मतलब, ईसाईयों धर्म की सबसे पवित्र मानी जाने वाली जगह से उनका कोई नाता नहीं. यहीं से निकला मार थोमा चर्च.

आंतरिक अस्थिरता के नाम पर देशभर में आपातकाल लगा दिया गया. नागरिक अधिकार होल्ड पर चले गए. देश किसी पुलिस स्टेट में तब्दील हो गया. इमरजेंसी के दौरान करीब एक लाख लोग गिरफ्तार किए गए. कोई ट्रायल नहीं, कुछ नहीं. सजा हो जाती थी.
चिट्ठी लिख तो दी, फिर रिऐक्शन क्या हुआ? ये इमरजेंसी का दौर था. इंदिरा के विरोधियों से ज्यादा जमात उनके चाटुकारों और चमचों की थी. जोहानन की चिट्ठी पर खूब बवाल मचा. आपको याद है? अभी कुछ दिनों पहले एक गोवा के आर्कबिशप की चिट्ठी वाली खबर आई थी. कि उन्होंने मोदी सरकार की आलोचना की है. कितना हंगामा हुआ था. अभी तो कोई इमरजेंसी भी नहीं लगी है. अंदाजा लगाइए कि इमरजेंसी के वक्त जोहानन की लिखी उस चिट्ठी पर कैसी प्रतिक्रियाएं आई होंगी. इंदिरा गांधी सरकार में एक ओम मेहता थे. गृह राज्यमंत्री. वो फायर हो गए थे. जोहानन को अरेस्ट करना चाहते थे. बाकी कांग्रेस कार्यकर्ता, नेता और समर्थक अलग थे. वो लोग जोहानन के खिलाफ विरोध करने लगे. उनकी गिरफ्तारी की मांग होने लगी. उस समय केरल के मुख्यमंत्री हुआ करते थे चेलात अच्युता मेनन. लगातार दो बार CM रहे थे. कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (CPI) से ताल्लुक रखते थे. उन्होंने जोहानन को अरेस्ट किए जाने का विरोध किया. कहा, कोई सवाल ही पैदा नहीं होता अरेस्ट करने का. मुख्यमंत्री बोले, तो उनकी कैबिनेट भी बोली. और आखिरकार जोहानन को जेल नहीं जाना पड़ा.
इंदिरा गांधी ताकतवर नेता थीं. इमरजेंसी के पहले के हालात उनके मुताबिक नहीं रहे थे. इंदिरा को लगा, वो कमजोर हो रही हैं. सो उन्होंने इमरजेंसी लगा दी. ये उनकी ताकत का पीक था. इस दौरान वो प्रधानमंत्री नहीं थीं. वो नेता भी नहीं थीं. वो तानाशाह हो गई थीं. ऐसे में भी एक धर्मगुरु, एक पादरी ने उनके खिलाफ खड़े होने की हिम्मत दिखाई. ऐसा रोज-रोज तो नहीं होता है न!
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