बात उस मुद्दे की जिसे अक्सर हेडलाइंस में दबा दिया जाता है. रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध को दो साल से ज्यादा का समय हो गया है. टीवी पर आप मिसाइलों के धुंए और टैंकों की गरज देखते होंगे. लेकिन पर्दे के पीछे एक ऐसा खेल चल रहा है जो सीधे तौर पर दुनिया की अर्थव्यवस्था और खासकर गरीब देशों की सुरक्षा से जुड़ा है. यह खेल है 'सेकंड हैंड' या 'रीफर्बिश्ड' हथियारों का.
रूस-यूक्रेन युद्ध के मलबे से खड़ा हुआ सेकंड हैंड हथियारों का बाजार, भारत के लिए मौका या खतरा?
रूस और यूक्रेन की धरती पर जो हथियार कल तक आग उगल रहे थे, आज उनकी मरम्मत करके उन्हें अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया के बाजारों में बेचा जा रहा है. जानें कैसे अफ्रीका और एशिया के देश इन रीफर्बिश्ड हथियारों को खरीद रहे हैं और भारत पर इसका क्या असर होगा.


जिस तरह हम और आप पुराना फोन एक्सचेंज करके नया लेते हैं या पुरानी कार को डेंट-पेंट करवाकर दोबारा बाजार में उतार देते हैं, ठीक वैसा ही कुछ अब टैंकों, तोपों और बंदूकों के साथ हो रहा है. रूस और यूक्रेन की धरती पर जो हथियार कल तक आग उगल रहे थे, आज उनकी मरम्मत करके उन्हें अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया के बाजारों में बेचा जा रहा है.
इस पूरी कहानी को समझने के लिए हमें उस 'हथियार मंडी' में घुसना होगा जहां जंग का सामान बिकता है. यूक्रेन युद्ध ने पुराने सोवियत जमाने के हथियारों की अहमियत दोबारा बढ़ा दी है. एक तरफ जहां अमेरिका और नाटो देश यूक्रेन को नई तकनीक दे रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ रूस अपने पुराने भंडार को खाली करके उन्हें अपडेट कर रहा है.
लेकिन असली कहानी उन बिचौलियों और कंपनियों की है जो युद्ध के मैदान से निकले मलबे को सोने में बदल रहे हैं. यह सिर्फ एक युद्ध नहीं है, बल्कि दुनिया के सबसे बड़े 'गैराज सेल' की शुरुआत है. आने वाले समय में आपके अखबारों में शायद यह खबर न दिखे, लेकिन ग्लोबल मार्केट में पुराने हथियारों की यह लहर भारत जैसे देशों की रक्षा नीति को भी प्रभावित करने वाली है.
इस लेख में हम समझेंगे कि कैसे एक पुराना टैंक अफ्रीका के किसी देश की किस्मत बदल सकता है और क्यों दुनिया के बड़े हथियार निर्माता अब नई तकनीक के साथ-साथ 'पुरानी मरम्मत' के धंधे में भी उतर रहे हैं. हम उन आंकड़ों की भी बात करेंगे जो बताते हैं कि आने वाले सालों में हथियारों का यह सेकंड हैंड मार्केट कितना बड़ा होने वाला है. चलिए, इस रक्षा व्यापार की गहराई में उतरते हैं और जानते हैं कि आखिर इसका आम आदमी और वैश्विक शांति पर क्या असर पड़ेगा.

जंग के मलबे से निकलता अरबों का व्यापार
जब कोई बड़ा युद्ध होता है तो सिर्फ तबाही नहीं होती, बल्कि तकनीक का एक बड़ा शिफ्ट भी होता है. यूक्रेन युद्ध में हमने देखा कि कैसे 40-50 साल पुराने सोवियत टी-72 टैंक और बीएमपी गाड़ियां आज भी मैदान में डटी हुई हैं. डिफेंस एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस युद्ध ने दुनिया को यह दिखा दिया है कि हमेशा सबसे महंगा और हाई-टेक हथियार ही काम नहीं आता. कभी-कभी पुराना, टिकाऊ और आसानी से ठीक होने वाला हथियार ज्यादा मारक साबित होता है. यही वजह है कि अफ्रीका के कई देश जो रूस या यूक्रेन से सीधे तौर पर नहीं जुड़े हैं, अब इन पुराने हथियारों में दिलचस्पी दिखा रहे हैं.
स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) के डेटा के अनुसार वैश्विक हथियार व्यापार में पिछले कुछ वर्षों में बड़ा बदलाव आया है. यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से पुराने हथियारों की मांग में लगभग 20 से 25 प्रतिशत की बढ़ोतरी देखी गई है. इसका कारण बहुत सीधा है. एक नया टैंक खरीदने में करोड़ों डॉलर खर्च होते हैं और उसकी डिलीवरी में सालों लग जाते हैं. वहीं एक रीफर्बिश्ड टैंक आधी कीमत पर मिल जाता है और वह तुरंत इस्तेमाल के लिए तैयार होता है. इसी 'इंस्टेंट डिलीवरी' के मॉडल ने पुराने हथियारों के बाजार को गर्म कर दिया है.
रीफर्बिश्ड हथियार आखिर होते क्या हैं
इसे आसान भाषा में समझें. मान लीजिए रूस का कोई पुराना टैंक युद्ध के दौरान मामूली रूप से क्षतिग्रस्त हो गया या उसकी इंजन लाइफ खत्म होने वाली है. अब रूस उसे पूरी तरह नष्ट करने के बजाय किसी ऐसी कंपनी को बेच देता है जो इसकी मरम्मत करती है. इसमें नया इंजन लगाया जाता है, नाइट विजन कैमरा अपडेट किया जाता है और इसकी बॉडी को दोबारा मजबूत बनाया जाता है. इसे ही 'रीफर्बिश्ड' या 'अपग्रेडेड' हथियार कहा जाता है. इसके बाद यह हथियार अफ्रीका के घाना, सूडान या फिर दक्षिण-पूर्व एशिया के म्यांमार जैसे देशों को बेच दिया जाता है.
इन देशों के लिए यह 'वैल्यू फॉर मनी' वाला सौदा होता है. उनके पास इतना बजट नहीं होता कि वे अमेरिका के एफ-35 जैसे लड़ाकू विमान या लेटेस्ट टैंक खरीद सकें. उनके लिए सोवियत जमाने के ये अपग्रेडेड हथियार उनकी घरेलू सुरक्षा और छोटे-मोटे विद्रोहों को दबाने के लिए काफी होते हैं. यूक्रेन युद्ध ने ऐसे हजारों हथियारों को एक्सपोजर दिया है. जब दुनिया देखती है कि एक पुराना रूसी ड्र्रोन भी कमाल कर सकता है, तो उसकी मांग मार्केट में बढ़ जाती है. यह ठीक वैसा ही है जैसे किसी फिल्म स्टार को कोई खास ब्रांड का कपड़ा पहने देखकर लोग उसे ढूंढने लगते हैं.
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अफ्रीका और एशिया: नए खरीदार और पुरानी जरूरतें
अफ्रीका के देशों में गृहयुद्ध और स्थानीय उग्रवाद की समस्याएं हमेशा बनी रहती हैं. इन देशों को ऐसे हथियारों की जरूरत होती है जो खराब रास्तों पर चल सकें और जिनकी मरम्मत के लिए बहुत बड़े इंजीनियरों की जरूरत न पड़े. यूक्रेन युद्ध में इस्तेमाल हुए रूसी हथियारों की सबसे बड़ी खूबी यही है कि वे बहुत 'रफ एंड टफ' हैं. दक्षिण-पूर्व एशिया की बात करें तो वहां भी वियतनाम, फिलीपींस और इंडोनेशिया जैसे देश अपने पुराने रक्षा तंत्र को बदलने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन बजट की कमी की वजह से वे सीधे नए हथियारों पर नहीं कूद रहे.
वे देख रहे हैं कि यूक्रेन युद्ध में कैसे 'एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल' (ATGM) और पुराने रॉकेट लॉन्चर्स ने बड़ी सेनाओं के पसीने छुड़ा दिए. इससे एक नया ट्रेंड शुरू हुआ है. अब देश भारी-भरकम जहाजों के बजाय छोटी मिसाइलों और रीफर्बिश्ड बख्तरबंद गाड़ियों पर पैसा लगा रहे हैं. यह शिफ्ट वैश्विक हथियार बाजार की दिशा बदल रहा है. कंपनियां अब सिर्फ नए मॉडल नहीं बना रहीं, बल्कि वे पुराने सोवियत मलबे को 'स्मार्ट' बनाने की किट भी बेच रही हैं.

भारत पर क्या होगा इसका असर
भारत के लिए यह स्थिति थोड़ी पेचीदा है. भारत दुनिया के सबसे बड़े हथियार खरीदारों में से एक है और हमारी सेना का एक बड़ा हिस्सा आज भी रूसी मूल के हथियारों पर निर्भर है. जब यूक्रेन युद्ध की वजह से रूस के पुराने हथियारों का बाजार सजता है, तो भारत के सामने दो चुनौतियां आती हैं.
पहली यह कि हमारे अपने रूसी हथियारों के स्पेयर पार्ट्स की सप्लाई प्रभावित हो सकती है. दूसरी चुनौती यह कि हमारे पड़ोस में मौजूद छोटे देश अगर इन सस्ते और मारक रीफर्बिश्ड हथियारों से लैस हो गए, तो क्षेत्रीय संतुलन बिगड़ सकता है.
लेकिन यहां भारत के लिए एक मौका भी है. भारत ने पिछले कुछ सालों में अपनी डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग को बहुत मजबूत किया है. हमारे पास पुराने रूसी हथियारों की मरम्मत और उन्हें अपग्रेड करने की बेहतरीन क्षमता है. भारत खुद को 'ग्लोबल रिपेयर हब' के रूप में पेश कर सकता है.
अगर कोई अफ्रीकी देश अपने पुराने रूसी टैंक को ठीक करवाना चाहता है, तो भारत उसे यह सुविधा दे सकता है. यह 'मेक इन इंडिया' और 'डिफेंस एक्सपोर्ट' के लक्ष्य को हासिल करने में बड़ी मदद कर सकता है. नीति आयोग की कई रिपोर्ट्स में इस बात का जिक्र किया गया है कि भारत को अपने डिफेंस एक्सपोर्ट पोर्टफोलियो में सर्विसिंग और अपग्रेडेशन को शामिल करना चाहिए.
हथियार व्यापार का 'सेकंड हैंड' मनोविज्ञान
क्या आपने कभी सोचा है कि युद्ध के दौरान भी हथियारों की प्रदर्शनी क्यों लगाई जाती है. असल में युद्ध एक तरह की 'लाइव टेस्टिंग' है. जो हथियार यूक्रेन की मिट्टी में काम कर गया, उसकी मार्केट वैल्यू अपने आप बढ़ गई. खरीदार देश अब यह नहीं देखते कि ब्रोशर में क्या लिखा है, वे यह देखते हैं कि युद्ध के मैदान में उस हथियार ने कैसा परफॉर्म किया. इसे हम 'बैटल-प्रूवन' (Battle-proven) तकनीक कहते हैं. पुराने हथियारों के बाजार में 'बैटल-प्रूवन' होना सबसे बड़ा प्लस पॉइंट है.
मनोवैज्ञानिक तौर पर गरीब देश सुरक्षित महसूस करते हैं जब उनके पास ऐसा हथियार होता है जिसे वे खुद ठीक कर सकें. हाई-टेक अमेरिकी हथियारों के साथ दिक्कत यह है कि उनमें सॉफ्टवेयर लॉक होते हैं और उनकी मरम्मत के लिए आपको कंपनी के इंजीनियरों पर निर्भर रहना पड़ता है. इसके उलट रूसी या पुराने यूक्रेनी हथियारों को एक अच्छा मैकेनिक भी कुछ जुगाड़ से चला सकता है. यही सादगी इस समय हथियार व्यापार की सबसे बड़ी करेंसी बनी हुई है.
वैश्विक अर्थव्यवस्था और हथियारों की ब्लैक मार्केटिंग
जहां बड़ा मुनाफा होता है, वहां कालाबाजारी भी होती है. पुराने हथियारों के इस बढ़ते बाजार ने अवैध तस्करी का खतरा भी बढ़ा दिया है. यूक्रेन युद्ध के दौरान बड़ी मात्रा में हथियार इधर-उधर हुए हैं. कई रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि पश्चिम से मिले कुछ हथियार डार्क वेब पर बिकने के लिए उपलब्ध थे. हालांकि इनकी पुष्टि करना मुश्किल है, लेकिन इतिहास गवाह है कि बड़े युद्धों के बाद हथियार अक्सर गलत हाथों में पहुंच जाते हैं.
विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) जैसे संस्थान अक्सर चिंता जताते हैं कि विकासशील देश अपनी शिक्षा और स्वास्थ्य का बजट काटकर हथियारों पर खर्च कर रहे हैं. जब बाजार में 'सस्ते' और 'सेकंड हैंड' हथियार मिलते हैं, तो इन देशों के लिए खुद को रोकना मुश्किल हो जाता है. इससे क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ती है. मान लीजिए एक छोटे से देश ने अपने पुराने टैंकों को अपग्रेड कर लिया, तो उसके पड़ोसी देश में डर का माहौल बनेगा और वह भी हथियार खरीदेगा. यह एक कभी न खत्म होने वाला चक्र है जिसे 'आर्म्स रेस' कहते हैं.
मध्य वर्ग और आम आदमी पर प्रभाव
आप सोच रहे होंगे कि टैंकों और मिसाइलों के इस खेल से आपका क्या लेना-देना. सीधा संबंध है. जब कोई देश हथियारों पर ज्यादा खर्च करता है, तो इसका असर टैक्स के पैसे पर पड़ता है. लेकिन एक और पहलू भी है. डिफेंस सेक्टर में आने वाली यह तेजी भारत जैसे देशों में रोजगार के नए मौके पैदा करती है. अगर भारत पुराने हथियारों की मरम्मत का हब बनता है, तो हजारों इंजीनियरों और टेक्नीशियनों की जरूरत होगी.
साथ ही, डिफेंस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल अक्सर आम जीवन में भी होता है. जो सेंसर और जीपीएस सिस्टम हथियारों के लिए विकसित किए जाते हैं, वही बाद में आपकी कारों और मोबाइल फोन में आते हैं. पुराने हथियारों को रीफर्बिश करने के लिए जिस तरह की मेटलर्जी और इंजीनियरिंग चाहिए, वह हमारे मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को मजबूती देती है. तो संक्षेप में कहें तो यह सिर्फ युद्ध का सामान नहीं है, यह इंजीनियरिंग का एक बड़ा इकोसिस्टम है.
पॉलिसी और सरकार का रुख
भारत सरकार ने हाल के वर्षों में रक्षा निर्यात पर बहुत जोर दिया है. डीआरडीओ (DRDO) और एचएएल (HAL) जैसी संस्थाएं अब न सिर्फ सेना के लिए सामान बना रही हैं, बल्कि वे अंतरराष्ट्रीय बाजारों की जरूरतों को भी समझ रही हैं. सरकार की नई पॉलिसी के तहत अब निजी कंपनियों को भी रक्षा क्षेत्र में बड़ी भूमिका दी गई है. पुराने हथियारों के बाजार को देखते हुए सरकार को एक ऐसी 'रीफर्बिशमेंट पॉलिसी' लानी चाहिए जो पारदर्शी हो और अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन करती हो.
हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हम जो भी हथियार या तकनीक निर्यात कर रहे हैं, वह किसी आतंकी संगठन या अस्थिर सरकार के हाथ न लगे. इसके लिए 'एंड यूजर सर्टिफिकेट' (EUC) को सख्त बनाना जरूरी है. साथ ही, हमें रूस और यूक्रेन दोनों के साथ अपने रिश्तों को बैलेंस करते हुए इस उभरते बाजार का फायदा उठाना होगा.
भविष्य का परिदृश्य: क्या बदलेगा
आने वाले पांच सालों में हम देखेंगे कि दुनिया में हथियारों का व्यापार पूरी तरह बदल जाएगा. नई मिसाइलों से ज्यादा मांग उन सिस्टम्स की होगी जो पुराने हथियारों को 'स्मार्ट' बना सकें. ड्रोन तकनीक इसमें सबसे बड़ी भूमिका निभाएगी. पुराने टैंकों के ऊपर छोटे ड्रोन लगाकर उन्हें आधुनिक बनाया जाएगा.
अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया इस नए ट्रेंड के सबसे बड़े सेंटर होंगे. भारत की भूमिका इसमें एक 'मैकेनिक ऑफ द वर्ल्ड' की हो सकती है. हम सिर्फ हथियार नहीं बेचेंगे, हम उन्हें बनाए रखने की सर्विस बेचेंगे. यह व्यापार ज्यादा टिकाऊ और ज्यादा मुनाफे वाला है. दुनिया अब समझ रही है कि जंग सिर्फ बारूद से नहीं, बल्कि उस बारूद को सही समय पर चलाने की काबिलियत से जीती जाती है.

समाधान और आगे की राह
इस स्थिति में सबसे बड़ा समाधान यही है कि हथियार व्यापार को और ज्यादा रेगुलेट किया जाए. लेकिन जब तक मांग रहेगी, सप्लाई भी बनी रहेगी. भारत जैसे देशों के लिए सलाह यही है कि हमें अपनी आत्मनिर्भरता को और तेज करना होगा. हमें पुराने रूसी मलबे पर निर्भर रहने के बजाय अपनी खुद की ऐसी तकनीक विकसित करनी होगी जो सस्ती भी हो और टिकाऊ भी.
आम नागरिक के तौर पर हमें यह समझना चाहिए कि रक्षा बजट सिर्फ सीमा की सुरक्षा के लिए नहीं होता, बल्कि वह देश की तकनीकी ताकत का प्रदर्शन भी होता है. जब हम देखते हैं कि दुनिया के देश पुराने हथियारों के लिए परेशान हैं, तो हमें गर्व होना चाहिए कि हम अपने तेजस जैसे विमान और ब्रह्मोस जैसी मिसाइलें खुद बना रहे हैं.
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बंदूकों की नई जिंदगी
रूस-यूक्रेन युद्ध ने एक कड़वा सच हमारे सामने रखा है. हथियार कभी मरते नहीं, वे बस अपना ठिकाना बदल लेते हैं. जिस टैंक ने कीव की गलियों में आग देखी थी, हो सकता है कल वह अफ्रीका के किसी जंगल में गश्त लगा रहा हो. पुराने हथियारों का यह सेकंड हैंड मार्केट एक तरफ गरीबी और अस्थिरता को बढ़ावा दे सकता है, तो दूसरी तरफ यह उन देशों को सुरक्षा का एक सस्ता विकल्प भी देता है जो नए हथियार नहीं खरीद सकते.
भारत के लिए यह एक रणनीतिक मोड़ है. हम चाहें तो इस बाजार के दर्शक बने रह सकते हैं या फिर एक बड़े खिलाड़ी के रूप में उभर सकते हैं. हथियारों की यह 'रीफर्बिश्ड' लहर अभी शुरू हुई है और इसके छींटे पूरी दुनिया पर पड़ने वाले हैं. उम्मीद है कि यह लेख आपको रक्षा व्यापार की उन बारीकियों को समझने में मदद करेगा जिन्हें अक्सर मुख्यधारा के मीडिया में छोड़ दिया जाता है.
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