Submit your post

रोजाना लल्लनटॉप न्यूज चिट्ठी पाने के लिए अपना ईमेल आईडी बताएं !

Follow Us

वो सनसनीखेज़ राष्ट्रपति चुनाव जिसमें इंदिरा गांधी सब पर भारी पड़ गईं

5.01 K
शेयर्स

1969 में हुए भारत के सबसे दिलचस्प राष्ट्रपति चुनाव का किस्सा सुनाने से पहले हम कैलेंडर के पन्नों को थोड़ा सा पलट देते हैं. जून 1964 के खाने में दर्ज एक वाकये को हम कहानी की शुरुआत समझ सकते हैं. कहानी का यह सिरा हमें एलसी जैन की किताब ‘सिविल डिसओबीडिएंस’ में.

civil

देश में 13 दिन का राष्ट्रीय शोक चल रहा था. प्रधानमंत्री आवास तीन मूर्ति की पहली मंजिल पर मातमपुरसी के लिए आने वाले लोगों का तांता लगा हुआ था.

इस बीच नेहरू की सियासी वारिस इंदिरा को समझ आ चुका था कि अगर जल्द ही कोई कदम न उठाया गया, तो प्रधानमंत्री की कुर्सी उनके हाथ से निकल जाएगी. उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष के. कामराज को एक चिट्ठी लिखी. इसमें कहा गया कि जब तक राष्ट्रीय शोक समाप्त नहीं हो जाता, तब तक पार्टी को नया प्रधानमंत्री नहीं चुनना चाहिए. वो चाहती थीं कि कुछ दिन के लिए इस चुनाव को टाल दिया जाए, ताकि उन्हें अपने समर्थन में लोग जुटाने का वक्त मिल जाए.

nehru

जिस समय कामराज को यह चिठ्ठी मिली, वर्किंग कमिटी की मीटिंग चल रही थी. कामराज ने मीटिंग को कुछ समय के लिए रोक दिया. वो मातमपुरसी के लिए तीन मूर्ति पहुंचे. जब वो जाने के लिए सीढ़ियों से नीचे उतरे, तो पीछे-पीछे इंदिरा चली आ रही थीं. उन्होंने कामराज से सवाल किया, ‘क्या आपको मेरी चिठ्ठी मिली?’ कामराज ने जवाब में अपनी कमीज की ऊपर वाली जेब की तरफ इशारा कर दिया. फिर वो धीरे से बोले, “हम सब अनाथ महसूस कर रहे हैं, लेकिन जल्द से जल्द नेहरू का वारिस चुना जाना जरूरी है. अगर ऐसा नहीं होता है, तो लोगों में इसका गलत सन्देश जाएगा.’

कामराज वापस लौटे और मीडिया को वो खबर मिली, जिसका लंबे समय से इंतजार हो रहा था. मोरारजी देसाई की जगह लाल बहादुर शास्त्री को देश का नया प्रधानमंत्री चुना गया.

shastriji

1969 से पहले की कांग्रेस में एक शब्द बहुत प्रचलन में था, ‘सिंडिकेट’. ये कांग्रेस के बूढ़े नेताओं का गिरोह था, जो पार्टी के जरिए सरकार पर अपनी पकड़ रखना चाहता था. बंगाल के अतुल्य घोष, महाराष्ट्र से एस.के. पाटिल, कर्णाटक से निजलिंगाप्पा. इसके लीडर हुआ करते थे तमिलनाडु के लोकप्रिय नेता के. कामराज. नेहरू के इंतकाल के बाद ये सिंडिकेट पावर सेंटर बनकर उभरा. कामराज जानते थे कि मोरारजी भी मंझे हुए राजनीतिज्ञ हैं. उनसे पार पाना मुश्किल होगा, इसलिए सिंडिकेट की पहली पसंद थे लाल बहादुर शास्त्री.

के. कामराज के साथ इंदिरा
के. कामराज के साथ इंदिरा

शास्त्री की मौत के बाद सिंडिकेट ने मोरारजी को फिर से दरकिनार कर इंदिरा पर अपना दांव लगाया. इंदिरा उस समय लोहिया के शब्दों में ‘गूंगी गुड़िया’ हुआ करती थीं. सिंडिकेट को भरोसा था कि इंदिरा को आसानी से काबू कर लिया जाएगा. 19 जनवरी 1966 को अपने प्रधानमंत्री बनने के बाद छह महीने तक इंदिरा वो करती रहीं, जो सिंडिकेट उनसे चाहता था.

नेहरू के वफादार नौकरशाह एच.एम. हक्सर इंदिरा के पक्ष में खड़े हो गए. हक्सर के सुझाव पर इंदिरा ने देश में समाजवादी कार्यक्रमों को तेजी से लागू करना शुरू किया. 10 सूत्रीय कार्यक्रम की शुरुआत हुई. सिंडिकेट इंदिरा की नई आर्थिक नीति से सहमत नहीं था. रुपए का अवमूल्यन किया गया. बैंकों के राष्ट्रीयकरण की कवायद तेज हो गई.

1967 के चुनाव कांग्रेस के लिए झटका साबित हुए. कांग्रेस पहली बार 300 के भीतर सिमट गई. सिंडिकेट की भी स्थिति काफी कमजोर हो चुकी थी. कामराज विरुद नगर सीट से डीएमके एक छात्र नेता के हाथों चुनाव हार चुके थे. एसके पाटिल बॉम्बे साउथ से जॉर्ज फर्नांडिस के खिलाफ चुनाव हार चुके थे. इंदिरा ने इस मौके को भुनाने की कोशिश की. तीसरे राष्ट्रपति जाकिर हुसैन के चुनाव के वक्त बतौर पार्टी अध्यक्ष के. कामराज ने उनकी उम्मीदवारी के खिलाफ काफी अड़ंगेबाजी की थी. नतीजतन उन्हें पार्टी अध्यक्ष की कुर्सी गंवानी पड़ी. उनकी जगह पर संतुलन बिठाने के लिहाज से निजलिंग्प्पा को अध्यक्ष बनाया गया, जो सिंडिकेट धड़े के ही दूसरे बड़े नेता थे.

कहने को पार्टी की कमान निजलिंगप्पा के हाथ में आ चुकी थी, लेकिन पार्टी अब भी कामराज ही चला रहे थे. इधर राष्ट्रपति जाकिर हुसैन का असामयिक निधन हो गया. एक बार फिर से राष्ट्रपति चुनाव के बहाने जोर आजमाइश का मौका आ गया.

एक गलत दांव ने बाजी पलट दी

10 जुलाई 1969. राष्ट्रपति पद के लिए अपना आधिकारिक उम्मीदवार घोषित करने के लिए बेंगलुरु में कांग्रेस के संसदीय बोर्ड की मीटिंग बुलाई गई. सिंडिकेट राष्ट्रपति पद पर अपना उम्मीदवार चाहता था, ताकि इंदिरा पर एक हद तक अंकुश लगाया जा सके. इस बार कामराज पूरी तैयारी के साथ आए थे. जाकिर हुसैन की उम्मीदवारी के वक्त हुई गलती को वो दोहराना नहीं चाहते थे. उन्होंने नीलम संजीव रेड्डी के नाम का प्रस्ताव रखा. इंदिरा चाहती थीं कि जगजीवन राम को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया जाए. ये महात्मा गांधी की जन्म शताब्दी थी. एक दलित नेता को राष्ट्रपति बनाकर कांग्रेस दलित वोटों पर अपनी पकड़ मजबूत बनाना चाहती थी.

कामराज और इंदिरा
कामराज और इंदिरा

संसदीय बोर्ड में उनका प्रस्ताव चार के मुकाबले दो वोट से गिर गया, लेकिन कामराज इससे पहले एक बड़ी भूल कर चुके थे, जो उनके नजरिए में मास्टर स्ट्रोक था. उन्होंने इंदिरा को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनने की पेशकश की. इंदिरा समझ गई कि सिंडिकेट उनका पत्ता काटने में लगा हुआ है.

कार्यवाहक राष्ट्रपति का अंतिम फैसला

जब इंदिरा बैंगलोर से दिल्ली पहुंचीं, तो उन्होंने सबसे पहला काम ये किया कि मोरारजी देसाई को कैबिनेट से निकाल बाहर फेंका. 1967 के चुनाव के बाद नई बनी सरकार में इंदिरा मोरारजी को जगह नहीं देना चाहती थीं. उस समय इंदिरा को सिंडिकेट के दबाव में न सिर्फ मोरारजी भाई को मंत्रिमंडल में शमिल करना पड़ा, बल्कि उन्हें वित्त मंत्रालय और उप प्रधानमंत्री का पद भी देना पड़ा.

इंदिरा की नई आर्थिक नीति का सबसे अहम हिस्सा था बैंकों का राष्ट्रीयकरण. बतौर वित्तमंत्री मोरारजी इसमें सबसे बड़ी अड़चन थे. 16 जुलाई 1969 को मोरारजी के इस्तीफा देने के ठीक चार दिन बाद कार्यवाहक राष्ट्रपति वी.वी. गिरी ने बैंकों के राष्ट्रीयकरण के विधेयक पर अपनी मंजूरी दे दी. ये इस पद पर उनका अंतिम फैसला था.

नाटकीय उम्मीदवारी

उस समय उप राष्ट्रपति पद राष्ट्रपति की कुर्सी की सबसे मजबूत दावेदारी हुआ करता था. सिंडिकेट ने इस रवायत को तोड़ दिया. नीलम संजीव रेड्डी की उम्मीदवारी की घोषणा के बाद वेंकट गिरी ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया और निर्दलीय के तौर पर चुनाव मैदान में कूद पड़े.

गिरी के पास विपक्ष का समर्थन भी नहीं था. स्वतंत्र पार्टी और जनसंघ ने इस चुनाव में सीडी देशमुख को अपना उम्मीदवार बनाया था. ऐसे में सवाल ये है कि क्या उनका ये निर्णय इंदिरा की सहमति के बाद लिया गया. हालांकि, इस बात के कोई पुख्ता सबूत तो नहीं मिलते, पर पूरा घटनाक्रम देखने के बाद इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता.

इंदिरा गांधी और वीवी गिरी
इंदिरा गांधी और वीवी गिरी

सिंडिकेट को ये समझ में आ चुका था कि इंदिरा वीवी गिरी के समर्थन में आ चुकी हैं. इसके जवाब में कांग्रेस अध्यक्ष निजलिंगप्पा ने जो किया, वो और भी अधिक घटक साबित हुआ. उन्होंने स्वतंत्र पार्टी और जनसंघ के नेताओं से मिलकर उन्हें अपना सेकंड प्रिफरेंस वोट रेड्डी के पक्ष में डालने की गुजारिश की. विपक्ष को मौका मिल गया कि कांग्रेस के भीतर पैदा हो रही दरार को और चौड़ा कर सकें. उन्होंने इस बात की जानकारी इंदिरा तक पहुंचा दी.

इंदिरा ने चुनाव से एक दिन पहले तक अपने पत्ते नहीं खोले. 15 अगस्त 1969 को देश के 21वें स्वंत्रता दिवस की शाम उन्होंने कांग्रेस के सांसदों को राष्ट्रपति चुनाव में वोटिंग के दौरन अपनी ‘अंतर आत्मा’ की आवाज सुनने को कहा. हालांकि, पार्टी अध्यक्ष के तौर पर निजलिंगप्पा ने रेड्डी के पक्ष में विप जारी की थी, लेकिन संसदीय दल की नेता के तौर पर इंदिरा ने ऐसी कोई विप जारी नहीं की. इससे निजलिंगप्पा की विप बेमानी हो गई.

ये अंतरात्मा की आवाज थी

चुनाव के चार दिन बाद 20 अगस्त 1969 को वोटों की गिनती शुरू हुई. कांग्रेस के 163 सांसदों ने क्रॉस वोटिंग की थी. गिरी को 17 में 11 राज्यों में बहुमत मिला था. उस समय 12 राज्यों में कांग्रेस की सरकार हुआ करती थी. फिर भी उन्हें कुल 8,36,337 वोट में से जरूरी पचास फीसदी वोट भी नहीं मिल पाए. उन्हें महज 4,01,515 वोट मिले थे. हालांकि, नीलम संजीव रेड्डी उनसे काफी पीछे चल रहे थे और उन्हें 3,13,548 वोट ही मिल पाए थे.

indira-gandhi-declaring-a-state-of-emergency_9e6e19dc-e0d9-11e6-a538-54bd197a5a1b

पहले राउंड की गिनती खत्म होने के बाद कामराज खेमे ने खुशियां मनाना शुरू कर दिया. उन्हें भरोसा था कि स्वतंत्र पार्टी और जनसंघ का सेकंड प्रिफरेंस वोट नीलम संजीव रेड्डी के पक्ष में गया है. तो ऐसा क्यों था कि स्वतंत्र पार्टी का सेकंड प्रिफरेंस वोट नीलम संजीव रेड्डी के पक्ष में डाले. फर्स्ट प्रिफरेंस वोट क्यों नहीं.

दरअसल इस चुनाव में वीवी गिरी और नीलम संजीव रेड्डी के अलावा एक और उम्मीदवार भी था- चिंतामण द्वारकानाथ देशमुख. सीडी देशमुख रिजर्व बैंक के गवर्नर रहे चुके थे. नेहरू की पहली सरकार में वो वित्तमंत्री भी रहे. वो इस चुनाव में स्वतंत्र पार्टी और जनसंघ के उम्मीदवार थे. पहली गिनती में उन्हें 1,12,769 मूल्य के वोट मिले.

इधर पहले राउंड के नतीजों का समाचार मिलने के बाद इंदिरा की दोस्त पुपुल जयकर उनसे मिलने पहुंचीं. पुपुल इंदिरा की जीवनी में लिखती हैं कि जब वो इंदिरा के पास पहुंचीं, उस समय इंदिरा ‘बीथोवन’  का संगीत सुन रही थीं. पुपुल ने परेशान होकर कहा कि पहले राउंड में गिरी को बहुमत न मिलने का मतलब है… गिरी की हार. इंदिरा ने मुस्कुराकर उत्तर दिया, ‘घबराओ मत पुपुल, ये कड़ा मुकाबला है और मैं इसके  लिए तैयार हूं.’


पिछली कड़ियां:

वो राष्ट्रपति जिनकी जीत का ऐलान जामा मस्जिद से हुआ था

महामहिम: पहले मुस्लिम राष्ट्रपति के लिए इंदिरा ने क्या चाल चली

महामहिम: तानाशाह के गाल थपथपा देने वाला राष्ट्रपति

महामहिम: हरियाणा का चौधरी, जिसने राष्ट्रपति चुनाव में गजब का रिकॉर्ड बनाया

लल्लनटॉप न्यूज चिट्ठी पाने के लिए अपना ईमेल आईडी बताएं !

लगातार लल्लनटॉप खबरों की सप्लाई के लिए फेसबुक पर लाइक करें
The Lallantop Mahamahim: Story of V.V. Giri, how Indira gandhi defeated syndicate in presidential election 1969

गंदी बात

#MeToo मूवमेंट इतिहास की सबसे बढ़िया चीज है, मगर इसके कानूनी मायने क्या हैं?

अपने साथ हुए यौन शोषण के बारे में समाज की आंखों में आंखें डालकर कहा जा रहा है, ये देखना सुखद है.

तनुश्री-नाना मसले पर अमिताभ बच्चन ने ये बात कहकर अपना दोहरापन साबित कर दिया

'पिंक'? वो तो बस फिल्म थी दोस्तों.

इंटरनेट ऐड्स में 'प्लस साइज़' मॉडल्स को देखने से फूहड़ नजारा कोई नहीं होता

ये नजारा इसलिए भद्दा नहीं है क्योंकि मॉडल्स मोटी होती हैं...

लेस्बियन पॉर्न देख जो आनंद लेते हैं, उन्हें 377 पर कोर्ट के फैसले से ऐतराज है

म्याऊं: संस्कृति के रखवालों के नाम संदेश.

कोर्ट के फैसले को हमें ऑपरा सुनते एंड्र्यू के कमरे तक ले जाना है

साढ़े 4 मिनट का ये सीक्वेंस आपके अंदर बसे होमोफ़ोबिया को मार सकता है.

राधिका आप्टे से प्रोड्यसूर ने पूछा 'हीरो के साथ सो लेंगी' और उन्होंने घुमाके दिया ये जवाब!

'बर्थडे गर्ल' राधिका अपनी पीढ़ी की सबसे ब्रेव एक्ट्रेसेज़ में से हैं.

'स्त्री': एक आकर्षक वेश्या जो पुरुषों को नग्न तो करती थी मगर उनका रेप नहीं करती

म्याऊं: क्यों 'स्त्री' एक ज़रूरी फिल्म है.

भारत के LGBTQ समुदाय को धारा 377 से नहीं, इसके सिर्फ़ एक शब्द से दिक्कत होनी चाहिए

सबकी फिंगर क्रॉस्ड हैं, सुप्रीमकोर्ट का एक फैसला शायद सब-कुछ बदल दे!

'पीरियड का खून बहाती' देवी से नहीं, मुझे उसे पूजने वालों से एक दिक्कत है

चार दिन का ये फेस्टिवल असम में आज से शुरू हो गया है.

सौरभ से सवाल

बॉलीवुड में सबसे बड़ा खान कौन है?

सबसे बड़े खान का नाम सुनकर आपका फिल्मी ज्ञान जमीन पर लोटने लगेगा. और जो झटका लगेगा तो हमेशा के लिए बुद्धि खुल जाएगी आपकी.

'कसौटी ज़िंदगी की' वाली प्रेरणा, जो अनुराग और मिस्टर बजाज से बार-बार शादी करती रही

कहां है टेलीविज़न का वो आइकॉनिक किरदार निभाने वाली ऐक्ट्रेस श्वेता तिवारी?

एक्ट्रेस मंदाकिनी आज की डेट में कहां हैं?

मंदाकिनी जिन्हें 99 फीसदी भारतीय सिर्फ दो वजहों से याद करते हैं

दिव्या भारती की मौत कैसे हुई?

खिड़की पर बैठी दिव्या ने लिविंग रूम की तरफ मुड़कर देखा. और अपना एक हाथ खिड़की की चौखट को मजबूती से पकड़ने के लिए बढ़ाया.

सर, मेरा सवाल है कि एक्ट्रेस मीनाक्षी शेषाद्री आजकल कहां हैं. काफी सालों से उनका कोई पता नहीं.

‘दामिनी’ के जरिए नई ऊंचाई तक पहुंचा मीनाक्षी का करियर . फिर घातक के बाद 1996 में उन्होंने मुंबई फिल्म इंडस्ट्री को बाय बोल दिया.

ये KRK कौन है. हमेशा सुर्खियों में क्यों रहता है?

केआरके इंटरनेट एज का ऐसा प्रॉडक्ट हैं, जो हर दिन कुछ ऐसा नया गंधाता करना रचना चाहता है.

एक्ट्रेस किमी काटकर अब कहां हैं?

एडवेंचर ऑफ टॉर्जन की हिरोइन किमी काटकर अब ऑस्ट्रेलिया में हैं. सीधी सादी लाइफ बिना किसी एडवेंचर के

चाय बनाने को 'जैसे पापात्माओं को नर्क में उबाला जा रहा हो' कौन सी कहानी में कहा है?

बहुत समय पहले से बहुत समय बाद की बात है. इलाहाबाद में थे. जेब में थे रुपये 20. खरीदी हंस...

सर आजकल मुझे अजीब सा फील होता है क्या करूं?

खुड्डी पर बैठा था. ऊपर से हेलिकॉप्टर निकला. मुझे लगा. बाबा ने बांस गहरे बोए होते तो ऊंचे उगते.